संदर्भ
हाल ही में वर्ष 2026 की रिपोर्ट “अंडर द वेदर: इंडियाज क्लाइमेट-हेल्थ इंटरसेक्शन्स एंड पाथवे टू रेजिलिएंस” जिसे क्लाइमेटराइज एलायंस और दसरा (एक परोपकारी निधि संगठन) द्वारा जारी किया गया, ने यह रेखांकित किया कि भारत के लगभग 40% जिले अत्यधिक संवेदनशील हैं तथा जलवायु परिवर्तन को एक “स्वास्थ्य-जोखिम गुणक” और लोक स्वास्थ्य का उभरता हुआ मुख्य निर्धारक बताया गया है।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु
रिपोर्ट यह रेखांकित करती है कि जलवायु परिवर्तन एक स्वास्थ्य-जोखिम गुणक और असमानता को बढ़ाने वाला कारक है, जिसके लिए प्रणालीगत, एकीकृत और प्रत्यास्थता-आधारित लोक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया आवश्यक है।
- प्रणालीगत लोक स्वास्थ्य एवं विकास संकट के रूप में जलवायु परिवर्तन: यह रिपोर्ट स्पष्ट रूप से स्थापित करती है कि जलवायु परिवर्तन एक प्रणालीगत, बहु-क्षेत्रीय संकट है, जो पर्यावरणीय चिंताओं से आगे बढ़कर लोक स्वास्थ्य, आर्थिक उत्पादकता और सामाजिक स्थिरता को प्रभावित करता है।
- यह ‘जलवायु–स्वास्थ्य–अर्थव्यवस्था’ के सामूहिक उद्भव को रेखांकित करती है, जहाँ पर्यावरणीय क्षरण सीधे रोग भार, मानव पूँजी में कमी और विकासात्मक अवरोधों की ओर ले जाता है।
- यह दृष्टिकोण विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा भी समर्थित है, जो जलवायु परिवर्तन को वैश्विक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है।
- “स्वास्थ्य-जोखिम गुणक” एवं महामारी-विज्ञान परिवर्तक के रूप में जलवायु: यह रिपोर्ट रेखांकित करती है कि जलवायु परिवर्तन एक “स्वास्थ्य-जोखिम गुणक” के रूप में कार्य करता है, जो पूर्व-विद्यमान कमजोरियों को तीव्र करता है। यह एक साथ संचारी रोगों (जैसे- डेंगू और मलेरिया) में वृद्धि करता है, गैर-संचारी रोगों (जैसे- हृदय एवं श्वसन संबंधी रोग) को बढ़ाता है, तथा गर्मी से संबंधित स्वास्थ्य जोखिमों को तीव्र करता है।
- इसके अतिरिक्त, यह रोग-भौगोलिकता को पुनःपरिभाषित कर रहा है, जिससे वाहक-जनित रोग उन क्षेत्रों में भी प्रसरित हो रहे हैं, जो पहले अप्रभावित थे, जैसे पर्वतीय और समशीतोष्ण क्षेत्र।
- लैंसेट काउंटडाउन के अनुसार, भारत में डेंगू संचरण के लिए जलवायु अनुकूलता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
- रुझान यह दर्शाते हैं कि डेंगू और मलेरिया जैसे वाहक-जनित रोगों का विस्तार नए क्षेत्रों में हो रहा है।
- पहले अप्रभावित क्षेत्र, जैसे- शिमला, जम्मू-कश्मीर के कुछ भाग और हिमालयी पर्वतपदीय प्रदेश, अब मामलों की रिपोर्ट कर रहे हैं। रिपोर्ट ने पुणे को एक प्रमुख डेंगू हॉटस्पॉट के रूप में भी पहचाना है, जहाँ मामलों में और वृद्धि की संभावना है।
- अत्यधिक आर्थिक एवं उत्पादकता हानि: रिपोर्ट यह रेखांकित करती है कि जलवायु-प्रेरित स्वास्थ्य प्रभाव गंभीर आर्थिक लागत उत्पन्न कर रहे हैं, जो सीधे श्रम उत्पादकता और राष्ट्रीय उत्पादन को प्रभावित करते हैं।
- यह उल्लेख करती है कि ऊष्मीय संपर्क के कारण वर्ष 2021 में लगभग 160 अरब श्रम घंटे का नुकसान हुआ, जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 5.4% है।
- ‘हीट स्ट्रेस’ विशेष रूप से कृषि और निर्माण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में शारीरिक कार्य क्षमता को कम करता है, साथ ही शहरी उत्पादकता और संज्ञानात्मक प्रदर्शन को भी प्रभावित करता है।
- अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी अनुमान लगाया है कि वर्ष 2030 तक बढ़ते ‘हीट स्ट्रेस’ के कारण भारत में लाखों नौकरियों के जोखिम में पड़ने की संभावना है।
- वायु प्रदूषण का दीर्घकालिक स्वास्थ्य एवं आर्थिक बोझ: वायु प्रदूषण को एक स्थायी, धीमी गति से उत्पन्न होने वाला जलवायु-संबंधित स्वास्थ्य संकट के रूप में पहचाना गया है, जो मृत्यु दर और आर्थिक हानि में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।
- इस रिपोर्ट के अनुसार, वायु प्रदूषण के कारण उत्पन्न स्वास्थ्य प्रभाव प्रतिवर्ष भारत के सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 3% व्यय का कारण बनते हैं, जो एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक भार को दर्शाता है।
- यह श्वसन रोगों, हृदय संबंधी बीमारियों, और असमयिक मृत्यु से दृढ़ता से जुड़ा हुआ है।
- भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष लगभग 16 लाख मृत्यु वायु प्रदूषण के कारण होती हैं, जबकि विश्व बैंक इसके जीवन प्रत्याशा में कमी पर प्रभाव को रेखांकित करता है।
- हीटवेव में वृद्धि और मृत्यु जोखिम: रिपोर्ट हीटवेव में वृद्धि और मृत्यु दर में वृद्धि के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित करती है, विशेष रूप से हृदय संबंधी रोगों से।
- यह बताती है कि अत्यधिक हीटवेव की घटनाओं के दौरान हृदय संबंधी मृत्यु जोखिम में लगभग 11.7% वृद्धि होती है, साथ ही हीटस्ट्रोक, निर्जलीकरण, और गुर्दे संबंधी विकारों के मामलों में वृद्धि होती है।
- भारत में हाल के हीटवेव (2023–24) संबंधी घटना ने विशेष रूप से उत्तरी और मध्य क्षेत्रों में अस्पताल में भर्ती तथा मृत्यु में तीव्र वृद्धि प्रदर्शित की है।
- असमानता को बढ़ाने वाला कारक के रूप में जलवायु परिवर्तन: रिपोर्ट यह रेखांकित करती है कि जलवायु परिवर्तन कमजोर वर्गों को असमान रूप से प्रभावित करता है, जिससे यह असमानता गुणक के रूप में कार्य करता है।
- महिलाएँ, बच्चे, असंगठित श्रमिक, और ग्रामीण समुदाय जलवायु जोखिमों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं और उनकी अनुकूलन क्षमता कम होती है।
- यह भी रेखांकित करता है कि यह संकट लैंगिक रूप से तटस्थ नहीं है, क्योंकि ‘हीट स्ट्रेस’ के कारण मातृ स्वास्थ्य जटिलताओं और जन्म संबंधी परिणामों पर प्रतिकूल प्रभाव का जोखिम बढ़ता है।
- संयुक्त राष्ट्र बाल कोष के अनुसार, भारत के बच्चों का एक बड़ा हिस्सा जलवायु-संबंधित जोखिमों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
- प्रणालीगत अंतराल और एकीकृत, डेटा-आधारित प्रतिक्रिया की आवश्यकता: रिपोर्ट महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक कमियों की पहचान करती है, जिनमें कमजोर स्वास्थ्य प्रणाली, सूक्ष्म स्तर के जलवायु-स्वास्थ्य डेटा की कमी और अंतर-क्षेत्रीय समन्वय की कमजोरी शामिल हैं।
- यह एक सकारात्मक प्रवृत्ति को भी रेखांकित करती है, जहाँ लगभग 70% गैर-सरकारी संगठनों ने वर्ष 2020 के बाद जलवायु-स्वास्थ्य रणनीतियों को अपनाया है, जो समग्र दृष्टिकोण की ओर परिवर्तन को दर्शाता है।
- यह दृढ़ता से निम्नलिखित की अनुशंसा करती है:
- जलवायु-लचीली स्वास्थ्य अवसंरचना
- स्थानीयकृत, विभाजित डेटा प्रणाली और एआई-आधारित निगरानी
- सरकार, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज की भागीदारी के साथ संपूर्ण-समाज सहयोग।
- ये अनुशंसाएँ नीति आयोग के उस दृष्टिकोण के अनुरूप हैं, जो एकीकृत और प्रत्यास्थता-आधारित विकास पथ पर बल देता है।

जलवायु परिवर्तन के बारे में
- संदर्भ: जलवायु परिवर्तन से तात्पर्य वैश्विक और क्षेत्रीय जलवायु प्रणालियों में दीर्घकालिक परिवर्तनों से है, जो मुख्य रूप से मानवजनित ग्रीनहाउस गैसों (GHG) जैसे कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मेथेन (CH₄) और नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) के उत्सर्जन से प्रेरित होते हैं।
- अवलोकित संकेतक: जलवायु परिवर्तन पृथ्वी की भौतिक प्रणालियों में स्पष्ट परिवर्तनों के माध्यम से प्रमाणित होता है, जिनमें वैश्विक और क्षेत्रीय तापमान में वृद्धि, वर्षा के पैटर्न में बढ़ती परिवर्तनशीलता और अनिश्चितता, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, समुद्र स्तर में लगातार वृद्धि और लू, बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी चरम मौसम घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि शामिल है।
- वैज्ञानिक सहमति: जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल इस बात की पुष्टि करता है कि मानवीय गतिविधियों ने वायुमंडल, महासागर और भूमि को स्पष्ट रूप से गर्म किया है, जिससे जलवायु परिवर्तन एक वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित घटना बन गई है।
जलवायु परिवर्तन के कारक
- मानवजनित उत्सर्जन और प्रदूषण के कारक: जीवाश्म ईंधन दहन, औद्योगीकरण और कृषि से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें (GHG) जलवायु परिवर्तन के प्रमुख संरचनात्मक कारक बनी हुई हैं।
- बायोमास दहन, वाहनों से निकलने वाला उत्सर्जन, औद्योगिक अपशिष्ट और अपशिष्ट जलाने जैसे स्थानीय प्रदूषण स्रोत जलवायु-वायु प्रदूषण का एक जटिल संबंध बनाते हैं, जिससे वैश्विक तापवृद्धि और स्वास्थ्य जोखिम दोनों ही बढ़ जाते हैं।
- हालिया प्रमाण: भारत वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक उत्सर्जन करने वाले देशों में से एक है, और वनाग्नि और प्रदूषण से जुड़े कण पदार्थ (PM2.5) के संपर्क में आने से प्रतिवर्ष लगभग 10,200 मौतें हुईं (2020-2024)।
- शहरीकरण और ताप प्रवर्द्धन (शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव): तीव्र शहरीकरण, कंक्रीटीकरण और हरित आवरण में कमी से शहरी ऊष्मा द्वीप (UHI) प्रभाव उत्पन्न होता है, जहाँ शहरों का तापमान आस-पास के क्षेत्रों की तुलना में काफी अधिक होता है।
- शहरी संरचनाएँ ऊष्मा और प्रदूषकों को अवरुद्ध कर लेती हैं, जिससे ताप तनाव और वायु प्रदूषण का खतरा बढ़ जाता है।
- उदाहरण: शहर ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में लगभग दोगुनी तेजी से गर्म हो रहे हैं और मुंबई जैसे शहरों में अत्यधिक वर्षा और बाढ़ जलवायु परिवर्तन और अनियोजित शहरीकरण से जुड़ी हुई है।
- अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा की कमी: भारत के कार्यबल का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है, जिसके पास निम्नलिखित की कमी है:
- स्वास्थ्य बीमा और सामाजिक सुरक्षा
- जलवायु संकट के दौरान आय स्थिरता
- जलवायु जनित बीमारियों के कारण जेब से भारी खर्च करना पड़ता है, जिससे परिवार गरीबी के जाल और ऋण चक्र में फँस जाते हैं।
- यह जलवायु-गरीबी के बीच एक परस्पर क्रिया को दर्शाता है, जहाँ भेद्यता आर्थिक असुरक्षा को और बढ़ाती है।
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जलवायु परिवर्तन के प्रभाव: एक बहुआयामी मूल्यांकन
- लोक स्वास्थ्य प्रभाव-स्वास्थ्य-जोखिम गुणक के रूप में जलवायु: जलवायु परिवर्तन “शारीरिक और जैविक तनाव के प्रत्यक्ष अनुभव” का प्रतिनिधित्व करता है, जो सीधे मानव जीवन और कल्याण को प्रभावित करता है।
- यह एक स्वास्थ्य-जोखिम गुणक के रूप में कार्य करता है, क्योंकि यह गरीबी और कुपोषण जैसी पूर्व-विद्यमान कमजोरियों को तीव्र करता है, रोग संचरण मार्गों को तीव्र करता है और पहले से ही कमजोर स्वास्थ्य प्रणालियों पर अतिरिक्त भार डालता है।
- यह स्वास्थ्य के मूल निर्धारकों, जैसे- स्वच्छ वायु, सुरक्षित जल और स्थिर खाद्य प्रणाली को भी कमजोर करता है, जिससे कुल रोग भार बढ़ता है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वर्ष 2030 से 2050 के बीच जलवायु परिवर्तन के कारण प्रतिवर्ष लगभग 2,50,000 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं, जो इसे एक बड़े लोक स्वास्थ्य संकट के रूप में दर्शाता है।

- रोग पैटर्न में परिवर्तन और महामारी-विज्ञान परिवर्तन: जलवायु परिवर्तन रोगों की भौगोलिकता को पुनःपरिभाषित कर रहा है, जिससे डेंगू और मलेरिया जैसे वाहक-जनित रोग उन क्षेत्रों में फैल रहे हैं, जो पहले गैर-स्थानिक और उच्च ऊँचाई वाले क्षेत्र थे, जैसे शिमला और जम्मू-कश्मीर।
- यह नए शहरी रोग हॉटस्पॉट के उद्भव में भी योगदान दे रहा है, जहाँ पुणे जैसे शहरों में सूक्ष्म-जलवायु परिवर्तन और शहरी जल-जमाव के कारण डेंगू के मामलों में वृद्धि देखी जा रही है।
- बाढ़ जैसी अत्यधिक मौसम घटनाएँ, जल-जनित रोगों (जैसे- हैजा और हेपेटाइटिस) के प्रकोप को बढ़ाती हैं, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ स्वच्छता और जल निकासी अवसंरचना अपर्याप्त है।
- भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने भारत में रोग पैटर्न में परिवर्तन को रेखांकित किया है, जो बढ़ती महामारी-विज्ञान संबंधी चुनौती को दर्शाता है।
- जीवन-चक्र प्रभाव और संवेदनशील आबादी: जलवायु परिवर्तन मानव जीवन-चक्र के विभिन्न चरणों पर अलग-अलग प्रभाव डालता है, जिसमें महिलाएँ, बच्चे और वृद्ध अधिक संवेदनशील होते हैं।
- अत्यधिक गर्मी और वायु प्रदूषण (PM2.5) के संपर्क से मातृ स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिसमें प्री-एक्लेंपसिया, अकाल प्रसव, और मृतजन्म शामिल हैं।
- शिशु और छोटे बच्चे अपनी सीमित ताप-नियमन क्षमता के कारण अधिक संवेदनशील होते हैं, जिससे वे ‘हीट स्ट्रेस’, निर्जलीकरण और संक्रमण से अधिक प्रभावित होते हैं।
- प्रदूषित वातावरण के दीर्घकालिक संपर्क को जन्म के समय कम वजन, फेफड़ों के विकास में बाधा, दमा, और समग्र स्वास्थ्य परिणामों में कमी से जोड़ा गया है, जो जलवायु परिवर्तन के पीढ़ीगत प्रभावों को दर्शाता है।
- लैंगिक और संरचनात्मक असमानताएँ: जलवायु परिवर्तन लैंगिक रूप से तटस्थ नहीं है, क्योंकि महिलाएँ निम्नलिखित कारणों से अधिक प्रभावित होती हैं:
- जीविका संबंधी भूमिकाओं के कारण अधिक जोखिम
- सीमित गतिशीलता और निर्णय लेने की क्षमता
- मातृ एवं प्रजनन स्वास्थ्य जोखिम
- यह गरीब परिवारों, बच्चों, वृद्धों और तटीय समुदायों को असमान रूप से प्रभावित करता है।
- उदाहरण: जलवायु प्रभाव पूर्व-विद्यमान सामाजिक-आर्थिक असमानताओं के साथ अंतःक्रिया करते हैं, जिससे अधिक जोखिम लेकिन कम अनुकूलन क्षमता की स्थिति उत्पन्न होती है।
- जो लोग कम उत्सर्जन में योगदान करते हैं, वे अधिकतम भार का वहन करते हैं, जो जलवायु न्याय संबंधी चिंता को रेखांकित करता है।
- गैर-संचारी रोग और शारीरिक तनाव: तापमान वृद्धि और पर्यावरणीय तनाव गैर-संचारी रोगों (NCDs) में वृद्धि कर रहे हैं, विशेष रूप से हृदय और श्वसन संबंधी रोगों में।
- हीटबेव का संपर्क दीर्घकालिक हृदय संबंधी समस्या उत्पन्न करता है, जिससे हृदय रोगों और गर्मी-जनित मृत्यु में वृद्धि होती है।
- जलवायु-संबंधित वायु प्रदूषण दमा और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) जैसे श्वसन रोगों का प्रमुख कारण है।
- इसके अतिरिक्त, बाह्य शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण शारीरिक निष्क्रियता और जीवनशैली से संबंधित रोगों में वृद्धि हो रही है, जैसा कि लैंसेट काउंटडाउन की रिपोर्ट द्वारा रेखांकित किया गया है।
- आर्थिक और विकासात्मक प्रभाव: जलवायु परिवर्तन एक प्रणालीगत विकासात्मक और आर्थिक जोखिम के रूप में उभरा है, जो उत्पादकता, आजीविका और दीर्घकालिक विकास पथ को प्रभावित करता है।
- ‘हीट स्ट्रेस’ विशेष रूप से कृषि और निर्माण जैसे क्षेत्रों में श्रम उत्पादकता को कम करता है, जिससे कार्य घंटों और आय में हानि होती है।
- यह कृषि उत्पादन और जल उपलब्धता को भी प्रभावित करता है, जिससे खाद्य सुरक्षा और पोषण पर प्रभाव पड़ता है।
- नीति आयोग ने रेखांकित किया है कि जलवायु परिवर्तनशीलता पहले से ही भारत में कृषि, जल संसाधन और ग्रामीण आजीविका को प्रभावित कर रही है।
- अत्यधिक घटनाएँ, अवसंरचना और आपूर्ति शृंखला व्यवधान: जलवायु परिवर्तन हीटवेव, बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी अत्यधिक मौसम घटनाओं की आवृत्ति, तीव्रता और अनिश्चितता को बढ़ा रहा है।
- ये घटनाएँ विशेष रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण अवसंरचनात्मक कमजोरियों को उजागर करती हैं:
- स्वास्थ्य प्रणाली, जहाँ सेवाओं में बाधा आती है।
- परिवहन और कनेक्टिविटी नेटवर्क, जो आपातकालीन प्रतिक्रिया को बाधित करते हैं।
- चरम मौसमी घटनाएँ औषधियों, टीकों और कोल्ड-चेन लॉजिस्टिक्स सहित चिकित्सा आपूर्ति शृंखलाओं को भी बाधित करती हैं, जिससे प्रबंधनीय स्वास्थ्य स्थितियाँ बड़े पैमाने के संकट में परिवर्तित हो जाती हैं।
- असमानता, जलवायु न्याय और शासन संबंधी चुनौतियाँ: जलवायु परिवर्तन एक असमानता गुणक के रूप में कार्य करता है, जो महिलाओं, बच्चों, वृद्धों, असंगठित श्रमिकों और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों को असमान रूप से प्रभावित करता है।
- ये समूह जलवायु जोखिमों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, लेकिन उनकी अनुकूलन क्षमता कम होती है, जिससे सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ बढ़ती हैं।
- संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने रेखांकित किया है कि जो आबादी वैश्विक उत्सर्जन में कम योगदान देती है, वही सबसे अधिक प्रभाव महसूस करती है, जो जलवायु न्याय की गंभीर चिंता को दर्शाता है।
- इन चुनौतियों के समाधान हेतु शासन प्रणाली में प्रतिमान परिवर्तन आवश्यक है, जिसमें:
- प्रतिक्रियात्मक से पूर्वानुमानित दृष्टिकोण की ओर
- उपचारात्मक से निवारक और लचीलापन-आधारित लोक स्वास्थ्य प्रणाली की ओर।
- भारत की हीट एक्शन योजनाएँ, जिन्हें भारत मौसम विज्ञान विभाग और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का समर्थन प्राप्त है, प्रारंभिक चेतावनी-आधारित अनुकूलन शासन ढाँचे का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

जलवायु–स्वास्थ्य एकीकरण का महत्त्व
- आर्थिक स्थिरता और उत्पादकता की अनिवार्यता: जलवायु परिवर्तन का समाधान करना आर्थिक उत्पादकता और राष्ट्रीय विकास की रक्षा के लिए आवश्यक है, क्योंकि गर्मी तनाव, रोग भार और पर्यावरणीय क्षरण सीधे श्रम दक्षता और कार्यबल भागीदारी को कम करते हैं।
- अतः जनसंख्या स्वास्थ्य की सुरक्षा, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता की रक्षा के लिए अनिवार्य है, विशेष रूप से कृषि और असंगठित श्रम जैसे जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों में।
- लोक स्वास्थ्य सुरक्षा और मानव अस्तित्व: जलवायु परिवर्तन एक प्रमुख लोक स्वास्थ्य खतरे के रूप में उभरा है, जिससे जलवायु नीतियों में स्वास्थ्य आयाम का एकीकरण आवश्यक हो गया है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन यह रेखांकित करता है कि जलवायु कार्रवाई के केंद्र में स्वास्थ्य को रखना बड़े पैमाने पर मृत्यु और रोग भार को रोकने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- ऐसे एकीकरण के बिना, जलवायु प्रभाव पहले से ही दबाव में चल रही स्वास्थ्य प्रणालियों को, विशेषकर विकासशील देशों में, वृद्धि कर सकते हैं।
- जलवायु–गरीबी–संवेदनशीलता चक्र को तोड़ना: जलवायु परिवर्तन एक स्व-प्रबलित संवेदनशीलता चक्र उत्पन्न करता है, जहाँ:
- जलवायु तनावों के कारण आय संबंधी हानि
- बढ़ते स्वास्थ्य व्यय परिवारों को दीर्घकालिक गरीबी और ऋणग्रस्तता में धकेलते हैं।
- इस चक्र को तोड़ने और पीढ़ीगत गरीबी प्रसार को रोकने के लिए एकीकृत जलवायु–स्वास्थ्य कार्रवाई आवश्यक है, विशेष रूप से संवेदनशील समूहों के लिए।
- पर्यावरणीय न्याय और समानता के आयाम: जलवायु परिवर्तन मूलतः समानता और न्याय का प्रश्न है, क्योंकि जो लोग कम उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं, वही अधिकतम प्रभाव झेलते हैं।
- संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यह रेखांकित करता है कि जलवायु–स्वास्थ्य अंतर्संबंधों का समाधान सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को कम करने और हाशिए के समुदायों की रक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण है।
- जलवायु नीति में स्वास्थ्य का एकीकरण एक जन-केंद्रित और समावेशी विकास दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है।
- एकीकृत जलवायु कार्रवाई के सह-लाभ: जलवायु–स्वास्थ्य एकीकरण से कई सह-लाभ उत्पन्न होते हैं, जिनमें शामिल हैं:
- बेहतर स्वास्थ्य परिणाम (प्रदूषण-संबंधित रोगों में कमी)
- सामुदायिक लचीलापन में वृद्धि
- आर्थिक उत्पादकता में वृद्धि
- उदाहरण के लिए, स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण उत्सर्जन को कम करते हुए वायु गुणवत्ता में सुधार और रोग भार में कमी लाता है, जो नीतिगत समन्वित लाभों को दर्शाता है।
- आपदा तैयारी और अनुकूलन क्षमता को सुदृढ़ करना: जलवायु नीति में स्वास्थ्य का एकीकरण हीटवेव, बाढ़ और रोग प्रकोप जैसी जलवायु-प्रेरित आपदाओं के लिए तैयारी को सुदृढ़ करता है।
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और अनुकूलन रणनीतियाँ, जैसे- भारत मौसम विज्ञान विभाग और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा समर्थित हीट एक्शन योजनाएँ, पूर्वानुमानित शासन के महत्त्व को दर्शाती हैं।
- ऐसे उपाय अत्यधिक घटनाओं के दौरान मृत्यु, रोग और प्रणालीगत व्यवधान को कम करते हैं।
- दीर्घकालिक विकासात्मक लचीलापन: जलवायु परिवर्तन स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन और खाद्य सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में अर्जित विकासात्मक उपलब्धियों के लिए एक गंभीर जोखिम प्रस्तुत करता है।
- जलवायु-लचीली स्वास्थ्य प्रणालियों का निर्माण आवश्यक है, ताकि विकास प्रगति को बनाए रखा जा सके और बार-बार आने वाले जलवायु तनावों से उलट न हो।
- यह सतत्, लचीले और भविष्य-उन्मुख विकास पथों की ओर संक्रमण को सक्षम बनाता है।

जलवायु परिवर्तन से निपटने में चुनौतियाँ एवं चिंताएँ (जलवायु–स्वास्थ्य संदर्भ)
- डेटा की कमी और साक्ष्य अंतराल: एक प्रमुख बाधा सूक्ष्म, स्थानीयकृत और विभाजित डेटा की कमी है, जो जलवायु चर को विशिष्ट स्वास्थ्य परिणामों से जोड़ सके, जिससे साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण सीमित हो जाता है।
- रियल-टाइम निगरानी और एकीकृत जलवायु–स्वास्थ्य डेटाबेस के अभाव में रोग प्रकोपों की भविष्यवाणी और लक्षित हस्तक्षेपों की रूपरेखा बनाना कठिन हो जाता है।
- विकृत जलवायु वित्त और अपर्याप्त अनुकूलन: जलवायु वित्त मुख्यतः न्यूनीकरण प्रयासों (जैसे-नवीकरणीय ऊर्जा) की ओर झुका हुआ है, जबकि अनुकूलन, विशेषकर स्वास्थ्य प्रणाली के संदर्भ में, पर्याप्त रूप से वित्तपोषित नहीं है।
- यह असंतुलन जलवायु-प्रेरित स्वास्थ्य जोखिमों के प्रति तैयारी और प्रतिक्रिया क्षमता को कमजोर करता है, विशेष रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में।
- खंडित संस्थागत और शासन ढाँचे: जलवायु और स्वास्थ्य से संबंधित प्रतिक्रियाएँ अक्सर विभिन्न मंत्रालयों और एजेंसियों में बँटी होती हैं, जिससे:
- आपदाओं के दौरान समन्वय की कमी
- प्रयासों की पुनरावृत्ति और नीतिगत अंतराल उत्पन्न होते हैं।
- एकीकृत, बहु-क्षेत्रीय शासन तंत्र का अभाव कुशल संकट प्रतिक्रिया और दीर्घकालिक योजना को बाधित करता है।
- कमजोर जन-जागरूकता और जोखिम धारणा: जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों के प्रति जन-जागरूकता सीमित है, विशेष रूप से:
- दीर्घकालिक गर्मी संपर्क
- वायु प्रदूषण से संबंधित रोग
- इसके परिणामस्वरूप निवारक व्यवहारों को अपनाने में कमी आती है और समुदाय-स्तरीय लचीलापन एवं तैयारी कमजोर होती है।
- जमीनी स्तर और सामुदायिक कार्रवाई में बाधाएँ: स्थानीय संगठन और सामुदायिक संस्थाएँ, विशेषकर अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों में, निम्नलिखित चुनौतियों का सामना करती हैं:
- जलवायु वित्त तक सीमित पहुँच
- प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक बाधाएँ।
- यह संदर्भ विशिष्ट, निचले स्तर की अनुकूलन रणनीतियों को सीमित करता है, जो प्रभावी लचीलेपन निर्माण के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
- अवसंरचना की कमजोरी और स्वास्थ्य प्रणाली की संवेदनशीलता: स्वास्थ्य अवसंरचना का बड़ा हिस्सा जलवायु-लचीला नहीं है, जिससे यह निम्नलिखित के प्रति संवेदनशील हो जाता है:
- बाढ़, चक्रवात और अत्यधिक मौसम घटनाएँ
- इसके परिणामस्वरूप:
- आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं में बाधा
- आपातकाल के दौरान देखभाल प्रणाली का विफल होना
- प्रणालीगत असमानता और क्षमता सीमाएँ: जलवायु परिवर्तन के प्रभाव असमान रूप से वितरित होते हैं, जहाँ संवेदनशील आबादी के पास:
- अधिक जोखिम संपर्क
- कम अनुकूलन क्षमता होती है।
- स्थानीय स्तर पर कमजोर संस्थागत क्षमता भी जलवायु–स्वास्थ्य नीतियों के क्रियान्वयन को सीमित करती है, जिससे मौजूदा सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ और बढ़ जाती हैं।
भारत द्वारा किए गए कार्य एवं पहल
- नीतिगत विकास और संस्थागत ढाँचा
- व्यापक जलवायु नीति से स्वास्थ्य एकीकरण की ओर: भारत की जलवायु नीति व्यापक पर्यावरणीय ढाँचों से विकसित होकर स्वास्थ्य-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर अग्रसर हुई है, जिसमें जलवायु परिवर्तन को एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में मान्यता दी गई है।
- राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) समग्र रणनीति प्रदान करती है, जबकि राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन और मानव स्वास्थ्य कार्य योजना (NAPCCHH) जलवायु शासन में स्वास्थ्य के एकीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाती है।
- यह क्षेत्रीय नीतियों से एक अधिक एकीकृत जलवायु–स्वास्थ्य ढाँचे की ओर संक्रमण को परिलक्षित करता है।
- जलवायु-अनुकूल स्वास्थ्य तंत्र और निगरानी
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- राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPCCHH): स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत NPCCHH निम्नलिखित पर केंद्रित है:
- स्वास्थ्य पेशेवरों की क्षमता निर्माण
- जलवायु-संवेदनशील रोग निगरानी को सुदृढ़ करना
- सार्वजनिक स्वास्थ्य योजना में जलवायु चिंताओं का मुख्यधारा में समावेशन।
- डिजिटल रोग निगरानी: एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP) जैसे कार्यक्रम वास्तविक समय में प्रकोप की निगरानी हेतु डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं, जिससे जलवायु-संवेदनशील रोगों की प्रारंभिक पहचान और त्वरित प्रतिक्रिया संभव होती है।
- स्थानीयकृत अनुकूलन और हीट एक्शन प्लान
- हीट एक्शन प्लान (HAPs): भारत के कई शहरों और राज्यों में हीट एक्शन प्लान लागू किए हैं, ताकि गर्मी से संबंधित मृत्यु दर और रोगभार को कम किया जा सके।
- इनमें शामिल हैं:
- पूर्व चेतावनी प्रणाली
- जन-जागरूकता अभियान
- अंतर-एजेंसी समन्वय।
- भारत मौसम विज्ञान विभाग और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा समर्थित, ये योजनाएँ स्थानीयकृत और पूर्वानुमान-आधारित जलवायु शासन का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
- विकेंद्रीकृत और समुदाय-आधारित स्वास्थ्य सेवा वितरण
- अंतिम छोर तक स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण: भारत विशेष रूप से जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों में सेवाओं को समुदायों के निकट लाने पर बल दे रहा है।
- यह परिवहन प्रणालियों पर निर्भरता को कम करता है, जो जलवायु आपदाओं के दौरान प्रायः बाधित हो जाती हैं।
- समुदाय स्तर पर अनुकूलन: सार्वजनिक स्वास्थ्य पहुँच और जन-जागरूकता पहलों को सुदृढ़ किया जा रहा है, जिससे स्थानीय अनुकूलन क्षमता में वृद्धि हो।
- स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और पर्यावरण-स्वास्थ्य सह-लाभ
- नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार: भारत राष्ट्रीय सौर मिशन जैसी पहलों के अंतर्गत सौर, पवन और हरित हाइड्रोजन को बढ़ावा दे रहा है, जिससे ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन में कमी आती है।
- वायु गुणवत्ता सुधार: राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) का उद्देश्य PM2.5 और PM10 स्तरों को कम करना है, जिससे जलवायु शमन और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों को लाभ मिलता है।
- नवाचार, प्रौद्योगिकी और बहु-हितधारक भागीदारी
- गैर-सरकारी संगठन और निजी क्षेत्र नवाचार: नागरिक समाज संगठन निम्नलिखित नवाचार ला रहे हैं:
- सौर ऊर्जा संचालित स्वास्थ्य सुविधाएँ
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित रोग ट्रैकिंग प्रणाली
- ये नवाचार दूरस्थ और संवेदनशील क्षेत्रों में सेवा वितरण और अनुकूलन क्षमता को सुदृढ़ करते हैं।
- सहयोगात्मक मंच: क्लाइमेटराइज एलायंस (ClimateRISE Alliance) जैसी पहलें सरकार, निजी क्षेत्र, अकादमिक जगत और नागरिक समाज के मध्य सहयोग को बढ़ावा देती हैं, जिससे एकीकृत जलवायु–स्वास्थ्य कार्रवाई संभव होती है।
- आपदा तैयारी और पूर्व चेतावनी प्रणाली
- पूर्वानुमान और जोखिम न्यूनीकरण: भारत मौसम विज्ञान विभाग उन्नत मौसम पूर्वानुमान, हीटवेव अलर्ट और चक्रवात चेतावनी प्रदान करता है, जिससे तैयारी में सुधार होता है।
- संस्थागत प्रतिक्रिया तंत्र: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण जलवायु-लचीले अवसंरचना नियोजन सहित आपदा जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियों का नेतृत्व करता है।
- ये पहलें पूर्वानुमान-आधारित शासन को सुदृढ़ करती हैं तथा चरम घटनाओं के दौरान मृत्यु दर, रोगभार और आर्थिक हानि को कम करती हैं।
वैश्विक पहलें एवं सर्वोत्तम प्रथाएँ
- वैश्विक जलवायु शासन एवं तापमान संबंधी लक्ष्य
- बहुपक्षीय रूपरेखाएँ: संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय और पेरिस समझौता वैश्विक जलवायु शासन की मूल संरचना का निर्माण करते हैं, जो शमन, अनुकूलन, और जलवायु वित्त को बढ़ावा देते हैं।
- 1.5°C सीमा—सार्वजनिक स्वास्थ्य अनिवार्यता: एक मजबूत वैश्विक वैज्ञानिक सहमति है कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखना आवश्यक है, ताकि बड़े पैमाने पर मृत्यु, रोग विस्तार, और प्रणालीगत पतन जैसे विनाशकारी एवं अपरिवर्तनीय सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रभावों से बचा जा सके।
- यह इस बात को सुदृढ़ करता है कि जलवायु लक्ष्य केवल पर्यावरणीय लक्ष्य नहीं हैं, बल्कि महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य सुरक्षा उपाय भी हैं।
- वैश्विक नीति में जलवायु–स्वास्थ्य एकीकरण
- WHO-नेतृत्व वाला स्वास्थ्य-केंद्रित दृष्टिकोण: विश्व स्वास्थ्य संगठन जलवायु नीति में स्वास्थ्य को मुख्यधारा में लाने पर बल देता है, जिसमें शामिल हैं:
- जलवायु-अनुकूल स्वास्थ्य प्रणालियाँ
- स्वास्थ्य-केंद्रित अनुकूलन योजना
- संवेदनशील देशों में क्षमता निर्माण
- यह विकासशील देशों को जलवायु-प्रेरित स्वास्थ्य जोखिमों और आपात स्थितियों से निपटने हेतु वित्तीय एवं तकनीकी सहायता की आवश्यकता पर भी जोर देता है।
- साक्ष्य, निगरानी एवं डेटा-आधारित कार्यवाही
- वैश्विक ज्ञान मंच: लैंसेट काउंटडाउन जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य परिणामों के बीच संबंध पर वार्षिक आकलन प्रदान करता है, जिससे नीतिगत जवाबदेही मजबूत होती है।
- जलवायु डेटा एवं पूर्वानुमान प्रणाली: विश्व मौसम विज्ञान संगठन वास्तविक समय में जलवायु निगरानी और पूर्वानुमान को सक्षम बनाता है, जो प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और तैयारी रणनीतियों का समर्थन करता है।
- जलवायु वित्त एवं समर्थन तंत्र
- अनुकूलन और लचीलेपन हेतु वित्तपोषण: ग्रीन क्लाइमेट फंड विकासशील देशों को निम्नलिखित के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है:
- जलवायु अनुकूलन परियोजनाएँ
- लचीली स्वास्थ्य अवसंरचना का विकास
- ‘लॉस एंड डैमेज’ फंड: ‘लॉस एंड डैमेज’ फंड जैसे वैश्विक तंत्र उन देशों का समर्थन करने का उद्देश्य रखते हैं, जो अपरिवर्तनीय जलवायु प्रभावों, जैसे स्वास्थ्य संकट और आपदा पुनर्प्राप्ति आवश्यकताओं, का सामना कर रहे हैं।
- जलवायु-लचीली स्वास्थ्य प्रणालियाँ एवं अवसंरचना
- निम्न-कार्बन एवं लचीली स्वास्थ्य व्यवस्था: एक प्रमुख वैश्विक प्राथमिकता ऐसी स्वास्थ्य प्रणालियों का निर्माण करना है, जो जलवायु-अनुकूल और निम्न-कार्बन दोनों हों, जिससे सुनिश्चित हो:
- आपदाओं के दौरान सेवा निरंतरता
- स्वास्थ्य सेवा वितरण का कम पर्यावरणीय प्रभाव।
- वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ: बांग्लादेश जैसे देशों ने चक्रवात-प्रतिरोधी स्वास्थ्य अवसंरचना विकसित की है, जो संवेदनशील क्षेत्रों के लिए किफायती अनुकूलन मॉडल प्रस्तुत करती है।
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली एवं आपदा जोखिम न्यूनीकरण
- प्रौद्योगिकी-आधारित प्रारंभिक चेतावनी की सफलता: उन्नत प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का उपयोग हीटवेव, बाढ़ और उष्णकटिबंधीय तूफानों के दौरान मृत्यु दर कम करने में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुआ है।
- फ्राँस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने हीटवेव चेतावनी प्रणालियाँ लागू की हैं, जिससे गर्मी से संबंधित मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आई है।
- वैश्विक पुनरावृत्ति योग्यता: ये मॉडल निम्नलिखित के महत्त्व को रेखांकित करते हैं:
- वास्तविक समय चेतावनी
- जन-संचार प्रणाली
- अंतर-एजेंसी समन्वय।
- एकीकृत कार्यवाही एवं सह-लाभ दृष्टिकोण
- जलवायु–स्वास्थ्य को एकीकृत नीतिगत क्षेत्र के रूप में: वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ यह मान्यता देती हैं कि जलवायु परिवर्तन और सार्वजनिक स्वास्थ्य को एक संयुक्त, एकीकृत नीतिगत क्षेत्र के रूप में संबोधित किया जाना चाहिए।
- ऐसा दृष्टिकोण अनेक सह-लाभ उत्पन्न करता है, जिनमें शामिल हैं:
- बेहतर स्वास्थ्य परिणाम
- उन्नत जलवायु लचीलापन
- आर्थिक दक्षता में वृद्धि।
- बहु-हितधारक सहयोग: प्रभावी मॉडल सरकार, निजी क्षेत्र, अकादमिक जगत और नागरिक समाज के मध्य सहयोग पर बल देते हैं, जिससे सुनिश्चित होता है:
- समग्र नीतिगत डिजाइन
- कुशल कार्यान्वयन और ज्ञान साझा करना।
आगे की राह
- जलवायु शासन में स्वास्थ्य को मुख्य धारा में लाना: जलवायु नीति को कार्बन-केंद्रित दृष्टिकोण से हटकर मानव-केंद्रित रूपरेखा की ओर स्थानांतरित होना चाहिए, जहाँ सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणाम, नीति की सफलता का प्रमुख संकेतक बनें।
- सभी जलवायु निर्णयों में स्वास्थ्य का एकीकरण सुनिश्चित करता है कि शासन समग्र, जन-केंद्रित, और परिणाम-उन्मुख हो, न कि स्वास्थ्य को द्वितीयक परिणाम के रूप में देखा जाए।
- समग्र-समाज दृष्टिकोण: जलवायु–स्वास्थ्य चुनौतियों का समाधान सरकार, निजी क्षेत्र, नागरिक समाज, और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के समन्वित निवेश से ही संभव है।
- सार्वजनिक–निजी भागीदारी निम्नलिखित के विकास को तीव्र कर सकती है:
- जलवायु-लचीली स्वास्थ्य अवसंरचना
- नवोन्मेषी प्रौद्योगिकियाँ और सेवा वितरण मॉडल।
- मजबूत स्थानीय डेटा एवं निगरानी प्रणाली का निर्माण: सूक्ष्म-जलवायु और स्वास्थ्य परिणामों के मध्य संबंधों को समझने हेतु स्थानीयकृत तथा विभाजित डेटा प्रणालियों का विकास अत्यंत आवश्यक है।
- डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे रोग निगरानी प्रणालियों को सुदृढ़ करने से संभव होगा:
- प्रकोपों का प्रारंभिक पता लगाना
- लक्षित, साक्ष्य-आधारित हस्तक्षेप।
- जलवायु वित्त का पुनर्संतुलन: जलवायु वित्त को विशेष रूप से अनुकूलन की ओर पुनर्संतुलित करना आवश्यक है, खासकर स्वास्थ्य क्षेत्र में, जो अभी भी अपर्याप्त रूप से वित्तपोषित है।
- सरकार, बहुपक्षीय संस्थाएँ और परोपकारी संगठन को:
- जलवायु-लचीली स्वास्थ्य प्रणालियों के लिए वित्त बढ़ाना चाहिए।
- संवेदनशील क्षेत्रों के लिए संसाधनों तक समान पहुँच सुनिश्चित करनी चाहिए।
- समुदाय-आधारित एवं विकेंद्रीकृत लचीलेपन को बढ़ावा: समुदाय-आधारित संगठन और स्थानीय शासन निकायों को निम्नलिखित से सशक्त किया जाना चाहिए:
- वित्तीय संसाधन
- तकनीकी क्षमता
- ऐसे विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण सुनिश्चित करते हैं:
- संदर्भ-विशिष्ट अनुकूलन रणनीतियाँ
- अंतिम छोर तक प्रभावी सेवा वितरण।
- जलवायु-लचीली एवं आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना: स्वास्थ्य अवसंरचना को इस प्रकार डिजाइन या पुनर्संरचित किया जाना चाहिए कि वह बाढ़, चक्रवात और हीटवेव जैसी चरम मौसमी घटनाओं का सामना कर सके।
- इसमें शामिल हैं:
- बाढ़-प्रवण क्षेत्रों में ऊँचे ढाँचे
- ऊष्मा-अनुकूल भवन डिजाइन
- विश्वसनीय ऊर्जा बैकअप प्रणाली (जैसे- सौर ऊर्जा)।
- तैयारी और पूर्वानुमान-आधारित शासन को सुदृढ़ करना: भारत मौसम विज्ञान विभाग और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा समर्थित हीट एक्शन प्लान जैसी प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का विस्तार मृत्यु दर और रुग्णता को कम करने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- निवारक स्वास्थ्य सेवा की ओर संक्रमण: शासन को निम्नलिखित दिशा में स्थानांतरित होना चाहिए:
- प्रतिक्रियात्मक → पूर्वानुमानात्मक दृष्टिकोण
- उपचारात्मक → निवारक स्वास्थ्य प्रणाली
- यह अल्पकालिक संकट प्रबंधन के बजाय दीर्घकालिक लचीलापन सुनिश्चित करता है।
निष्कर्ष
रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि “स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन का जीवंत अनुभव है।” जलवायु परिवर्तन अंततः मानव स्वास्थ्य पर उसके प्रभावों के माध्यम से ही परिलक्षित होता है। भारत की जलवायु नीति को जीवन रक्षा और स्वास्थ्य प्रणाली की लचीलेपन को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि अनुकूलन उपाय, विशेषकर बढ़ते जलवायु जोखिमों के संदर्भ में समानतापूर्ण, सतत् और स्वास्थ्य-केंद्रित विकास को सुनिश्चित कर सकें।