संदर्भ
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के तीव्र विस्तार के साथ अर्थव्यवस्थाओं एवं कार्यस्थलों में व्यापक परिवर्तन हो रहे हैं। ऐसी स्थितियों में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि इसके लाभ अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत महिला श्रमिकों तक भी पहुँचें, जो भारत के महिला कार्यबल का अधिकांश हिस्सा हैं। यह समावेशी विकास तथा विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

अनौपचारिक क्षेत्र की महिला श्रमिकों के लिए AI का समावेशन क्यों महत्त्वपूर्ण है?
- महिला कार्यबल के अधिकांश हिस्से को समर्थन: भारत में कार्यरत लगभग 82% महिलाएँ अनौपचारिक क्षेत्र में संबद्ध हैं (ILO, 2018), जिससे समावेशी आर्थिक विकास के लिए AI महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
- कृषि उत्पादकता एवं आजीविका में सुधार: आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2023–24 के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों की लगभग 76.9% महिलाएँ कृषि कार्यों में संलग्न हैं।
- AI संचालित प्रौद्योगिकियाँ महिला कृषकों को परिशुद्ध कृषि समाधान, वास्तविक समय के मौसम पूर्वानुमान, फसल स्वास्थ्य निगरानी, कृषि आदानों के अनुकूलतम उपयोग, कीट प्रबंधन तथा बाजार संबंधी जानकारी प्रदान कर सकती हैं, जिससे उत्पादकता एवं आय में सुधार हो सकता है।
- सकारात्मक प्रभाव के प्रमाण: वर्ष 2024 में 12 राज्यों में किए गए Farmer.Chat अध्ययन में पाया गया कि 61% महिला उपयोगकर्ताओं ने 45 दिनों के भीतर जीवन की गुणवत्ता में सुधार की सूचना दी, तथा जब AI उपकरण उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार किए गए, तब महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की तुलना में 2–3 गुना अधिक रही।
हालिया प्रमुख आँकड़े: AI का समावेशन एवं अनौपचारिक क्षेत्र की महिला श्रमिक (2025–26):
- लैंगिक AI प्रभाव: वैश्विक स्तर पर महिलाओं की 28% नौकरियाँ AI के प्रभाव के दायरे में हैं, जबकि पुरुषों के लिए यह अनुपात 21% है (संयुक्त राष्ट्र जेंडर स्नैपशॉट 2025)।
- डिजिटल तत्परता: इंडिया स्किल्स रिपोर्ट, 2026 के अनुसार, रोजगारयोग्यता 56.35% रही, तथा पहली बार महिलाएँ रोजगार के लिए तत्परता के मामले में पुरुषों से अग्रसर रहीं।
- AI के अंगीकरण में असमानता: सीमित डिजिटल साक्षरता, वहनीयता, भाषायी बाधाओं तथा ऑनलाइन सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण महिलाएँ जनरेटिव कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Generative AI) को अपेक्षाकृत कम अपनाती हैं।
- एल्गोरिद्मिक पक्षपात (Algorithmic Bias): AI के आँकड़ा-संग्रह, विकास एवं शासन में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी कम है, जिससे AI प्रणालियों में लैंगिक पक्षपात बना रहता है।
- नीतिगत आवश्यकता: भारत के 90% से अधिक कार्यबल के अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत होने के कारण, न्यायसंगत डिजिटल परिवर्तन सुनिश्चित करने हेतु समावेशी, बहुभाषी, वहनीय तथा महिला-केंद्रित AI अत्यंत आवश्यक है।
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समावेशी AI अपनाने को सुनिश्चित करने में चुनौतियाँ:
- एल्गोरिद्मिक पक्षपात (Algorithmic Bias) से लैंगिक असमानताओं का सुदृढ़ीकरण: : AI प्रणालियों को प्रायः ऐसे आँकड़ा-संग्रहों पर प्रशिक्षित किया जाता है, जिनमें महिलाओं का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम होता है, जिसके परिणामस्वरूप ऋण मूल्यांकन, रोजगार, बीमा, कल्याणकारी योजनाओं के वितरण तथा डिजिटल वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों में पक्षपातपूर्ण परिणाम सामने आते हैं।
- डिजिटल विभाजन महिलाओं की AI तक पहुँच को सीमित करता है: अनौपचारिक क्षेत्र की अनेक महिला श्रमिकों के पास स्मार्टफोन, किफायती इंटरनेट सेवा, डिजिटल उपकरणों तथा डिजिटल साक्षरता की सीमित उपलब्धता होती है, जिससे वे AI आधारित सेवाओं का पूर्ण रूप से उपयोग नहीं कर पाती हैं।
- भाषायी बाधाएँ भी ग्रामीण एवं वंचित क्षेत्रों की महिलाओं के लिए AI अनुप्रयोगों की पहुँच को और सीमित कर देती हैं।
- AI साक्षरता का अभाव सार्थक भागीदारी को सीमित करता है: संरचित AI साक्षरता कार्यक्रमों के अभाव में अनेक महिलाएँ अपनी आजीविका में सुधार, सरकारी सेवाओं तक पहुँच अथवा डिजिटल बाजारों में भागीदारी के लिए AI उपकरणों का प्रभावी उपयोग नहीं कर पाती हैं।
- डिजिटल सुरक्षा संबंधी जोखिम: डीपफेक (Deepfake), ऑनलाइन उत्पीड़न, पहचान की चोरी तथा बिना सहमति के तैयार की गई कृत्रिम सामग्री (Synthetic Content) के माध्यम से AI के बढ़ते दुरुपयोग ने महिलाओं के लिए असुरक्षित डिजिटल वातावरण उत्पन्न किया है।
- ऐसे खतरे महिलाओं को डिजिटल मंचों एवं ऑनलाइन आर्थिक गतिविधियों में आत्मविश्वास के साथ भाग लेने से हतोत्साहित करते हैं।
- पारदर्शिता का अभाव AI प्रणालियों पर विश्वास को कमजोर करता है: अनेक AI प्रणालियाँ अपारदर्शी अथवा “ब्लैक-बॉक्स” (Black-box) एल्गोरिद्म पर आधारित होती हैं, जिससे प्रभावित व्यक्तियों के लिए स्वचालित निर्णयों को समझना या उन्हें चुनौती देना कठिन हो जाता है।
- इससे विशेष रूप से कल्याणकारी योजनाओं, रोजगार तथा वित्तीय समावेशन से जुड़े क्षेत्रों में जनविश्वास घटता है तथा जवाबदेही सीमित होती है।
प्रमुख शासन संबंधी प्राथमिकताएँ
- लैंगिक प्रभाव आकलन को संस्थागत स्वरूप देना: रोजगार, ऋण उपलब्धता, कल्याणकारी योजनाओं, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा अथवा सार्वजनिक सेवाओं को प्रभावित करने वाली AI प्रणालियों को लागू करने से पूर्व अनिवार्य रूप से लैंगिक प्रभाव आकलन किया जाना चाहिए।
- इन आकलनों में यह मूल्यांकन किया जाना चाहिए कि क्या AI प्रणालियाँ लिंग, जाति, दिव्यांगता, भौगोलिक स्थिति तथा व्यावसायिक स्थिति के आधार पर भिन्न परिणाम उत्पन्न करती हैं, साथ ही सुलभ शिकायत निवारण तंत्र भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- AI निवेशों में लैंगिक उत्तरदायी बजटिंग को एकीकृत करना: AI पर होने वाले सार्वजनिक व्यय का मूल्यांकन लैंगिक उत्तरदायी बजटिंग के ढाँचे के अंतर्गत किया जाना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि निवेशों से महिलाओं को बेहतर लाभ प्राप्त हो।
- AI साक्षरता को आवश्यक सार्वजनिक अवसंरचना के रूप में मान्यता देना: AI साक्षरता कार्यक्रमों को दीनदयाल अंत्योदय योजना- राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM), दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (DDU-GKY), कौशल भारत मिशन तथा मिशन शक्ति जैसी वर्तमान सरकारी पहलों के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए।
- डिजिटल सुरक्षा को सुदृढ़ बनाना: महिलाओं को ऑनलाइन दुरुपयोग से सुरक्षित रखने के लिए IT (मध्यस्थ दिशा-निर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 का प्रभावी क्रियान्वयन तथा AI द्वारा निर्मित कृत्रिम सामग्री की पहचान एवं लेबलिंग संबंधी तंत्र विकसित करना आवश्यक है।
- क्षेत्रीय भाषाओं में शिकायत निवारण को सुदृढ़ बनाना।
समावेशी AI को समर्थन देने वाली सरकारी पहलें
- सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) नियम, 2021: ऑनलाइन मध्यस्थों के लिए शिकायत निवारण तंत्र अनिवार्य किया गया, ताकि प्रौद्योगिकी-सक्षम दुरुपयोग सहित हानिकारक डिजिटल सामग्री का समाधान किया जा सके।
- वर्ष 2023- भाषिणी (BHASHINI): भारत के बहुभाषी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) के रूप में कार्य करती है, जो अनेक भारतीय भाषाओं में AI आधारित सेवाएँ उपलब्ध कराकर डिजिटल पहुँच एवं समावेशन को बढ़ावा देती है।
- वर्ष 2024- इंडियाAI मिशन: ₹10,371.92 करोड़ के परिव्यय के साथ स्वीकृत इस मिशन का उद्देश्य कंप्यूटिंग अवसंरचना, डेटासेट, नवाचार, स्टार्ट-अप समर्थन, कौशल विकास तथा AI अनुसंधान के माध्यम से एक सुदृढ़ राष्ट्रीय AI पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है।
- वर्ष 2025- इंडिया AI गवर्नेंस दिशा-निर्देश: निष्पक्षता, समानता, पारदर्शिता, जवाबदेही, गोपनीयता, सुरक्षा एवं विश्वसनीयता के सिद्धांत स्थापित करते हैं, जो उत्तरदायी AI शासन का आधार प्रदान करते हैं।
- वर्ष 2025- इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) की पहल: AI द्वारा निर्मित सिंथेटिक सामग्री की अनिवार्य लेबलिंग का प्रस्ताव रखा गया, ताकि पारदर्शिता बढ़ाई जा सके तथा डीपफेक एवं छेड़छाड़ की गई मीडिया सामग्री के दुरुपयोग पर अंकुश लगाया जा सके।
- वर्ष 2025- राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की सिफारिशें: भारत के साइबर कानूनों की समीक्षा करते हुए डीपफेक एवं ऑनलाइन उत्पीड़न सहित प्रौद्योगिकी-सुगम लैंगिक हिंसा से निपटने के लिए अधिक सुदृढ़ विधिक एवं संस्थागत सुरक्षा उपायों की अनुशंसा की गई।
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आगे की राह
- समावेशी AI डेटासेट: भारत को समावेशी, प्रतिनिधिक एवं पक्षपात-मुक्त डेटासेट विकसित करने चाहिए, ताकि AI प्रणालियाँ समाज के विभिन्न वर्गों के लिए न्यायसंगत परिणाम प्रदान कर सकें।
- लैंगिक प्रभाव आकलन: आजीविका, कल्याणकारी योजनाओं, वित्तीय सेवाओं तथा लोक प्रशासन को प्रभावित करने वाले सभी उच्च-जोखिम AI अनुप्रयोगों के लिए लैंगिक प्रभाव आकलन को अनिवार्य रूप से संस्थागत बनाया जाना चाहिए, ताकि न्यायसंगत एवं समावेशी परिणाम प्राप्त हो सकें।
- AI साक्षरता एवं डिजिटल समावेशन: AI साक्षरता का विस्तार स्वयं सहायता समूहों (SHGs), पंचायती राज संस्थाओं, कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs), सामान्य सेवा केंद्रों (CSCs) तथा सामुदायिक संगठनों के माध्यम से किया जाना चाहिए, ताकि अंतिम छोर तक डिजिटल समावेशन सुनिश्चित हो सके।
- बहुभाषी AI पारिस्थितिकी तंत्र: AI अनुप्रयोगों का विकास भाषिणी जैसे मंचों के माध्यम से क्षेत्रीय भाषाओं में किया जाना चाहिए, ताकि भाषा पहुँच में बाधा न बने।
- पारदर्शी एवं उत्तरदायी AI शासन: शासन एवं लोक सेवा वितरण में प्रयुक्त AI प्रणालियाँ पारदर्शीतथा जवाबदेह होनी चाहिए तथा उन्हें प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र का समर्थन प्राप्त होना चाहिए।
- विधिक एवं साइबर सुरक्षा ढाँचा: डीपफेक, AI-सक्षम साइबर अपराध, ऑनलाइन उत्पीड़न तथा डिजिटल लैंगिक हिंसा से निपटने के लिए समन्वित अंतर-मंत्रालयी कार्रवाई के माध्यम से विधिक ढाँचे को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- लैंगिक उत्तरदायी AI निवेश: AI क्रय नीतियों में लैंगिक उत्तरदायी बजटिंग तथा मापनीय समावेशन संकेतकों को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि सार्वजनिक निवेश न्यायसंगत परिणाम सुनिश्चित कर सकें।
निष्कर्ष
AI तभी समावेशी विकास का माध्यम बन सकता है, जब वह सुलभ, लैंगिक उत्तरदायी, पारदर्शी एवं सुरक्षित हो, जिससे अनौपचारिक क्षेत्र की महिला श्रमिक विकसित भारत 2047 की यात्रा में सक्रिय रूप से भाग ले सकें तथा उससे लाभान्वित हो सकें।