संदर्भ
हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भारत भर में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के असमान अनुपालन पर चिंता व्यक्त की तथा 1 अप्रैल, 2026 से नियमों के प्रभावी होने से पूर्व पूर्ण क्रियान्वयन सुनिश्चित करने हेतु अखिल-भारतीय निर्देश जारी किए।
संबंधित तथ्य
- यह आदेश भोपाल नगर निगम से संबंधित अपीलों तथा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के अंतर्गत प्रवर्तन संबंधी कमियों के संदर्भ में पारित किया गया।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के प्रमुख बिंदु
- पर्यावरण का अधिकार: न्यायालय ने बल दिया कि स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार, जीवन के अधिकार (अनुच्छेद-21) का अभिन्न अंग है।
- नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (MSW) की उपेक्षा स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों को प्रभावित करती है।
- असमान अनुपालन: गीले, सूखे और खतरनाक अपशिष्ट के रूप में स्रोत पर पृथक्करण अनेक शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में पूर्णतः लागू नहीं हो पाया है।
- विशाल डंपसाइट अभी भी सक्रिय हैं, यद्यपि जैव-उपचार (बायो-रीमेडिएशन) के प्रयास प्रारंभ हो चुके हैं।
- भूमिकाएँ और उत्तरदायित्व: पार्षद, महापौर, निगम पार्षद, वार्ड सदस्य स्रोत-स्तर पृथक्करण के लिए जन-जागरूकता के प्रमुख प्रवर्तक होंगे।
- जिला कलेक्टर अवसंरचना का ऑडिट करेंगे, स्थानीय निकायों की निगरानी करेंगे तथा समस्याओं की सूचना मुख्य सचिव को देंगे।
- स्थानीय निकाय 100% अनुपालन हेतु समय-सीमा निर्धारित करेंगे, फोटोग्राफिक साक्ष्य प्रस्तुत करेंगे तथा थोक अपशिष्ट उत्पादकों से संवाद स्थापित करेंगे।
- प्रवर्तन उपाय: त्रिस्तरीय प्रवर्तन व्यवस्था में शामिल हैं:
- प्रारंभिक अनुपालन न होने पर तत्काल जुर्माना।
- निरंतर अवहेलना की स्थिति में पर्यावरणीय कानूनों के अंतर्गत आपराधिक अभियोजन।
- तात्कालिक उल्लंघनों के लिए संचालनीय न्यायालयों की तैनाती।
- अवसंरचना और जन-जागरूकता
- प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड चार स्तरीय पृथक्करण अवसंरचना को शीघ्र स्थापित करें।
- पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय विद्यालयी पाठ्यक्रम में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) को सम्मिलित करे।
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 का सारांश स्थानीय भाषाओं में अनूदित किया जाए।
- अपशिष्ट न्यूनिकरण, घरेलू कंपोस्टिंग, स्वच्छता अपशिष्ट निपटान तथा उचित पृथक्करण पर जन-जागरूकता अभियान चलाए जाएँ।
- समय-सीमा
- सभी थोक अपशिष्ट उत्पादक तथा स्थानीय निकाय 31 मार्च, 2026 तक पूर्णतः अनुपालन सुनिश्चित करें।
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026, 1 अप्रैल, 2026 से प्रभावी होंगे।
ठोस अपशिष्ट
- ठोस अपशिष्ट से आशय उन सभी अवांछित एवं परित्यक्त ठोस या अर्द्ध-ठोस पदार्थों से है, जो घरेलू, वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों, संस्थानों, उद्योगों, निर्माण गतिविधियों तथा कृषि से उत्पन्न होते हैं।
- ठोस अपशिष्ट में रसोई अपशिष्ट, प्लास्टिक, कागज, धातु, काँच, सड़क, उद्यान अपशिष्ट, निर्माण अपशिष्ट तथा औद्योगिक अवशेष सम्मिलित हैं।
- ठोस अपशिष्ट में गैसें सम्मिलित नहीं होतीं तथा सामान्यतः द्रव अपशिष्ट को इसमें शामिल नहीं किया जाता।
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ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 की प्रमुख विशेषताएँ
- चक्रीय अर्थव्यवस्था: इन नियमों में चक्रीय अर्थव्यवस्था तथा विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) के सिद्धांतों को समाहित किया गया है, जिससे संसाधन दक्षता और अपशिष्ट न्यूनीकरण को प्रोत्साहन मिले।
- प्रदूषक भुगतान सिद्धांत: पंजीकरण के बिना संचालन, मिथ्या प्रतिवेदन, जाली दस्तावेज तथा अनुचित अपशिष्ट प्रबंधन प्रथाओं सहित अनुपालन न करने पर पर्यावरणीय प्रतिकर अधिरोपित किया जाएगा।
- संस्थागत भूमिकाएँ: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) दिशा-निर्देश तैयार करेगा, जबकि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCBs) तथा प्रदूषण नियंत्रण समितियाँ (PCCs) पर्यावरणीय प्रतिकर अधिरोपित करेंगी।
- स्रोत पर अनिवार्य पृथक्करण: स्रोत पर चार अपशिष्ट धाराओं में अनिवार्य पृथक्करण अधिसूचित किया गया है।
- गीला अपशिष्ट: रसोई अपशिष्ट तथा जैव-अपघट्य पदार्थ सम्मिलित; इसे कंपोस्टिंग या जैव-मेथनीकरण के माध्यम से संसाधित किया जाएगा।
- सूखा अपशिष्ट: कागज, प्लास्टिक, धातु तथा काँच सम्मिलित; इसे अधिकृत सुविधाओं जैसे सामग्री पुनर्प्राप्ति केंद्रों (MRFs) के माध्यम से पुनर्चक्रित किया जाएगा।
- स्वच्छता अपशिष्ट: सेनेटरी नैपकिन, डायपर तथा समान अपशिष्ट; इन्हें सुरक्षित रूप से लपेटकर पृथक रूप से प्रबंधित किया जाएगा।
- विशेष देखभाल अपशिष्ट: ट्यूबलाइट, बैटरियाँ तथा खतरनाक घरेलू वस्तुएँ; इनके लिए विशेष प्रबंधन आवश्यक होगा।