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सहकारिता मंत्रालय के पाँच वर्ष: सहकारी आंदोलन का सुदृढ़ीकरण

10 Jul 2026

संदर्भ

हाल ही में 6 जुलाई, 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम् में सहकारिता मंत्रालय का 5वाँ ‘स्थापना दिवस’ मनाया गया।

संबंधित तथ्य

  • वर्ष 2021 में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय से पृथक कर स्थापित किए गए इस मंत्रालय द्वारा वर्तमान समय तक 152 से अधिक पहलें प्रारंभ की जा चुकी हैं।
  • इसकी स्थापना सहकार से समृद्धि” (Sahkar Se Samriddhi) के दृष्टिकोण को साकार करने हेतु एक समर्पित संस्थागत ढाँचा प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी।

सहकारी समितियाँ क्या हैं? 

  • सहकारी समिति एक स्वैच्छिक, लोकतांत्रिक संगठन है, जिसमें सदस्य अपनी सामान्य आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी उद्यम का संयुक्त रूप से स्वामित्व एवं प्रबंधन करते हैं।
  • भारत में सहकारी क्षेत्र: प्रमुख उदाहरण 
    • अमूल – दुग्ध क्रांति
    • इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड (IFFCO) – उर्वरक
    • कृभको (KRIBHCO) – उर्वरक
    • राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) – सहकारी वित्तपोषण।

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भारत के सहकारी क्षेत्र की प्रमुख विशेषताएँ 

  • त्रिस्तरीय संरचना: सामान्यतः प्राथमिक (ग्राम/स्थानीय), जिला/केंद्रीय तथा राज्य स्तरीय महासंघों के रूप में संगठित, जिससे जमीनी स्तर पर सहभागिता एवं समन्वय सुनिश्चित होता है।
  • स्वैच्छिक एवं लोकतांत्रिक सदस्यता: सभी पात्र व्यक्तियों के लिए सदस्यता खुली होती है तथा एक सदस्य, एक मत” के सिद्धांत पर आधारित होने के कारण पूँजी योगदान के विपरीत लोकतांत्रिक शासन सुनिश्चित होता है।
  • सदस्यों का स्वामित्व व नियंत्रण: सहकारी समितियों का स्वामित्व, प्रबंधन एवं संचालन उनके सदस्यों द्वारा उनके पारस्परिक आर्थिक एवं सामाजिक हितों की पूर्ति हेतु किया जाता है।
  • सेवा-उन्मुख स्वरूप: इनका प्रमुख उद्देश्य अधिकतम लाभ न होकर सदस्यों को सुलभ सेवाएँ प्रदान करना तथा उनके कल्याण में बढोतरी करना है।
  • विविध क्षेत्रों में उपस्थिति: सहकारी समितियाँ कृषि, दुग्ध, मत्स्य, बैंकिंग, आवास, उपभोक्ता वस्तुओं, हथकरघा, विपणन आदि क्षेत्रों में कार्यरत हैं तथा वर्तमान में सेवा क्षेत्र एवं निर्यात में भी विस्तार कर रही हैं।
  • ग्रामीण विकास पर विशेष बल: विशेषकर प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) के माध्यम से कृषि ऋण, कृषि आदानों की आपूर्ति, भंडारण, क्रय तथा विपणन उपलब्ध कराने में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका हैं।
  • संघीय स्वरूप: सहकारी समितियाँ मुख्यतः राज्य सूची की प्रविष्टि 32 के अंतर्गत राज्य का विषय हैं, जबकि बहुराज्यीय सहकारी समितियों के संबंध में विधि निर्माण का अधिकार संसद को प्राप्त है।
  • वैधानिक एवं संवैधानिक आधार: इनका संचालन राज्य सहकारी समिति अधिनियमों, बहुराज्यीय सहकारी समिति अधिनियम, 2002 तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के उपरांत लागू सीमा तक संविधान के भाग IXB के अंतर्गत किया जाता है।
  • सामुदायिक-आधारित आर्थिक मॉडल: सहकारी समितियाँ सामूहिक स्वामित्व, पारस्परिक सहयोग, अधिशेष के न्यायसंगत वितरण तथा सतत् विकास पर बल देती हैं और केवल लाभ-प्रेरित उद्यमों के विकल्प के रूप में कार्य करती हैं।

सहकारी समितियों का महत्त्व

  • समावेशी विकास: सदस्यों के मध्य आर्थिक लाभों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करती हैं।
  • सामूहिक उद्यमिता: सीमित संसाधनों वाले लोगों को संयुक्त स्वामित्व, प्रबंधन तथा जोखिम एवं लाभ साझा करने का अवसर प्रदान करती है।
  • ग्रामीण विकास: ऋण एवं कृषि सेवाएँ उपलब्ध कराकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करती हैं 
  • वित्तीय समावेशन: किसानों, स्वयं सहायता समूहों (SHGs) तथा निम्न-आय वर्ग के परिवारों को सुलभ संस्थागत ऋण उपलब्ध कराती हैं।
  • रोजगार सृजन: कृषि, दुग्ध, मत्स्य, हथकरघा, खुदरा व्यापार तथा सेवा क्षेत्र में आजीविका के अवसर उत्पन्न करती हैं।
  • सामाजिक समानता: महिलाओं, अनुसूचित जातियों (SCs), अनुसूचित जनजातियों (STs), लघु किसानों तथा अन्य वंचित वर्गों को लोकतांत्रिक स्वामित्व के माध्यम से सशक्त बनाती हैं।
  • सामुदायिक सहभागिता: एक सदस्य, एक मत” (One Member, One Vote) के सिद्धांत के माध्यम से जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को प्रोत्साहित करती हैं।
  • बाजार विफलताओं का समाधान: बाजार तक पहुँच में सुधार, मूल्यों का स्थिरीकरण तथा जहाँ निजी बाजार अनुपस्थित या अक्षम हों, वहाँ आवश्यक सेवाएँ उपलब्ध कराती हैं।

भारत के सहकारी क्षेत्र के समक्ष चुनौतियाँ

  • शासन संबंधी समस्याएँ: राजनीतिक हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार, कमजोर जवाबदेही तथा अव्यावसायिक प्रबंधन ने सहकारी संस्थाओं की दक्षता, पारदर्शिता एवं स्वायत्तता को प्रभावित किया है, जिससे सदस्यों का विश्वास कम हुआ है तथा इनके विकास में बाधा उत्पन्न हुई है।
    • उदाहरण के लिए: भारत की 47.05% सहकारी समितियाँ बंद हैं या परिसमापन (लिक्विडेशन) की प्रक्रिया में हैं अथवा घाटे में चल रही हैं।
  • वित्तीय बाधाएँ: पूँजी तक सीमित पहुँच, आधुनिक प्रौद्योगिकी का कम उपयोग तथा भंडारण, प्रसंस्करण एवं लॉजिस्टिक्स जैसी अपर्याप्त अवसंरचना सहकारी समितियों की प्रतिस्पर्द्धात्मकता एवं विस्तार को सीमित करती है।
    •  उदाहरण: 10 मार्च, 2026 को केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया कि 8.48 लाख सहकारी समितियों में से 2.11 लाख घाटे में है तथा, 1.41 लाख निष्क्रिय तथा 47,688 परिसमापन की कगार पर हैं।
  • संघीय चिंताएँ: अनेक राज्यों का मानना है कि केंद्र के बढ़ते हस्तक्षेप से सहकारी शासन का केंद्रीकरण, राज्यों की स्वायत्तता में कमी तथा जमीनी स्तर पर सामुदायिक नियंत्रण कमजोर हो सकता है, जिससे सहकारी संघवाद की भावना प्रभावित होती है।
  • बाजार संबंधी चुनौतियाँ: सहकारी समितियों को बड़ी निजी कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ता है। साथ ही, सीमित पैमाने की अर्थव्यवस्था, कमजोर ब्रांडिंग, विपणन तथा निर्यात क्षमता के कारण इनकी बाजार हिस्सेदारी प्रभावित होती है।
  • सदस्यों की न्यूनतम भागीदारी: अनेक सहकारी समितियों में निष्क्रिय सदस्यता, जागरूकता का अभाव तथा निर्णय-निर्माण में सीमित सहभागिता लोकतांत्रिक शासन को कमजोर करती है और संस्थागत प्रभावशीलता को घटाती है।
  • तकनीकी आधुनिकीकरण का अभाव: अनेक सहकारी समितियाँ अभी भी कागजी अभिलेख-प्रबंधन तथा पुरानी व्यावसायिक प्रणालियों पर निर्भर हैं, जिससे डिजिटल शासन, परिचालन दक्षता तथा व्यापक बाजारों तक पहुँच सीमित रहती है।
  • क्षेत्रीय संकेंद्रण: अधिकांश सहकारी समितियाँ कृषि एवं ग्रामीण ऋण तक सीमित हैं, जबकि सेवा क्षेत्र, विनिर्माण, ई-कॉमर्स तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे उच्च-विकास वाले क्षेत्रों में इनकी उपस्थिति सीमित है।
  • मानव संसाधन का अभाव: कुशल पेशेवरों, प्रबंधकीय विशेषज्ञता तथा क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के अभाव के कारण नवाचार, व्यावसायिक विविधीकरण एवं सहकारी उद्यमों के प्रभावी प्रबंधन में बाधा उत्पन्न होती है।

भारत के सहकारी क्षेत्र के सुदृढ़ीकरण हेतु प्रमुख पहलें 

पहलें  विवरण एवं महत्त्व
राष्ट्रीय सहकारिता नीति, 2025

राष्ट्रीय सहकारिता नीति, 2025 आगामी दो दशकों (2025–2045) के दौरान सहकारी क्षेत्र के रूपांतरण, आधुनिकीकरण एवं व्यावसायिक प्रबंधन हेतु एक नवीन रूपरेखा है।

यह वैश्वीकरण एवं आधुनिक प्रौद्योगिकी से उत्पन्न नई चुनौतियों एवं अवसरों का समाधान करने के लिए राष्ट्रीय सहकारिता नीति, 2002 का स्थान लेती है।

आदर्श बहुराज्यीय सहकारी समितियाँ (संशोधन) अधिनियम, 2023 इसमें पारदर्शिता, निर्वाचन संबंधी उत्तरदायित्व, शिकायत निवारण, सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण, सहकारी लोकपाल की स्थापना तथा सहकारी समितियों के पुनर्वास से संबंधित प्रावधान सम्मिलित किए गए हैं।
विश्व की सबसे बड़ी विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण योजना (2023) प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) के माध्यम से वैज्ञानिक भंडारण विकसित कर कटाई उपरांत हानि घटाने, खाद्य सुरक्षा बढ़ाने और किसानों की आय में वृद्धि के लिए शुरू की गई।

सहकारी क्षेत्र में विश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना को 31 मई, 2023 को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित किया गया था तथा इसकी पायलट परियोजना 24 फरवरी, 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारंभकी गई थी।

PACS का कंप्यूटरीकरण 63,000 से अधिक प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) का डिजिटलीकरण किया जा रहा है, जिससे सुशासन, पारदर्शिता, लेखांकन, ऋण प्रसंस्करण एवं ग्रामीण सदस्यों को सेवा वितरण में सुधार किया जा सके।
सामान्य सेवा केंद्र (CSCs) के रूप में प्राथमिक कृषि ऋण समिति( PACS)  PACS को डिजिटल शासन सेवाएँ, बैंकिंग, बीमा, उपयोगिता भुगतान तथा अन्य नागरिक-केंद्रित सेवाएँ प्रदान कर बहु-सेवा संस्थानों के रूप में विकसित किया जा रहा है।
PACS की गतिविधियों का विस्तार आदर्श उपविधियों के माध्यम से PACS को डेयरी, मत्स्य पालन, भंडारण, एलपीजी वितरण, खुदरा विक्रय केंद्र, कस्टम हायरिंग केंद्र तथा जलापूर्ति सहित 25 से अधिक व्यावसायिक गतिविधियों में विविधीकरण की अनुमति दी गई है, जिससे उनकी वित्तीय व्यवहार्यता सुदृढ़ होती है।
राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस सभी सहकारी समितियों का व्यापक डिजिटल डेटाबेस तैयार किया जा रहा है, जिससे साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण, पारदर्शिता तथा बेहतर निगरानी सुनिश्चित की सके।
राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) में सुधार कृषि, डेयरी, मत्स्यपालन, भंडारण एवं ग्रामीण उद्योगों से संबंधित सहकारी समितियों को वित्तीय सहायता एवं परियोजना वित्तपोषण को सुदृढ़ किया गया है, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता एवं अवसंरचना में सुधार हो सके।
सहकारी समितियों हेतु कर सुधार केंद्रीय बजट के माध्यम से सहकारी समितियों पर अधिभार में कमी की गई है तथा अनेक क्षेत्रों में उन्हें कॉर्पोरेट कराधान के समकक्ष लाभ प्रदान किए गए हैं, जिससे उनकी प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़े तथा औपचारीकरण को प्रोत्साहन मिले।
राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड (NCEL) सहकारी संस्थाओं द्वारा उत्पादित कृषि एवं संबद्ध उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए स्थापित किया गया, जिससे लघु उत्पादकों को वैश्विक बाजारों तक पहुँच एवं आय वृद्धि सुनिश्चित हो सके।
राष्ट्रीय सहकारी ऑर्गेनिक्स लिमिटेड (NCOL) सहकारी संस्थाओं के माध्यम से जैविक उत्पादों के उत्पादन, ब्रांडिंग, प्रमाणीकरण एवं विपणन को बढ़ावा देने हेतु स्थापित किया गया, जिससे सतत् कृषि को प्रोत्साहन मिलता है।
भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड (BBSSL) गुणवत्तापूर्ण बीजों के उत्पादन, क्रय, प्रसंस्करण एवं वितरण में सहकारी संस्थाओं की भागीदारी सुदृढ़ करने हेतु स्थापित किया गया, जिससे बीज सुरक्षा एवं कृषि उत्पादकता में वृद्धि की जा सके।
राष्ट्रीय बहुराज्यीय सहकारी बीज समिति सहकारी नेटवर्क के माध्यम से उच्च गुणवत्ता वाले बीजों के अनुसंधान, विकास एवं वितरण को प्रोत्साहित करती है, जिससे देशभर में प्रमाणित बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके।

भारत में सहकारी समितियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

प्रावधान विवरण
अनुच्छेद-19(1)(c) संघों, संगठनों तथा सहकारी समितियों के गठन के मौलिक अधिकार की गारंटी प्रदान करता है। [इसे 97वें संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2011 द्वारा जोड़ा गया।]
अनुच्छेद-43B (राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व) राज्य को सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कार्यप्रणाली, लोकतांत्रिक नियंत्रण तथा व्यावसायिक प्रबंधन को प्रोत्साहित करने का निर्देश देता है।
भाग-IXB (अनुच्छेद 243ZH–243ZT) 97वें संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2011 द्वारा जोड़ा गया, जो सहकारी समितियों के शासन हेतु संवैधानिक ढाँचा प्रदान करता है। इसमें चुनाव, लेखा-परीक्षण तथा प्रबंधन से संबंधित प्रावधान सम्मिलित हैं।
राज्य सूची (सातवीं अनुसूची, सूची-II, प्रविष्टि 32) राज्य में कार्यरत सहकारी समितियों के गठन, विनियमन एवं परिसमापन से संबंधित कानून बनाने का अधिकार राज्य विधानमंडलों को प्रदान करती है।
संघ सूची (सातवीं अनुसूची, सूची-I, प्रविष्टि 44) दो या दो से अधिक राज्यों में कार्यरत बहुराज्यीय सहकारी समितियों से संबंधित कानून बनाने का अधिकार संसद को प्रदान करती है।

सहकारी, निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों का तुलनात्मक विश्लेषण

क्षेत्र मार्गदर्शक सिद्धांत मूल ध्येय वाक्य
सहकारी क्षेत्र सामूहिक स्वामित्व “पारस्परिक लाभ एवं समावेशी विकास”
निजी क्षेत्र बाजार प्रतिस्पर्द्धा “लाभ एवं दक्षता”
सार्वजनिक क्षेत्र सामाजिक कल्याण “लोकहित एवं राष्ट्रीय विकास”

आगे की राह: भारत के सहकारी क्षेत्र को सुदृढ़ बनाना

  • सहकारी स्वायत्तता सुनिश्चित करना: केंद्रीय सहयोग एवं राज्यों की संवैधानिक शक्तियों के मध्य संतुलन स्थापित करते हुए तथा राजनीतिक हस्तक्षेप को न्यूनतम रखकर सहकारी संघवाद की भावना को सुदृढ़ किया जाए।
  • व्यावसायिक सुशासन को बढ़ावा देना: योग्यता-आधारित प्रबंधन, नियमित लेखा-परीक्षा, पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित किए जाएँ तथा सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण एवं सहकारी लोकपाल जैसी संस्थाओं को सशक्त बनाया जाए।
  • डिजिटल रूपांतरण में तीव्रता लाना: सभी प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) का कंप्यूटरीकरण पूर्ण किया जाए, डिजिटल शासन का विस्तार किया जाए तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), ब्लॉकचेन एवं डिजिटल भुगतान प्रणालियों को अपनाकर दक्षता एवं पारदर्शिता बढ़ाई जाए।
  • वित्तीय स्थिरता सुदृढ़ करना: सुलभ संस्थागत ऋण तक पहुँच बढ़ाई जाए, राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) के माध्यम से वित्तपोषण को प्रोत्साहित किया जाए तथा मिश्रित वित्तपोषण एवं ऋण गारंटी की व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाए।
  • उभरते क्षेत्रों में विविधीकरण: खाद्य प्रसंस्करण, नवीकरणीय ऊर्जा, ई-कॉमर्स, लॉजिस्टिक्स, स्वास्थ्य सेवाएँ, पर्यटन एवं डिजिटल सेवाओं जैसे क्षेत्रों में सहकारी समितियों को प्रोत्साहित कर कृषि पर अत्यधिक निर्भरता को कम किया जाए।
  • मूल्य शृंखलाओं को सुदृढ़ करना: राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड (NCEL) एवं विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण जैसी पहलों के माध्यम से उत्पादन, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग, भंडारण, विपणन एवं निर्यात का एकीकरण कर सदस्यों की आय में वृद्धि की जाए।
  • क्षमता निर्माण को प्रोत्साहित करना: वैमनिकॉम (VAMNICOM) जैसे संस्थानों के माध्यम से वित्तीय प्रबंधन, डिजिटल कौशल, उद्यमिता एवं सहकारी नेतृत्व पर केंद्रित प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार किया जाए।
  • सदस्य सहभागिता बढ़ाना: महिलाओं, युवाओं, स्वयं सहायता समूहों (SHGs), कृषक उत्पादक संगठनों (FPOs) तथा वंचित समुदायों की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु जागरूकता अभियान एवं लोकतांत्रिक निर्णय-निर्माण को प्रोत्साहित किया जाए।
  • बाज़ार प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना: सामान्य ब्रांडिंग, गुणवत्ता प्रमाणीकरण, निर्यात सुविधा एवं डिजिटल बाजार मंचों का विकास कर सहकारी समितियों को निजी उद्यमों के साथ प्रभावी प्रतिस्पर्द्धा करने में सक्षम बनाया जाए।
  • नई राष्ट्रीय सहकारिता नीति का प्रभावी क्रियान्वयन: प्रस्तावित राष्ट्रीय सहकारिता नीति को शीघ्र अंतिम रूप देकर व्यावसायिकता, नवाचार, सतत् विकास तथा व्यवसाय करने की सुगमता पर विशेष बल के साथ प्रभावी रूप से लागू किया जाए।

निष्कर्ष

सहकारिता मंत्रालय भारत के सहकारी आंदोलन के आधुनिकीकरण तथा उसे समावेशी, सहभागितापूर्ण एवं सतत् विकास के एक सुदृढ़ स्तंभ के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल है। यद्यपि सुशासन, प्रौद्योगिकी एवं बाजार एकीकरण संबंधी सुधारों ने नई संभावनाएँ उत्पन्न की हैं, तथापि उनकी दीर्घकालिक सफलता सहकारी स्वायत्तता के संरक्षण, सहकारी संघवाद को सुदृढ़ करने तथा पारदर्शिता एवं व्यावसायिकता सुनिश्चित करने पर निर्भर करेगी।

सहकारिता मंत्रालय के पाँच वर्ष: सहकारी आंदोलन का सुदृढ़ीकरण

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