ईरानी बंदरगाहों के आस-पास नौसैनिक नाकाबंदी

13 Apr 2026

संदर्भ

एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों तथा होर्मुज जलडमरूमध्य के आस-पास नौसैनिक नाकेबंदी लागू करने की दिशा में कदम उठाए, जिससे आपूर्ति बाधित होने की आशंकाएँ उत्पन्न हुईं और वैश्विक तेल मूल्यों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई ।

संबंधित तथ्य

  • यह नौसैनिक नाकेबंदी का संभावित परिदृश्य पाकिस्तान में आयोजित ‘इस्लामाबाद वार्ता’ की विफलता के परिप्रेक्ष्य में सामने आया, जहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के मध्य ऑपरेशन एपिक फ्यूरी से संबंधित चल रहे संघर्ष के समाधान हेतु वार्ता आयोजित की गई थी।

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‘नौसैनिक नाकेबंदी’ के बारे में

  • नौसैनिक नाकेबंदी एक रणनीतिक सैन्य एवं आर्थिक साधन है, जिसका उद्देश्य किसी तटीय क्षेत्र या समुद्री मार्ग तक पहुँच को प्रतिबंधित कर प्रतिद्वंद्वी के आपूर्ति एवं राजस्व के प्रमुख स्रोतों को अवरुद्ध करना होता है।
    • व्यवहार में, इसके अंतर्गत एक सुसंगठित एवं सघन सैन्य बल की तैनाती की जाती है, जिसमें प्रायः विमानवाहक पोत, निर्देशित-मिसाइल विध्वंसक तथा जल एवं भूमि आधारित आक्रमण पोत सम्मिलित होते हैं, जो निर्दिष्ट क्षेत्र में प्रवेश एवं निकास करने वाले जहाजों की निगरानी, जाँच तथा अवरोधन करते हैं।
  • तटस्थ राज्यों के अधिकार: वैध नाकेबंदी का उल्लंघन करने का प्रयास करने वाले तटस्थ जहाजों को अधिग्रहित अथवा मार्ग परिवर्तित किया जा सकता है।
    • हालाँकि, तटस्थ राज्यों को नाकाबंदी क्षेत्र के बाहर समुद्री नौवहन की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त रहता है।

अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के अंतर्गत स्थिति

  • घोषणा: अंतरराष्ट्रीय कानून के अंतर्गत, इसे औपचारिक रूप से घोषित किया जाना, तटस्थ राज्यों को सूचित किया जाना तथा निष्पक्ष रूप से लागू किया जाना आवश्यक है।
  • युद्ध का कार्य: अंतरराष्ट्रीय कानून के अंतर्गत, नाकेबंदी को व्यापक रूप से युद्ध का कार्य माना जाता है।
    • जब कोई राज्य दूसरे राज्य के बंदरगाहों तक जहाजों के प्रवेश या निकास को बलपूर्वक रोकता है, तो इसे युद्धरत गतिविधि के रूप में देखा जाता है।
  • समुद्री कानून संबंधी घोषणा: 16 अप्रैल, 1856 को पेरिस में अपनाई गई समुद्री कानून संबंधी घोषणा तथा 26 फरवरी, 1909 को लंदन में अपनाई गई नौसैनिक युद्ध के कानूनों संबंधी घोषणा (अनुच्छेद-1-21) के अनुसार नाकाबंदी एक युद्ध का कार्य है।
  • अंतरराष्ट्रीय कानून पर सैन रेमो मैनुअल: 12 जून, 1994 को अपनाया गया समुद्र में सशस्त्र संघर्षों पर लागू अंतरराष्ट्रीय कानून का सैन रेमो मैनुअल (SRM) नाकेबंदी से संबंधित विधिक व्याख्या प्रदान करता है (पैराग्राफ 67(a), 93-104, 146(f) और 153(f))।
  • अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (IHL) का अनुपालन: नाकेबंदी को अंतरराष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय दोनों प्रकार के सशस्त्र संघर्षों में लागू अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के अनुरूप होना चाहिए।
    • इसका अर्थ है- सैन्य आवश्यकता, भेदभाव और अनुपातिकता के सिद्धांतों का पालन करते हुए नागरिकों एवं नागरिक वस्तुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना।

वर्तमान नाकाबंदी की प्रमुख विशेषताएँ

  • समुद्री यातायात को लक्षित करना: नाकाबंदी का उद्देश्य ईरानी बंदरगाहों में प्रवेश करने या बाहर निकलने वाले सभी जहाजों को रोकना है, जिससे ईरान के समुद्री व्यापार को प्रभावी रूप से प्रतिबंधित किया जा सके।
  • सार्वभौमिक अनुप्रयोग: इसे ईरान के साथ व्यापार करने वाले सभी देशों के जहाजों पर बिना किसी राष्ट्रीयता के भेदभाव के लागू किया जा रहा है।
  • होर्मुज जलडमरूमध्य पर सीमित प्रभाव: यह नाकेबंदी होर्मुज जलडमरूमध्य से आवागमन को पूर्णतः प्रतिबंधित नहीं करती, जिससे वे जहाज जो ईरान की ओर नहीं जा रहे हैं, अपना पारगमन जारी रख सकते हैं।

नौसैनिक नाकाबंदी के कारण

  • कूटनीतिक वार्ताओं की विफलता: यह नाकेबंदी संयुक्त राज्य अमेरिका–ईरान के मध्य उच्च-स्तरीय वार्ताओं के विफल होने के पश्चात् लागू की गई, जिसका प्रमुख कारण ईरान के परमाणु कार्यक्रम और संबंधित सुरक्षा मुद्दों पर असहमति थी।
  • आर्थिक दबाव की रणनीति: संयुक्त राज्य अमेरिका का उद्देश्य ईरान के व्यापार और तेल निर्यात को प्रतिबंधित कर उस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था कमजोर हो।
  • रणनीतिक प्रभाव का प्रतिरोध: यह कदम फारस की खाड़ी क्षेत्र में, विशेषकर होर्मुज जलडमरूमध्य के आस-पास, प्रमुख समुद्री मार्गों पर ईरान के रणनीतिक प्रभाव को सीमित करने के उद्देश्य से भी उठाया गया है।

नौसैनिक नाकाबंदी का प्रभाव

वैश्विक स्तर पर

  • उच्च परिवहन लागत: क्षेत्र में जहाजों की संख्या में कमी तथा टैंकरों के लिए बढ़ते जोखिम से परिवहन लागत में वृद्धि हो सकती है, जिससे मध्य पूर्व से तेल पर निर्भर देशों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
  • तेल बाजार में व्यवधान: ईरान के तेल निर्यात पर प्रतिबंध वैश्विक बाजार से एक महत्त्वपूर्ण आपूर्ति स्रोत को अलग कर देगा।
    • उदाहरण: केपलर के अनुसार, ईरान ने मार्च 2026 में 1.84 मिलियन बैरल प्रतिदिन (bpd) कच्चे तेल का निर्यात किया तथा अप्रैल 2026 में अब तक 1.71 मिलियन bpd निर्यात किया है, जबकि वर्ष 2025 में वार्षिक औसत 1.68 मिलियन bpd था।
  • युद्धविराम पर खतरा: यह नाकाबंदी कूटनीति से हटकर एक दबावपूर्ण दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिससे मध्य पूर्व में तनाव बढ़ सकता है और ईरान–अमेरिका के बीच युद्धविराम के उल्लंघन की आशंका उत्पन्न हो सकती है।

भारत पर प्रभाव

  • आयात बिल में वृद्धि और मुद्रास्फीति दबाव: वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से भारत का आयात बिल बढ़ेगा और उसकी उच्च आयात निर्भरता के कारण मुद्रास्फीति दबाव उत्पन्न होगा।
  • ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा: भारत अपने कच्चे तेल का 80–85% से अधिक आयात करता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है, जिससे आपूर्ति में व्यवधान की स्थिति में ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
  • विदेश नीति में संतुलन की चुनौती: भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के साथ अपने संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखने के साथ-साथ अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को भी बनाए रखना होगा।
  • ऊर्जा स्रोतों में विविधीकरण: भारत को पश्चिम एशिया में अस्थिरता से उत्पन्न जोखिम को कम करने हेतु रूस, अमेरिका और अफ्रीका जैसे देशों से कच्चे तेल के आयात में वृद्धि कर विविधीकरण करना पड़ सकता है।

नौसैनिक नाकाबंदियों की समयरेखा: एक संक्षिप्त अवलोकन

क्रम संख्या घटना विवरण
1 पेलोपोनेसियन युद्ध एथेंस ने अपने नौसेना का उपयोग स्पार्टन सहयोगियों की नाकेबंदी करने तथा एजियन सागर में समुद्री व्यापार को नियंत्रित करने के लिए किया, जिससे आपूर्ति को अवरुद्ध करने हेतु समुद्री शक्ति के प्रारंभिक उपयोग का प्रदर्शन हुआ।
2 नेपोलियन युद्ध — फ्राँस की ब्रिटिश नाकेबंदी रॉयल नेवी ने वर्षों तक फ्राँसीसी बंदरगाहों की नाकेबंदी की, जिससे नेपोलियन के व्यापार को गंभीर क्षति पहुँची और उसकी पराजय में योगदान मिला।
3 अमेरिकी गृहयुद्ध —  यूनियन की “एनाकोंडा योजना” ने ‘कन्फेडरेट’ बंदरगाहों को सील कर दिया, जिससे दक्षिण को हथियारों, वस्तुओं और निर्यात आय से वंचित कर दिया गया।
4 प्रथम विश्वयुद्ध — जर्मनी की मित्र राष्ट्रों द्वारा नाकेबंदी ब्रिटेन ने जर्मनी की नाकाबंदी की, जिससे गंभीर अव्यवस्था उत्पन्न हुई और जर्मन युद्ध प्रयास तथा नागरिक मनोबल कमजोर हुआ।
5 द्वितीय विश्वयुद्ध — अटलांटिक एवं प्रशांत नाकेबंदियाँ मित्र राष्ट्रों की नौसैनिक शक्ति ने धुरी राष्ट्रों के समुद्री मार्गों को सीमित किया; यू-बोट्स और प्रत्युत्तर नाकेबंदियों ने समुद्री नियंत्रण को युद्ध का केंद्रीय तत्त्व बना दिया।
6 क्यूबा मिसाइल संकट — “नौसेना नाकाबंदी” अमेरिका ने “नाकेबंदी” (युद्ध का कार्य) शब्द से बचते हुए सोवियत मिसाइलों को क्यूबा तक पहुँचने से रोकने हेतु “नाकाबंदी” लागू की।

PwonlyIAS विशेष

संबंधित अवधारणा

नौसैनिक नाकाबंदी क्या है?

  • नौसैनिक नाकाबंदी एक लक्षित समुद्री रणनीति है, जिसमें कोई राष्ट्र विदेशी तट के समीप नौसैनिक पोतों और विमानों की तैनाती कर विशेष वस्तुओं, विशेषकर सैन्य उपकरणों के प्रवेश या निकास को रोकता है।
  • पूर्ण नाकेबंदी से भिन्नता: पूर्ण नाकेबंदी के विपरीत, क्वारंटीन एक सीमित एवं दबावकारी उपाय है, जो औपचारिक रूप से युद्ध की घोषणा किए बिना गतिविधियों को प्रतिबंधित करता है।
  • पूर्व उदाहरण
    • यद्यपि नाकेबंदी को सामान्यतः युद्ध संबंधी कार्य माना जाता है, तथापि वर्ष 1962 में जॉन एफ. केनेडी द्वारा ‘क्वारंटीन’ शब्द का उपयोग किया गया, ताकि आक्रामक हथियारों पर एक सीमित नाकाबंदी को उचित ठहराया जा सके।

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