राज्यों का चिंताजनक राजस्व घाटा

1 May 2026

संदर्भ

केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि बढ़ती आर्थिक अनिश्चितताओं के मध्य, राजस्व घाटे और भारी कर्ज के बोझ से दबे राज्यों को गंभीर वित्तीय संकट का सामना करना पड़ सकता है।

राजस्व घाटे (Revenue Deficit) के बारे में

  • परिभाषा: राजस्व घाटा एक ऐसी स्थिति को दर्शाता है, जिसमें सरकार का राजस्व व्यय उसकी राजस्व प्राप्तियों से अधिक हो जाता है; इसका अर्थ है कि वर्तमान उपभोग का वित्तपोषण उधार लेकर किया जा रहा है।
    • यह विशेष रूप से सरकार की उस अक्षमता को उजागर करता है, जिसके कारण वह अपनी नियमित आय के स्रोतों से अपने दैनिक खर्चों को पूरा नहीं कर पाती है।
  • मुख्य घटक: राजस्व व्यय में वेतन, पेंशन, सब्सिडी और ब्याज भुगतान जैसी आवर्ती मदें शामिल होती हैं, जबकि राजस्व प्राप्तियों में कर और गैर-कर राजस्व (जैसे शुल्क और लाभांश) शामिल होते हैं।
  • संबंधित घाटे
    • राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit): राजकोषीय घाटा कुल प्राप्तियों (उधार को छोड़कर) की तुलना में कुल व्यय की अधिकता को दर्शाता है और यह सरकार की कुल उधार आवश्यकता का संकेत देता है।
    • प्राथमिक घाटा (Primary Deficit): प्राथमिक घाटा, राजकोषीय घाटे में से ब्याज भुगतान को घटाने पर प्राप्त होता है; यह पिछली ऋण बाध्यताओं को छोड़कर, उधार की आवश्यकता को दर्शाता है।

राज्यों के राजस्व घाटे से संबंधित प्रमुख चिंताएँ

  • ऋण का बढ़ता बोझ और ब्याज भुगतान: पंजाब (राजस्व प्राप्तियों का 22.8% ब्याज पर खर्च) जैसे राजस्व घाटे वाले राज्य उच्च ऋण सेवा बोझ का सामना कर रहे हैं, जिससे उनका राजकोषीय लचीलापन कम हो रहा है।
  • विकास के लिए सीमित राजकोषीय स्थान: राजस्व घाटे का सामना कर रहे राज्यों के पास पूँजीगत व्यय के लिए संसाधन कम होते हैं, जिससे उन्हें बुनियादी ढाँचे और विकासोन्मुखी क्षेत्रों पर खर्च में कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
  • केंद्र पर बढ़ती निर्भरता: राजकोषीय तनाव वाले राज्य उच्च केंद्रीय हस्तांतरण की माँग कर सकते हैं, जिससे केंद्र-राज्य राजकोषीय संबंधों पर दबाव पड़ता है, विशेष रूप से आर्थिक संकटों के दौरान।
  • बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशीलता: वित्त मंत्रालय के अनुसार, 18 प्रमुख राज्यों में से नौ के वर्ष 2026-27 में राजस्व घाटे में रहने का अनुमान है, जो उन्हें वैश्विक तेल संबंधी संकटों के प्रति संवेदनशील बनाता है।
  • राजकोषीय विवेक के नियम (‘गोल्डन रूल’) का उल्लंघन: सार्वजनिक वित्त का “गोल्डन रूल” आवश्यक बनाता है कि उधार का उपयोग केवल पूँजीगत व्यय के लिए किया जाए, लेकिन राजस्व घाटे वाले राज्य अक्सर उपभोग के उद्देश्यों के लिए उधार लेते हैं।

राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2003 के अंतर्गत प्रमुख प्रावधान

  • राजकोषीय सुदृढ़ीकरण लक्ष्य: यह अधिनियम राजकोषीय घाटे को स्थायी स्तर तक कम करने का आदेश देता है, जिसमें राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 4.5% से नीचे लाना और ऋण-जीडीपी अनुपात को विवेकपूर्ण स्तर पर बनाए रखना जैसे लक्ष्य शामिल हैं।
    • राज्यों को आम तौर पर अपने वार्षिक राजकोषीय घाटे को उनके सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 3% तक सीमित करना आवश्यक होता है।
    • हालाँकि कोविड-19 महामारी (2020-21) जैसी आर्थिक मंदी के दौरान निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए इस लक्ष्य को कभी-कभी उच्च स्तर (जैसे- 3.5% या 4%) तक स्थिर किया गया था, लेकिन दीर्घकालिक लक्ष्य राजकोषीय स्थिरता बनाए रखने के लिए पुनः 3% पर वापस आना है।
  • अनिवार्य राजकोषीय नीति विवरण: पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सरकार को व्यापक आर्थिक रूपरेखा विवरण (Macro-Economic Framework Statement), मध्यम अवधि की राजकोषीय नीति विवरण और राजकोषीय नीति रणनीति विवरण सहित प्रमुख दस्तावेज प्रस्तुत करने की आवश्यकता होती है।
  • एस्केप क्लॉज’ (निकासी खंड) प्रावधान: यह अधिनियम युद्ध, राष्ट्रीय आपदाओं या संरचनात्मक सुधारों जैसी असाधारण परिस्थितियों में राजकोषीय लक्ष्यों से विचलन की अनुमति देता है, जो आमतौर पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 0.5% तक होता है।
  • RBI वित्तपोषण पर प्रतिबंध: यह अधिनियम प्राथमिक बाजारों में भारतीय रिजर्व बैंक से सीधे उधार लेने पर रोक लगाता है, जिससे मौद्रिक अनुशासन सुनिश्चित होता है और मुद्रास्फीति जनित वित्तपोषण (Inflationary Financing) को रोका जा सकता है।

राज्यों के राजकोषीय अनुशासन में सुधार हेतु सुझाव

  • राजस्व सृजन को सुदृढ़ करना: राज्यों को कर प्रशासन में सुधार, कर आधार को व्यापक बनाने और राजस्व घाटे को कम करने के लिए सब्सिडी को तर्कसंगत बनाकर अपने स्वयं के राजस्व स्रोतों को बढ़ाना चाहिए।
  • व्यय को तर्कसंगत बनाना: सरकारों को अनावश्यक सब्सिडी के बजाय उत्पादक व्यय को प्राथमिकता देने और सार्वजनिक धन का कुशल उपयोग सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
  • पूँजीगत व्यय में वृद्धि: राज्यों को राजस्व व्यय के वित्तपोषण के बजाय बुनियादी ढाँचे और संपत्ति निर्माण पर केंद्रित करके ‘गोल्डन रूल’ (Golden Rule) का पालन करना चाहिए।
  • राजकोषीय संस्थानों को मजबूत करना: राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों का प्रभावी कार्यान्वयन और पारदर्शी राजकोषीय ढाँचे को अपनाने से जवाबदेही और अनुशासन में सुधार हो सकता है।
  • अनुकरणीय राज्य: अपने सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के प्रतिशत के रूप में अनुमानित राजस्व अधिशेष वाले आठ राज्य ओडिशा (3%), झारखंड (2.5%), उत्तर प्रदेश (1.6%), गोवा (1.3%), गुजरात (0.8%), उत्तराखंड (0.6%), तेलंगाना (0.3%) और बिहार (0.1%) हैं।

निष्कर्ष: 

भारत में सतत् विकास, व्यापक आर्थिक स्थिरता और सहकारी संघवाद को बनाए रखने के लिए राजकोषीय अनुशासन सुनिश्चित करना तथा राजस्व घाटे को समाप्त करना अनिवार्य है।

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