संदर्भ
अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में दान की चोरी के आरोपों ने मंदिर दान के प्रबंधन, सुरक्षा एवं लेखा परीक्षण पर ध्यान केंद्रित किया है। इसने ट्रस्ट-आधारित प्रबंधन मॉडल तथा अनेक प्रमुख मंदिरों में प्रचलित वैधानिक प्रबंधन व्यवस्थाओं के मध्य के अंतर को भी उजागर किया है।
संबंधित तथ्य
- अयोध्या में दान की चोरी के आरोप (2026): दान प्रबंधन में कथित अनियमितताओं ने धार्मिक संस्थानों की प्रबंधन व्यवस्था तथा जवाबदेही तंत्र पर नई बहस को जन्म दिया है।
- डिजिटल दान में वृद्धि: प्रमुख मंदिर UPI, ऑनलाइन भुगतान गेटवे तथा डिजिटल दान मंचों का तेजी से विस्तार कर रहे हैं, ताकि पारदर्शिता बढ़ाई जा सके और नकद लेन-देन पर निर्भरता कम हो।

मंदिरों में दान का प्रबंधन कैसे किया जाता है
- दान की सामान्य प्रक्रिया: हुंडियों में प्राप्त दान को अधिकृत कर्मियों द्वारा एकत्र कर सुरक्षित गणना केंद्रों तक पहुँचाया जाता है। इसके बाद उसे नकद, सिक्कों एवं कीमती वस्तुओं में अलग किया जाता है, CCTV निगरानी में उसकी गणना की जाती है, आधिकारिक अभिलेखों में दर्ज किया जाता है तथा निर्धारित बैंक खातों में जमा कराया जाता है।
- सत्यापन की बहु-स्तरीय व्यवस्था: इस प्रक्रिया में सामान्यतः मंदिर अधिकारी, बैंक प्रतिनिधि, लेखा परीक्षक तथा अधिकृत कर्मचारी शामिल होते हैं, ताकि धोखाधड़ी को रोका जा सके और पारदर्शिता सुनिश्चित हो।
- प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी: प्रमुख मंदिरों में CCTV निगरानी, डिजिटल लेखा प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक भुगतान गेटवे, ऑनलाइन दान मंच तथा नकद एवं कीमती वस्तुओं के सुरक्षित परिवहन जैसी व्यवस्थाओं का व्यापक उपयोग किया जा रहा है।
प्रमुख मंदिरों में प्रबंधन की विभिन्न व्यवस्थाएँ
- श्रीराम जन्मभूमि मंदिर (अयोध्या): ट्रस्ट-आधारित प्रबंधन
- ट्रस्ट-आधारित शासन व्यवस्था: श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट दान का प्रबंधन अपनी आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से करता है, न कि किसी पृथक वैधानिक ढाँचे के अंतर्गत।
- दान की प्रक्रिया: हुंडियों से प्राप्त दान की गणना ट्रस्ट अधिकारियों, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के प्रतिनिधियों तथा बाहरी गणना कर्मियों द्वारा CCTV निगरानी में संयुक्त रूप से की जाती है। इसके बाद राशि ट्रस्ट के बैंक खाते में जमा की जाती है।
- प्रशासनिक केंद्रीकरण: वित्तीय प्रशासन, नियुक्तियों तथा निगरानी से संबंधित निर्णय मुख्यतः ट्रस्ट के स्तर पर ही लिए जाते हैं तथा इनमें किसी स्वतंत्र वैधानिक प्राधिकरण की भूमिका नहीं होती।
- तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् (TTD): संस्थागत निगरानी
- बहु-संस्थागत पर्यवेक्षण: स्थायी वित्त अधिकारी, राष्ट्रीयकृत बैंकों के प्रतिनिधि, सत्यापित स्वयंसेवक तथा मंदिर सतर्कता प्रकोष्ठ संयुक्त रूप से परकामनी (दान गणना) की प्रक्रिया की निगरानी करते हैं।
- कड़े सुरक्षा प्रावधान: गणना में शामिल कर्मियों को बिना जेब वाली वर्दी पहननी होती है, उनकी तलाशी ली जाती है तथा नकदी के परिवहन के लिए बख्तरबंद वाहनों एवं निरंतर निगरानी की व्यवस्था रहती है।
- श्री जगन्नाथ मंदिर (पुरी): वैधानिक प्रक्रिया
- विधिक रूप से निर्धारित व्यवस्था: दान का प्रबंधन श्री जगन्नाथ मंदिर अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार किया जाता है, जिससे मानकीकृत वित्तीय प्रशासन सुनिश्चित होता है।
- स्वतंत्र निगरानी: हुंडियाँ मंदिर प्रशासक, अधिकृत राजपत्रित अधिकारियों तथा प्रबंध समिति के सदस्यों की उपस्थिति में खोली जाती हैं तथा अभिलेख संधारण एवं वैधानिक रजिस्टरों का रख-रखाव अनिवार्य होता है।
- श्री माता वैष्णो देवी मंदिर: कॉरपोरेट शैली का प्रबंधन
- व्यावसायिक प्रशासन: लेखा अधिकारियों, सुरक्षा अधिकारियों तथा प्रशासनिक प्रबंधकों की समर्पित समितियाँ दान प्रबंधन की निगरानी करती हैं, न कि केवल व्यक्तिगत न्यासी।
- एकीकृत परिवहन व्यवस्था: कीमती वस्तुओं के सुरक्षित परिवहन के लिए विशेष वाहनों तथा आवश्यकता पड़ने पर हेलीकॉप्टर सेवाओं का उपयोग किया जाता है।
- श्री सिद्धिविनायक मंदिर (मुंबई): स्वतंत्र सत्यापन
- बहु-पक्षीय निगरानी: दान की गणना न्यासियों, कार्यपालक अधिकारियों, बैंक प्रतिनिधियों तथा स्वतंत्र लेखा परीक्षकों की उपस्थिति में की जाती है, जिससे प्रत्येक चरण पर सत्यापन सुनिश्चित होता है।
- श्री काशी विश्वनाथ मंदिर (वाराणसी): सरकारी भागीदारी
- प्रशासनिक निगरानी: जिला प्रशासन, जिसमें उप-जिलाधिकारी (SDM) भी शामिल होते हैं, बैंक अधिकारियों तथा सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर दान पेटियों को खोलने की प्रक्रिया की निगरानी करता है।
- लेखा परीक्षण का स्पष्ट रिकॉर्ड: प्रत्येक लेन-देन के लिए जमा रसीद तैयार की जाती है तथा आभूषणों का मूल्यांकन सरकार द्वारा अनुमोदित मूल्यांकों से कराकर उन्हें सुरक्षित अभिरक्षा में रखा जाता है।
राम मंदिर की व्यवस्था किस प्रकार भिन्न है:
- ट्रस्ट डीड आधारित व्यवस्था: अनेक प्रमुख मंदिरों के विपरीत, जिनका संचालन राज्य के विशेष अधिनियमों के अंतर्गत होता है, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का संचालन ट्रस्ट डीड के माध्यम से किया जाता है। इसके लिए वित्तीय प्रशासन से संबंधित कोई पृथक वैधानिक व्यवस्था निर्धारित नहीं है।
- सीमित वैधानिक निगरानी: पुराने मंदिर बोर्ड ऐसे कानूनों के अंतर्गत कार्य करते हैं, जिनमें सरकारी निगरानी, वैधानिक लेखा परीक्षण, स्पष्ट प्रशासनिक संरचना तथा वित्तीय जवाबदेही अनिवार्य होती है। इसके विपरीत, राम मंदिर मुख्यतः ट्रस्ट की आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था पर आधारित है।
- प्रशासनिक उत्तरदायित्व का केंद्रीकरण: वित्तीय प्रशासन का दायित्व मुख्यतः ट्रस्ट के पदाधिकारियों के पास है, जबकि अनेक वैधानिक मंदिरों में यह दायित्व प्रशासकों, सरकारी नामित सदस्यों अथवा मजिस्ट्रेटों के मध्य विभाजित रहता है।
- अनिवार्य सरकारी लेखा परीक्षण का अभाव: अनेक वैधानिक मंदिर बोर्डों के विपरीत, ट्रस्ट पर केंद्र अथवा राज्य सरकार द्वारा अनिवार्य वित्तीय लेखा परीक्षण की बाध्यता नहीं है।
हालिया विवाद से उजागर प्रमुख मुद्दे
- जनविश्वास: मंदिरों में प्राप्त दान श्रद्धा एवं आस्था का प्रतीक होता है। इसलिए पारदर्शिता एवं जवाबदेही बनाए रखना श्रद्धालुओं के विश्वास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
- संस्थागत कमियाँ: वर्ष 2020 के एक आंतरिक लेखा परीक्षण में संगठनात्मक संरचना, वित्तीय प्रतिवेदन, भंडार प्रबंधन, आंतरिक नियंत्रण तथा मानक संचालन प्रक्रियाओं से संबंधित कमियों की ओर संकेत किया गया था।
- शासन संबंधी कमी: अनिवार्य वैधानिक निगरानी के अभाव में संस्थागत नियंत्रण कमजोर हो सकते हैं तथा व्यवस्था मुख्यतः आंतरिक जवाबदेही पर निर्भर हो जाती है।
- व्यावसायिक प्रशासन की आवश्यकता: दान की बढ़ती मात्रा को देखते हुए आधुनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली, प्रशिक्षित मानव संसाधन तथा सुदृढ़ लेखा परीक्षण व्यवस्था की आवश्यकता है।
प्रमुख मंदिरों में विद्यमान सुरक्षा उपाय
- अनेक स्वतंत्र पक्षों की भागीदारी: बैंक अधिकारियों, लेखा परीक्षकों, सरकारी अधिकारियों तथा मंदिर प्रशासकों की संयुक्त भागीदारी से अधिकारों के केंद्रीकरण की संभावना कम होती है।
- स्पष्ट रूप से निर्धारित प्रक्रियाएँ: मानक संचालन प्रक्रियाएँ (SOPs), वैधानिक रजिस्टर तथा प्रलेखित वित्तीय प्रक्रियाएँ पारदर्शिता को सुदृढ़ बनाती हैं।
- प्रौद्योगिकी का उपयोग: CCTV निगरानी, डिजिटल भुगतान, इलेक्ट्रॉनिक लेखा प्रणाली तथा भंडार प्रबंधन प्रणाली संचालन की सुरक्षा को सुदृढ़ बनाते हैं।
- नियमित लेखा परीक्षण: आंतरिक, वैधानिक तथा बाह्य लेखा परीक्षण वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं तथा अनियमितताओं की समय पर पहचान करने में सहायता करते हैं।
संवैधानिक एवं प्रशासनिक परिप्रेक्ष्य
- अनुच्छेद-25 एवं अनुच्छेद-26: धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करते हैं तथा धार्मिक संप्रदायों को लोक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य तथा संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार देते हैं।
- अनुच्छेद-14: जनसामान्य से प्राप्त बड़े पैमाने के दान का प्रबंधन करने वाले संस्थानों को निष्पक्षता, पारदर्शिता एवं जवाबदेही के सिद्धांतों के अनुरूप कार्य करना चाहिए।
- राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व (अनुच्छेद-38): राज्य को ऐसे संस्थानों को प्रोत्साहित करना चाहिए, जो सामाजिक न्याय, सुशासन तथा जनविश्वास को सुदृढ़ करें।
- लोक न्यास सिद्धांत (Public Trust Doctrine): जनता द्वारा स्वेच्छा से प्रदान किए गए संसाधनों का प्रबंधन करने वाले संस्थानों से अपेक्षा की जाती है कि वे न्यासीय उत्तरदायित्व तथा वित्तीय ईमानदारी के उच्चतम मानकों का पालन करें।
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आगे की राह
- संस्थागत प्रशासन को सुदृढ़ बनाना: बड़े धार्मिक ट्रस्टों के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएँ (SOPs), आंतरिक नियंत्रण व्यवस्था तथा स्पष्ट प्रशासनिक संरचना विकसित की जाए।
- स्वतंत्र वित्तीय लेखा परीक्षण: धार्मिक संस्थानों की स्वायत्तता बनाए रखते हुए समय-समय पर स्वतंत्र पेशेवर संस्थाओं से बाह्य लेखा परीक्षण कराया जाए।
- डिजिटल प्रौद्योगिकी का व्यापक उपयोग: डिजिटल दान प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक भंडार प्रबंधन, AI-सक्षम लेखा परीक्षण रिकॉर्ड तथा वास्तविक समय वित्तीय निगरानी का विस्तार किया जाए।
- पारदर्शिता बढ़ाना: वार्षिक लेखा-परीक्षित वित्तीय विवरण, दान के उपयोग संबंधी प्रतिवेदन तथा प्रशासनिक जानकारी को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाए।
- स्वायत्तता एवं जवाबदेही के मध्य संतुलन: धार्मिक संस्थानों की संवैधानिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए उचित वित्तीय निगरानी, पारदर्शिता एवं जनविश्वास सुनिश्चित किया जाए।
निष्कर्ष
मंदिरों में प्राप्त दान का प्रबंधन केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि जनविश्वास का विषय है। भारत के प्रमुख मंदिरों में जनसामान्य से प्राप्त दान की मात्रा निरंतर बढ़ रही है। ऐसे में पारदर्शी प्रशासन, व्यावसायिक वित्तीय प्रबंधन, स्वतंत्र निगरानी तथा प्रौद्योगिकी-आधारित जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि श्रद्धालुओं का विश्वास सुरक्षित रहे और साथ ही धार्मिक संस्थानों की स्वायत्तता भी बनी रहे।