संदर्भ
केंद्र सरकार ने मेटा को नोटिस जारी किया है, क्योंकि रिपोर्टों में इंस्टाग्राम पर ‘बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री’ (CSEAM) से संबंधित विज्ञापनों का खुलासा हुआ है। सरकार ने ऐसी सामग्री को तत्काल हटाने का निर्देश दिया है तथा भारत के डिजिटल सुरक्षा कानूनों के अनुपालन के संबंध में स्पष्टीकरण भी माँगा है।
सरकारी कार्रवाई एवं हालिया घटनाक्रम
- MeitY का नोटिस: इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने मेटा को इंस्टाग्राम पर बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री (CSEAM) तक पहुँच को सुगम बनाने वाले सभी विज्ञापनों एवं सामग्री को तत्काल निष्क्रिय करने का निर्देश दिया है तथा सात दिनों के भीतर विस्तृत अनुपालन प्रतिवेदन प्रस्तुत करने को कहा है।
- तात्कालिक कारण: यह कार्रवाई BBC Eye की जाँच के बाद की गई, जिसमें खुलासा हुआ कि इंस्टाग्राम पर कथित रूप से ऐसे सशुल्क विज्ञापन प्रदर्शित किए जा रहे थे, जो उपयोगकर्ताओं को भारत में बाल यौन शोषण सामग्री बेचने वाले टेलीग्राम चैनलों से जोड़ रहे थे।
- मंत्रिस्तरीय हस्तक्षेप: यह नोटिस कथित रूप से केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री के निर्देशों के पश्चात् जारी किया गया। मेटा की प्रतिक्रिया की समीक्षा के बाद आगे की विनियामक कार्रवाई पर विचार किया जाएगा।
- मेटा की प्रतिक्रिया: मेटा ने बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) के प्रति अपनी शून्य-सहिष्णुता नीति को दोहराते हुए कहा कि वह स्वचालित पहचान प्रौद्योगिकियों का उपयोग करता है, किंतु अपराधी उसके सामग्री अनुशीलन तंत्र से बच निकलने के निरंतर प्रयास करते रहते हैं।
बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) के बारे में
- यह ऐसी किसी भी दृश्य, श्रव्य, डिजिटल अथवा कंप्यूटर-जनित सामग्री को संदर्भित करती है, जिसमें बच्चों के यौन शोषण अथवा यौन उत्पीड़न का चित्रण किया गया हो या उसे सुगम बनाया गया हो।
- इस शब्द ने पूर्व में प्रचलित बाल अश्लीलता अभिव्यक्ति का स्थान ले लिया है, क्योंकि यह स्वीकार करता है कि ऐसी सामग्री सहमति-आधारित गतिविधि नहीं, बल्कि बच्चों के साथ हुए यौन शोषण का अभिलेखीकरण है।
- भारत में कानूनी स्थिति: बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) का निर्माण, अधिग्रहण, भंडारण, प्रेषण, विज्ञापन तथा वितरण, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के प्रासंगिक प्रावधानों के अंतर्गत दंडनीय अपराध हैं।
- वैश्विक सहयोग: इंटरपोल जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ पहचानी गई बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) का डेटाबेस बनाए रखती हैं तथा जाँच, पीड़ितों की पहचान और समन्वित विधि-प्रवर्तन कार्रवाई में सदस्य देशों की सहायता करती हैं।
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विधिक एवं विनियामक ढाँचा
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000: अश्लील, स्पष्ट यौन सामग्री तथा बच्चों से संबंधित स्पष्ट यौन सामग्री से संबंधित धाराएँ इलेक्ट्रॉनिक मंचों के माध्यम से ऐसी सामग्री के प्रकाशन, प्रेषण अथवा उसे सुगम बनाने पर कठोर आपराधिक दंड का प्रावधान करती हैं।
- सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021: सोशल मीडिया मध्यस्थों के लिए समुचित सावधानी (Due Diligence) बरतना, निर्धारित समय-सीमा के भीतर अवैध सामग्री (जिसमें बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री (CSAM) भी सम्मिलित है) को तत्काल हटाना तथा विधि-प्रवर्तन एजेंसियों के साथ सहयोग करना अनिवार्य है।
- इन नियमों का पालन न करने पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के अंतर्गत उपलब्ध सुरक्षित आश्रय (Safe Harbour) संरक्षण समाप्त हो सकता है।
- यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012: यह बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) के निर्माण, कब्जे, प्रेषण, भंडारण तथा वितरण को अपराध घोषित करता है तथा बाल पीड़ितों के लिए कठोर संरक्षणात्मक प्रावधान प्रदान करता है।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023: यह बच्चों के यौन शोषण, अश्लीलता तथा प्रौद्योगिकी-सक्षम अपराधों से संबंधित अपराधों को दंडित करके बाल संरक्षण को और सुदृढ़ बनाती है।
ऑनलाइन बाल यौन शोषण से निपटने हेतु संस्थागत तंत्र
- राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP): गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा संचालित यह पोर्टल साइबर अपराधों की रिपोर्टिंग के लिए स्थापित किया गया है, जिसमें बच्चों के विरुद्ध अपराधों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
- भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C): यह जाँच, रोकथाम, क्षमता निर्माण तथा साइबर अपराध आसूचना के लिए राष्ट्रीय समन्वय एजेंसी के रूप में कार्य करता है।
- केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI): यह इंटरपोल से बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) होस्ट करने वाली वेबसाइटों से संबंधित अलर्ट प्राप्त करता है तथा ऐसी सामग्री को अवरुद्ध करने के लिए इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (ISPs) के साथ समन्वय स्थापित करता है।
- इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISPs): इन्हें सरकारी निर्देशों तथा विधि-प्रवर्तन एजेंसियों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) होस्ट करने वाली वेबसाइटों को अवरुद्ध करना अनिवार्य है।
प्रमुख चुनौतियाँ
- कूटबद्ध मंच: अपराधियों का ‘एंड-टू-एंड’ कूटबद्ध मंचों तथा निजी संदेश चैनलों की ओर स्थानांतरण, ऐसी गतिविधियों का पता लगाने तथा कानून का प्रवर्तन करने को अत्यधिक कठिन बना देता है।
- एल्गोरिद्मिक प्रवर्द्धन: स्वचालित अनुशंसा प्रणालियाँ तथा विज्ञापन उपकरण, पहचान होने से पूर्व ही अनजाने में हानिकारक अथवा अवैध सामग्री के प्रसार को बढ़ावा दे सकते हैं।
- सीमापार अधिकार-क्षेत्र: डिजिटल मंच वैश्विक स्तर पर संचालित होते हैं, जिससे विभिन्न अधिकार-क्षेत्रों में जाँच, साक्ष्य-संग्रहण तथा कानून के प्रवर्तन में कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं।
- AI-जनित शोषण सामग्री: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तथा डीपफेक प्रौद्योगिकियों में प्रगति से कृत्रिम बाल यौन शोषण सामग्री के निर्माण का जोखिम बढ़ रहा है तथा सामग्री अनुशीलन और अधिक जटिल होता जा रहा है।
- गोपनीयता एवं सुरक्षा के मध्य संतुलन: सरकारों के समक्ष ऑनलाइन बाल संरक्षण सुनिश्चित करने के साथ-साथ गोपनीयता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा आँकड़ा संरक्षण को सुरक्षित रखने की चुनौती है।
- विज्ञापन-प्रौद्योगिकी प्रशासन की विफलता: यह घटना केवल सामग्री अनुशीलन की कमियों को ही नहीं, बल्कि विज्ञापन अनुमोदन प्रणाली, कीवर्ड जाँच, विज्ञापनदाता सत्यापन तथा प्रकाशन-पश्चात् निगरानी में विद्यमान कमजोरियों को भी उजागर करती है।
आगे की राह
- मंचों की जवाबदेही सुदृढ़ करना: समुचित सावधानी (Due Diligence) संबंधी दायित्वों के कठोर अनुपालन को सुनिश्चित किया जाए, जिसमें सक्रिय पहचान, त्वरित निष्कासन तंत्र तथा आवधिक पारदर्शिता प्रतिवेदनों की व्यवस्था सम्मिलित हो।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उत्तरदायित्वपूर्ण उपयोग: बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) के प्रसार का पता लगाने एवं उसे रोकने के लिए उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) उपकरणों, पहचान संबंधी प्रौद्योगिकियों तथा व्यवहारगत विश्लेषण का उपयोग किया जाए, साथ ही मानवीय पर्यवेक्षण भी सुनिश्चित किया जाए।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सुदृढ़ करना: इंटरपोल, वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों तथा विदेशी विधि-प्रवर्तन एजेंसियों के साथ सीमापार जाँच एवं समयबद्ध सूचना-साझाकरण के लिए सहयोग को सुदृढ़ किया जाए।
- बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा में सुधार: डिजिटल साक्षरता, अभिभावकीय जागरूकता, बाल सुरक्षा शिक्षा तथा सुगम शिकायत-रिपोर्टिंग तंत्र का विस्तार किया जाए, ताकि ऑनलाइन शोषण की रोकथाम सुनिश्चित की जा सके।
- विनियामक एवं विज्ञापन-प्रौद्योगिकी पर्यवेक्षण को सुदृढ़ करना: उभरते जोखिमों, जिनमें AI-जनित शोषण सामग्री भी सम्मिलित है, के समाधान हेतु सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 का समय-समय पर अद्यतन किया जाए। साथ ही, अवयस्कों, स्पष्ट कीवर्ड, निजी संदेश लिंक तथा तृतीय-पक्ष पुनर्निर्देशन से संबंधित सामग्री के लिए जोखिम-आधारित विज्ञापन जाँच अनिवार्य की जाए।
निष्कर्ष
मेटा–CSAM विवाद यह रेखांकित करता है कि बाल सुरक्षा केवल घटना के बाद सामग्री हटाने तक सीमित नहीं हो सकती है। भारत को मंचों की सुदृढ़ जवाबदेही, सक्रिय पहचान तंत्र, उत्तरदायित्वपूर्ण विज्ञापन-प्रौद्योगिकी प्रशासन तथा सीमापार सहयोग को सशक्त बनाने की आवश्यकता है, साथ ही अधिकार-सम्मत, पारदर्शी एवं गोपनीयता-सचेत प्रवर्तन भी सुनिश्चित करना होगा।