‘कुकी-जो’ समूह वार्ता

2 May 2026

संदर्भ

वर्ष 2026 में मणिपुर में पुनः बढ़े जातीय तनावों के बीच, केंद्र सरकार, गृह मंत्रालय तथा ‘कुकी-जो’ समूहों (Kuki-Zo Group) के बीच वार्ता पुनः प्रारंभ हुई।

वार्ता की पृष्ठभूमि

  • सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस (SoO) फ्रेमवर्क: SoO समझौता वर्ष 2008 में कुकी नेशनल ऑर्गेनाइजेशन और यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट के साथ हस्ताक्षरित किया गया था, जो उग्रवादी समूहों के साथ एक युद्धविराम तंत्र प्रदान करता है।
    • इसे सितंबर 2025 में राष्ट्रपति शासन के अंतर्गत संशोधित शर्तों के साथ पुनः नवीनीकृत किया गया।
  • वर्ष 2023 के बाद की जातीय हिंसा: मई 2023 से कुकी-जो और मैतेई समुदायों के बीच जातीय संघर्षों ने बड़े पैमाने पर विस्थापन और असुरक्षा उत्पन्न की।
    • इस हिंसा ने माँगों को स्वायत्तता से बदलकर राजनीतिक पृथक्करण की दिशा में मोड़ दिया।
  • राजनीतिक वार्ता की पुनः शुरुआत: मई 2026 में एक लंबे अंतराल के बाद वार्ता पुनः प्रारंभ हुई, जिसमें केंद्र सरकार और मणिपुर राज्य के अधिकारी शामिल हुए।
    • चर्चाओं का केंद्र सुरक्षा व्यवस्था तथा SoO के पुनर्स्थापन पर रहा।
  • राजनीतिक समाधान की माँग: कुकी-जो समूहों ने पुनः विधायिका सहित केंद्रशासित प्रदेश की माँग दोहराई तथा यथास्थिति में वापसी को अस्वीकार किया।

कुकी-जो’ समूहों के बारे में

  • कुकी-जो समूह मणिपुर, मिजोरम, असम और म्याँमार तथा बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में निवास करने वाले विभिन्न जातीय जनजातियों का एक समूह है।
  • ये तिब्बतो-बर्मी भाषा परिवार से संबंधित हैं तथा अधिकांशतः ईसाई धर्म का पालन करते हैं।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • ये मुख्यतः इंफाल घाटी के चारों ओर स्थित पहाड़ी जिलों में निवास करते हैं।
    • इनका समाज जनजातीय पहचान तथा मुखिया व्यवस्था आधारित प्रशासन पर आधारित है।
  • संबंधित समूह एवं संगठन 
    • प्रमुख राजनीतिक-उग्रवादी मंचों में SoO समझौते के अंतर्गत कुकी नेशनल ऑर्गेनाइजेशन (KNO) और यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट (UPF) शामिल हैं।
    • कुकी-जो काउंसिल सामाजिक-राजनीतिक हितों का प्रतिनिधित्व करती है।
  • मुख्य माँग: इनकी प्रमुख माँग एक अलग प्रशासनिक इकाई (विधायिका सहित केंद्र शासित प्रदेश) की है, ताकि सुरक्षा, स्वायत्तता तथा भूमि अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

क्षेत्र की वर्तमान समस्याएँ

  • जातीय संघर्ष और असुरक्षा: मैतेई और नागा समूहों के साथ लगातार संघर्षों ने हत्या, विस्थापन और संपत्ति के विनाश की स्थिति उत्पन्न की है।
  • भूमि और पहचान संबंधी चिंताएँ: जनजातीय भूमि अधिकारों को लेकर विवाद जारी हैं तथा जनसांख्यिकीय और प्रशासनिक हाशिए पर जाने की आशंका बनी हुई है।
    • मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल करने से तनाव और बढ़ा है।
  • मानवीय संकट: 60,000 से अधिक विस्थापित व्यक्तियों को पुनर्वास तथा घरों और संस्थानों के पुनर्निर्माण की आवश्यकता है।
    • राहत और पुनर्वास कार्य धीमा और अपर्याप्त बना हुआ है।

आगे की राह

  • समावेशी राजनीतिक संवाद: सभी हितधारकों को शामिल करते हुए निरंतर वार्ता आवश्यक है, ताकि एक संवैधानिक और शांतिपूर्ण समाधान सुनिश्चित किया जा सके।
  • सुरक्षा और शासन का सुदृढ़ीकरण: तटस्थ केंद्रीय बलों की तैनाती तथा बेहतर समन्वय के माध्यम से कानून-व्यवस्था को पुनः स्थापित किया जा सकता है।
  • संतुलित स्वायत्तता ढाँचा: संवैधानिक सीमाओं के भीतर विकेंद्रीकृत शासन या स्वायत्तता में वृद्धि जैसे विकल्पों पर विचार एक मध्य मार्ग प्रदान कर सकते हैं।

निष्कर्ष

यह मुद्दा एक ऐसे संतुलित दृष्टिकोण की माँग करता है, जिसमें सुरक्षा, राजनीतिक समायोजन तथा मानवीय प्रतिक्रिया का समन्वय हो, ताकि मणिपुर में दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।

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