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जम्मू-कश्मीर में सिकुड़ती हुई झीलें: आर्द्रभूमि संकट में

7 Apr 2026

संदर्भ  

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि जम्मू और कश्मीर में स्थित 697 झीलों में से 518 झीलें खंडित अनुचित व्यवस्था और अनियंत्रित भूमि उपयोग परिवर्तनों के कारण या तो विलुप्त हो गई हैं या काफी सीमा तक सिकुड़ गई हैं।

संबंधित तथ्य 

  • मार्च 2022 को समाप्त अवधि के लिए जम्मू और कश्मीर में झीलों का संरक्षण और प्रबंधन शीर्षक वाली यह रिपोर्ट हाल ही में जम्मू-कश्मीर विधानसभा में प्रस्तुत की गई।
  • इसमें दिए गए आँकड़े ‘जम्मू-कश्मीर पारिस्थितिकी, पर्यावरण और रिमोट सेंसिंग विभाग’ (EE&RSD) से लिए गए हैं।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

  • कुल झील के क्षेत्रफल में कमी: केंद्रशासित प्रदेश में कुल झील का क्षेत्रफल 1967 के आधार वर्ष की तुलना में 2,851.26 हेक्टेयर कम हो गया है।
    • इसमें बताया गया है कि जम्मू-कश्मीर में कुल 697 झीलों में से 315 झीलें, यानी 45% झीलें, जो 1,537.07 हेक्टेयर जल क्षेत्र में फैली हुई थीं, लुप्त हो गई हैं।
  • खंडित प्रबंधन: इस क्षेत्र में झीलों का प्रशासनिक नियंत्रण पाँच विभागों – वन, राजस्व, कृषि, आवास और शहरी विकास, और पर्यटन में विभाजित है, जिसके कारण प्रबंधन खंडित हो गया है।
  • झीलों के सिकुड़ने के कारण: झीलों के लुप्त होने और सिकुड़ने के प्राथमिक कारणों के रूप में झीलों और उनके जलग्रहण क्षेत्रों के भीतर भूमि उपयोग में हुए परिवर्तन को चिह्नित किया गया है।
    • अन्य कारकों में खंडित शासन व्यवस्था, वनोन्मूलन, जलवायु परिवर्तन और जलग्रहण क्षेत्र की परिवर्तित गतिशीलता शामिल हैं।
  • सीमित संरक्षण प्रयास: रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी संरक्षण प्रयास केवल छ: झीलों डल, वुलर, होकरसर, मानसबल, सुरिंसर और मानसर तक ही सीमित थे, जिनका विस्तृत अध्ययन किया गया।
    • शेष 691 झीलों के लिए, वन विभाग ने न तो पात्र जल निकायों की पहचान की और न ही पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) की योजनाओं के तहत सहायता प्राप्त करने की योजना बनाई।
  • असंतुलित निधि: वर्ष 2017 से वर्ष 2022 के बीच जम्मू-कश्मीर के पूँजीगत व्यय बजट का केवल लगभग एक प्रतिशत (560.65 करोड़ रुपये) इन छह झीलों के लिए आवंटित किया गया था।
  • बाढ़ का कारण: झीलों का क्षेत्रफल कम होना वर्ष 2014 में जम्मू-कश्मीर में आई भीषण बाढ़ का एक कारण था, क्योंकि झीलें प्राकृतिक संतुलन जलाशय और बाढ़ नियंत्रण प्रणाली के की रक्षा का कार्य करती हैं।
  • जल क्षेत्र: 150 झीलों (22%) के जल क्षेत्र में 538.22 हेक्टेयर की वृद्धि हुई है, जबकि 29 झीलों (697 झीलों का 4%) का 14,535.76 हेक्टेयर जल क्षेत्र स्थिर रहा है।

सिफारिशें

  • केंद्रीकृत प्राधिकरण की आवश्यकता: समन्वित, जवाबदेह और प्रभावी झील संरक्षण एवं प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त संसाधनों से युक्त एककेंद्रीकृत एवं विशिष्ट प्राधिकरण’ की स्थापना।
  • कुशल मानव संसाधन की तैनाती: इसमें पर्यावरण एवं जल विज्ञान अभियंताओं, आर्द्रभूमि पारिस्थितिकीविदों, जलविज्ञानियों, रिमोट सेंसिंग एवं GIS विशेषज्ञों, पक्षीवैज्ञानिकों एवं सूक्ष्मजीव विज्ञानी सहित कुशल मानव संसाधन की तैनाती का भी आह्वान किया गया।

जम्मू और कश्मीर में झीलों का महत्त्व

  • पारिस्थितिकी महत्त्व: जम्मू और कश्मीर की झीलें विशाल आर्द्रभूमि नेटवर्क का हिस्सा हैं। ये मध्य एशियाई फ्लाईवे के साथ-साथ प्रवासी पक्षियों सहित समृद्ध जैव विविधता को संरक्षित करती हैं।
  • जैव विविधता हॉटस्पॉट: होकरसर जैसी आर्द्रभूमियाँ प्रतिवर्ष लगभग 20 लाख प्रवासी पक्षियों की मेजबानी करती हैं, जिससे ये वैश्विक जैव विविधता के लिए महत्त्वपूर्ण आवास बन जाती हैं।
    • इस क्षेत्र में रामसर द्वारा नामित अंतरराष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्रभूमियाँ भी शामिल हैं।
  • जलीय विनियमन: झीलें भूजल पुनर्भरण, पोषक तत्त्व चक्रण और जल शुद्धिकरण में योगदान करती हैं, जो जलीय संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।
    • इनके क्षरण को वर्ष 2014 की कश्मीर बाढ़ जैसी आपदाओं से जोड़ा गया है।
  • जलवायु विनियमन: आर्द्रभूमियाँ कार्बन पृथक्करण और सूक्ष्म जलवायु विनियमन में मदद करती हैं, जिससे जलवायु स्थिरता को बढ़ावा मिलता है।
    • इनके क्षति से सुभेद्य हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है।
  • पर्यावरणीय सुरक्षा: आर्द्रभूमियाँ प्रदूषकों को हटाकर और पर्यावरण स्वास्थ्य को बनाए रखकरइकोलॉजिकल किडनीज” के रूप में कार्य करती हैं।
    • इनके क्षरण से दीर्घकालिक पारिस्थितिकी सुरक्षा और स्थिरता को संकट उत्पन्न हो जाता है।
जम्मू-कश्मीर में सिकुड़ती हुई झीलें: आर्द्रभूमि संकट में

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