भारत की इंटरनेट सेंसरशिप व्यवस्था

7 Apr 2026

संदर्भ

भारत में इंटरनेट की उपलब्धता विभिन्न इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (ISP) में भिन्न-भिन्न है, क्योंकि अवरोधन आदेशों का कार्यान्वयन एक समान नहीं होता है, जिससे एक असमान डिजिटल अनुभव की स्थिति उत्पन्न होती है।

संबंधित तथ्य 

  • भारत की इंटरनेट सेंसरशिप व्यवस्था सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 में निहित है, विशेष रूप से धारा 69 और धारा 79 जैसे प्रावधानों में, जो सरकार द्वारा निर्देशित ऑनलाइन सामग्री को अवरुद्ध करते हैं।
  • यह प्रणाली राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और डिजिटल शासन की आवश्यकताओं को ऑनलाइन सामग्री विनियमन पर बढ़ती चिंताओं के साथ संतुलित करने के लिए विकसित हुई है।

इंटरनेट सेवा प्रदाता (Internet Service Providers- ISPs)

  • इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISP) वे कंपनियाँ हैं, जो उपयोगकर्ताओं को इंटरनेट तक पहुँच प्रदान करती हैं और ऑनलाइन सामग्री की डिलीवरी और एक्सेस को नियंत्रित करती हैं।
  • कानूनी दायित्व: आईटी अधिनियम और लाइसेंसिंग शर्तों के तहत आईएसपी को सरकार और न्यायालय के ब्लॉकिंग आदेशों का पालन करना अनिवार्य है।
  • सेंसरशिप में भूमिका: वे DNS (डोमेन नेम सिस्टम) फिल्टरिंग, HTTP (हाइपरटेक्स्ट ट्रांसफर प्रोटोकॉल) ब्लॉकिंग और SNI (सर्वर नेम इंडिकेशन) आधारित प्रतिबंधों जैसी विधियों का उपयोग करके वेबसाइटों को ब्लॉक करते हैं।
  • असमान कार्यान्वयन: विभिन्न ISP ब्लॉकिंग आदेशों को अलग-अलग तरीके से लागू करते हैं, जिससे नेटवर्क पर उपलब्ध सामग्री में भिन्नता आती है।
  • मनमानी प्रक्रियाएँ: मानक दिशा-निर्देशों के अभाव में, ISP अत्यधिक ब्लॉकिंग या चयनात्मक प्रवर्तन में संलग्न हो सकते हैं।

भारत में इंटरनेट सेंसरशिप का कानूनी ढाँचा

  • वैधानिक आधार: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69सरकार को संप्रभुता, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के हित में ऑनलाइन सामग्री को अवरुद्ध करने का अधिकार देती है।
  • मध्यस्थों की जवाबदेही: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 मध्यस्थों को सरकारी निर्देशों, जिनमें अवरोधन आदेश भी शामिल हैं, का पालन करने की शर्त पर सुरक्षित आश्रय प्रदान करती है।
  • आईएसपी द्वारा अनिवार्य अनुपालन: लाइसेंसिंग समझौतों के तहत आईएसपी को सरकार द्वारा निर्देशित वेबसाइटों को अवरुद्ध करना अनिवार्य है, जिससे अनुपालन, कानूनी रूप से बाध्यकारी हो जाता है।
  • गोपनीय अवरोधन आदेश: अवरोधन निर्देश प्राय गोपनीय होते हैं, जिससे सार्वजनिक जागरूकता और जवाबदेही सीमित हो जाती है।
  • न्यायिक समर्थन: श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 69को बरकरार रखा, लेकिन समीक्षा और सुनवाई जैसे प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को अनिवार्य किया।
  • अन्य कानूनी प्रावधान: सांख्यिकी संग्रह अधिनियम संशोधनों और सूचना प्रौद्योगिकी नियमों जैसे कानूनों द्वारा भी अवरोधन उत्पन्न होता है, जिससे प्रवर्तन तंत्र मजबूत होता है।

भारत की इंटरनेट सेंसरशिप व्यवस्था से संबंधित प्रमुख मुद्दे

  • असंगत प्रवर्तन: असमान कार्यान्वयन के कारण एक ही वेबसाइट एक ISP पर अवरुद्ध हो सकती है, जबकि दूसरे पर सुचारू रूप से संचालित हो सकती है।
  • पारदर्शिता का अभाव: अवरोधन आदेश गोपनीय होते हैं, जिससे उपयोगकर्ता वेबसाइट के स्वामित्व प्रतिबंधों के कारणों से अनभिज्ञ रहते हैं।
  • मनमानी अवरोधन: ISP विभिन्न तकनीकी विधियों और मानकों का पालन करते हैं, जिससे अत्यधिक अवरोधन या चयनात्मक प्रवर्तन की स्थिति निर्मित होती है।
  • कमजोर जवाबदेही: श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ मामले में सुरक्षा उपायों के बावजूद, समीक्षा तंत्र तथा शिकायत निवारण व्यवहार में अप्रभावी बने हुए हैं।

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