संदर्भ
आम आदमी पार्टी (AAP) ने राज्यसभा के सभापति से संपर्क कर राघव चड्ढा के नेतृत्व में सात सांसदों को उनके दल छोड़ने तथा कथित रूप से भारतीय जनता पार्टी में विलय के प्रयास के बाद अयोग्य ठहराने की माँग की है।
आम आदमी पार्टी द्वारा उठाए गए प्रमुख मुद्दे
- दल-बदल विरोधी कानून का उल्लंघन: आम आदमी पार्टी का तर्क है कि सांसदों का त्याग-पत्र तथा विलय का प्रयास दसवीं अनुसूची का उल्लंघन करता है, जो स्वेच्छा से दल की सदस्यता छोड़ने पर अयोग्यता निर्धारित करती है।
- “विलय” के दावे की वैधता पर प्रश्न: पार्टी ने इस कथित विलय को चुनौती देते हुए कहा है कि यह पैरा 4 के अंतर्गत निर्धारित संवैधानिक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है।
- इसके अनुसार, मूल राजनीतिक दल का किसी अन्य दल में विलय होना चाहिए तथा विलय के पश्चात् उसके कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य उस विलय से सहमत हों और उसे स्वीकार करें।
- सभापति से शीघ्र कार्रवाई की माँग: आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा के सभापति से त्वरित कार्यवाही करने तथा समयबद्ध निर्णय देने का आग्रह किया है, ताकि संवैधानिक नैतिकता को बनाए रखा जा सके और प्रावधानों के दुरुपयोग को रोका जा सके।
दल-बदल क्या है?
- यह उस स्थिति को संदर्भित करता है, जब कोई निर्वाचित प्रतिनिधि जिस राजनीतिक दल के टिकट पर चुना गया हो, उसे छोड़कर किसी अन्य दल में शामिल हो जाए या निर्दलीय बन जाए।
- दल-बदल को इस प्रकार परिभाषित किया गया है—“किसी स्थिति या संबद्धता को त्यागकर प्रायः किसी विरोधी समूह में शामिल होना।”
- अस्थिरता उत्पन्न करता है: दल-बदल विधायी बहुमत को बदलकर राजनीतिक स्थिरता को बाधित करता है तथा लोकतांत्रिक जनादेश को कमजोर करता है।
- अलोकतांत्रिक प्रकृति: दल-बदल से सरकारों की अस्थिरता बढ़ती है, राजनीतिक अवसरवाद को प्रोत्साहन मिलता है तथा जनता का विश्वास निर्वाचित प्रतिनिधियों पर कम होता है।
दल-बदल विरोधी कानून के बारे में
- इसे 52वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से लागू किया गया, जिसके द्वारा दसवीं अनुसूची को भारतीय संविधान में जोड़ा गया।
- उद्देश्य: निर्वाचित विधायकों को दल बदलने, पार्टी व्हिप का उल्लंघन करने या स्वेच्छा से दल की सदस्यता त्यागने से रोकना।
- निर्णयकारी प्राधिकरण: दल-बदल के कारण अयोग्यता से संबंधित प्रश्नों का निर्णय संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी द्वारा किया जाता है:
- राज्यसभा में सभापति
- लोकसभा में अध्यक्ष
- विधानसभा में अध्यक्ष
- विधान परिषद में सभापति।
- प्रक्रिया: सामान्यतः पीठासीन अधिकारी दल-बदल के मामले में तभी कार्रवाई कर सकते हैं, जब उन्हें सदन के किसी सदस्य से औपचारिक शिकायत प्राप्त हो।
- अंतिम निर्णय लेने से पूर्व, संबंधित सदस्य को अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाता है।
- दल-बदल के आधार
- स्वेच्छा से सदस्यता का त्याग: यदि कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से अपने राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है।
- पार्टी निर्देश के विरुद्ध मतदान: यदि वह अपने दल या अधिकृत व्यक्ति द्वारा दिए गए निर्देश के विरुद्ध मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है, बिना पूर्व अनुमति प्राप्त किए।
- निर्दलीय सदस्य: यदि कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
- नामित सदस्य: यदि कोई नामित सदस्य सदन में अपनी सीट ग्रहण करने की तिथि से छह माह की अवधि समाप्त होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो वह अयोग्य हो जाता है।
- हालाँकि, वह अपनी सीट ग्रहण करने के छह माह के भीतर किसी भी राजनीतिक दल में शामिल हो सकता है, बिना अयोग्यता के।
- अपवाद: कानून में कुछ अपवाद भी हैं, जैसे कि विधायी दल के दो-तिहाई सदस्यों द्वारा समर्थित विलय तथा पीठासीन अधिकारियों द्वारा स्वैच्छिक त्याग-पत्र।
- समय-सीमा का अभाव: वर्तमान में दल-बदल मामलों पर निर्णय लेने के लिए कोई निर्धारित समय-सीमा नहीं है, जिससे विलंब की संभावना बनी रहती है।
- न्यायिक पुनरावलोकन: दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अध्यक्ष/सभापति के निर्णय न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन होते हैं।
91वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के प्रमुख प्रावधान
- मंत्रिपरिषद की सीमा: केंद्र की मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री सहित कुल मंत्रियों की संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15% से अधिक नहीं हो सकती है।
- राज्य मंत्रिपरिषद की सीमा: किसी राज्य की मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री सहित कुल मंत्रियों की संख्या विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15% तक सीमित होती है, साथ ही न्यूनतम 12 मंत्रियों का प्रावधान किया गया है।
- दिल्ली मंत्रिपरिषद: दिल्ली मंत्रिपरिषद उसकी विधानसभा के कुल सदस्यों के 10% तक सीमित है।
- मंत्रिपद हेतु अयोग्यता: संसद या राज्य विधानमंडल का कोई सदस्य यदि दल-बदल के कारण अयोग्य घोषित होता है, तो वह मंत्री नियुक्त होने के लिए भी अयोग्य होगा।
- विभाजन प्रावधान की सीमा में वृद्धि: दल के विभाजित होने की सीमा को एक-तिहाई (52वाँ संशोधन अधिनियम) से बढ़ाकर दो-तिहाई सदस्यों की सहमति की शर्त के साथ निर्धारित किया गया।
- इससे छोटे स्तर के दल-बदल को कठिन बनाया गया तथा ऐसे राजनीतिक कृत्यों में कमी आई।
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दल-बदल विरोधी कानून के लाभ
- स्थिरता को प्रोत्साहन: यह कानून व्यक्तिगत लाभ से प्रेरित बार-बार दल बदलने को रोककर राजनीतिक स्थिरता को बढ़ावा देता है।
- पार्टी अनुशासन: यह पार्टी अनुशासन को सुदृढ़ करता है, जिससे सदस्य महत्त्वपूर्ण मतदान में पार्टी नीतियों का पालन करते हैं।
- अलोकतांत्रिक प्रथाओं पर नियंत्रण: यह निर्वाचन जनादेश की रक्षा करता है तथा “धोखेबाजी” और अवसरवादी गठबंधनों की संभावना को कम करता है।
- यह निर्वाचित सरकारों के मध्यावधि पतन को रोककर शासन की निरंतरता सुनिश्चित करता है।
दल-बदल विरोधी कानून की सीमाएँ
- अनिश्चित निर्णय: अध्यक्ष/सभापति द्वारा अयोग्यता से संबंधित मामलों पर निर्णय लेने के लिए कोई निर्धारित समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है, जिससे दीर्घ विलंब तथा चयनात्मक निर्णय की स्थिति उत्पन्न होती है।
- राजनीतिक पक्षपात: अध्यक्ष के विवेकाधीन अधिकार राजनीतिक पक्षपात से प्रभावित हो सकते हैं, जिससे निष्पक्ष निर्णय प्रभावित होता है।
- कानून को दरकिनार करना: दो-तिहाई विलय अपवाद एक कमी/लूपहोल की स्थिति उत्पन्न करता है, जिसके माध्यम से योजनाबद्ध दल-बदल को विलय के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
- मत की स्वतंत्रता पर सीमा: यह कानून विधायकों के वैध असहमति के अधिकार को सीमित करता है, क्योंकि उन्हें सामान्य नीतिगत मामलों में भी पार्टी व्हिप का पालन करने के लिए बाध्य किया जाता है।
भारत में दल-बदल विरोधी कानून से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय:
- किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू एवं अन्य (1992): सर्वोच्च न्यायालय ने दसवीं अनुसूची की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा तथा यह निर्णय दिया कि दल-बदल विरोधी कानून के अंतर्गत अध्यक्ष का निर्णय न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन होगा।
- दुर्भावना अथवा निर्णय-प्रक्रिया में प्रक्रियात्मक त्रुटि/विकृति जैसे आधारों पर संभव है।
- रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ (1994): न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि “स्वेच्छा से सदस्यता त्यागना” केवल औपचारिक त्याग-पत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि विधायक के आचरण से भी यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उसने दल की सदस्यता छोड़ दी है।
- केशम मेघचंद्र सिंह बनाम अध्यक्ष, मणिपुर विधानसभा (2020): न्यायालय ने निर्देश दिया कि अपवादात्मक परिस्थितियों के अलावा, दल-बदल से संबंधित याचिकाओं का निपटारा सामान्यतः तीन माह के भीतर किया जाना चाहिए।
साथ ही, न्यायालय ने यह भी अनुशंसा की कि ऐसे मामलों के निर्णय हेतु अध्यक्ष के स्थान पर एक स्वतंत्र अधिकरण स्थापित किया जाए।
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दल-बदल विरोधी कानून को सुदृढ़ करने हेतु सिफारिशें
- दिनेश गोस्वामी समिति (1990): इसने सिफारिश की कि अयोग्यता को केवल विश्वास मत, धन विधेयक तथा राष्ट्रपति के अभिभाषण तक सीमित किया जाए।
- हलीम समिति (1994): इसने “स्वेच्छा से सदस्यता त्यागने” की स्पष्ट परिभाषा निर्धारित करने तथा निष्कासित सदस्यों पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया।
- 170वीं विधि आयोग रिपोर्ट (1999): इसने दल बदल के सभी रूपों पर अयोग्यता को लागू करने तथा पार्टी के कार्य संचालन में पारदर्शिता को सुदृढ़ करने का प्रस्ताव रखा।
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग: इसने सिफारिश की कि दल-बदल से संबंधित निर्णय को निर्वाचन आयोग की बाध्यकारी सलाह पर कार्य करते हुए राष्ट्रपति या राज्यपाल को स्थानांतरित किया जाए।
- 255वीं विधि आयोग रिपोर्ट (2015): इसने कानून के समग्र पुनर्गठन की सिफारिश की, जिसमें केवल दल की सदस्यता के बजाय सदस्यों के आचरण पर अधिक ध्यान केंद्रित करने का प्रस्ताव किया गया।
निष्कर्ष
यह प्रकरण भारत के दल-बदल विरोधी ढाँचे में निहित कमियों को उजागर करता है, जहाँ राजनीतिक पुनर्संरेखण और अवसरवादी दल-बदल को रोकने हेतु संवैधानिक सुरक्षा उपायों के मध्य संतुलन स्थापित करने से संबंधित चुनौती उत्पन्न होती है।