ईरान–अमेरिका की नाकेबंदी

28 Apr 2026

संदर्भ

हॉर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के मध्य बढ़ता तनाव वैश्विक शिपिंग को बाधित कर रहा है और समुद्री अधिकारों पर कानूनी प्रश्न खड़े कर रहा है।

ईरान–अमेरिका की नाकेबंदी के प्रमुख बिंदु

  • समुद्री संघर्ष में वृद्धि: उच्च समुद्र (High seas) पर ईरान से जुड़े जहाजों को अमेरिकी अवरोध के बाद, ईरान ने अपने जलक्षेत्र में जहाजों पर हमला किया और उन्हें हिरासत में लिया।
  • अमेरिकी नाकेबंदी की रणनीति: अमेरिका ने निगरानी, चेतावनी और जहाजों की रोकथाम के माध्यम से अप्रत्यक्ष नाकाबंदी लागू की, ताकि ईरान के समुद्री व्यापार को सीमित किया जा सके।
  • ईरान के प्रतिकारात्मक उपाय: ईरान ने परमिट और समुद्री सुरक्षा मानकों के उल्लंघन का हवाला देते हुए जहाजों पर गोलीबारी की और उन्हें कब्जे में लिया।
  • जलडमरूमध्य यातायात में बाधा: संघर्ष और अनिश्चितता के कारण जहाजों की आवाजाही 100 दैनिक पारगमन से घटकर न्यूनतम स्तर पर आ गई।

नाकेबंदी का प्रभाव

  • वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर आघात: यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल व्यापार का 20% वहन करता है, और व्यवधानों के कारण कच्चे तेल की कीमतों तथा आपूर्ति शृंखलाओं में अस्थिरता बढ़ गई।
  • भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर प्रभाव: एक प्रमुख तेल आयातक के रूप में भारत को आपूर्ति लाइनों पर जोखिम का सामना करना पड़ा, हालाँकि कुछ भारतीय-ध्वज वाले जहाजों को पारगमन की अनुमति दी गई।
    • इसके माध्यम से भारत के कच्चे तेल का 45% से अधिक और LPG आयात का 60% गुजरता है, जो इसे विश्व का सबसे महत्त्वपूर्ण तेल पारगमन मार्ग बनाता है।

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  • शिपिंग एवं बीमा लागत में वृद्धि: युद्ध द्वारा उत्पन्न जोखिम में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिससे माल-ढुलाई की लागत बढ़ी और वैश्विक व्यापार लॉजिस्टिक्स प्रभावित हुआ।
  • नौवहन की स्वतंत्रता पर खतरा: प्रतिबंध स्थापित मुक्त नौवहन मानकों को कमजोर करते हैं, जिससे विश्वभर में वाणिज्यिक शिपिंग प्रभावित होती है।
  • भू-राजनीतिक तनाव में वृद्धि: यह संकट पश्चिम एशिया में अस्थिरता को गहरा करता है, वैश्विक शक्तियों को इसमें शामिल करता है और व्यापक संघर्ष के जोखिम को बढ़ाता है।

अंतरराष्ट्रीय जल को नियंत्रित करने वाले कानून

  • UNCLOS, 1982 (वर्ष 1994 में लागू): समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS) उच्च समुद्र पर नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है और हॉर्मुज जैसे अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य से ‘ट्रांजिट पासेज’ की गारंटी देता है।
    • ट्रांजिट पासेज’ सिद्धांत: UNCLOS के तहतट्रांजिट पासेज’ जहाजों और विमानों को अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए उपयोग किए जाने वाले जलडमरूमध्यों से बिना तटीय राज्य के हस्तक्षेप के निरंतर तथा निर्बाध आवागमन की अनुमति देता है।
    • इनोसेंट पासेज’ सिद्धांत: इनोसेंट पासेज’ जहाजों को किसी तटीय राज्य के क्षेत्रीय जल से गुजरने की अनुमति देता है, बशर्ते वे उसकी शांति, सुरक्षा या संप्रभुता के लिए खतरा न हों।
    • संयुक्त राष्ट्र चार्टर (1945): संयुक्त राष्ट्र चार्टर आत्मरक्षा के अलावा या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना एकतरफा बल प्रयोग को निषिद्ध करता है।

PW OnlyIAS विशेष

हाई सी’ (High Sea)

  • वर्ष 1958 के जिनेवा कन्वेंशन के अनुसार, ‘हाई सी’ (High Seas) वे महासागरीय क्षेत्र हैं, जो किसी भी राज्य के अधिकार क्षेत्र से परे स्थित होते हैं।
  • ये किसी राष्ट्र के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ) से आगे तक विस्तृत होते हैं, जो सामान्यतः उसके तट से 200 समुद्री मील तक विस्तृत होता है।

अंतरराष्ट्रीय कानूनों की प्रभावशीलता को कमजोर करने वाले कारक

  • प्रवर्तन तंत्र की कमी: अंतरराष्ट्रीय कानून राज्य के अनुपालन पर निर्भर करता है, जिसमें किसी केंद्रीय प्रवर्तन प्राधिकरण का अभाव है।
  • महाशक्ति राजनीति: प्रमुख शक्तियाँ प्रायः राष्ट्रीय हित या सुरक्षा चिंताओं का हवाला देकर नियमों को दरकिनार कर देती हैं।
  • समुद्री प्रावधानों में अस्पष्टता: UNCLOS में व्याख्यात्मक अंतराल अधिकारों और प्रतिबंधों पर परस्पर विरोधी दावों को सक्षम बनाते हैं।
  • कमजोर बहुपक्षीय सहमति: वैश्विक संस्थाओं में विभाजन समन्वित प्रतिक्रिया और जवाबदेही को बाधित करता है।

आगे की राह

  • बहुपक्षीय संस्थाओं को सुदृढ़ करना: अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन जैसे निकायों को विवाद समाधान में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
  • नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना: खुले समुद्री मार्गों को बनाए रखने और एकतरफा प्रतिबंधों को रोकने के लिए वैश्विक सहमति आवश्यक है।
  • कूटनीतिक तनाव-निरोध: क्षेत्र को स्थिर करने और समुद्री सुरक्षा बहाल करने के लिए ईरान और अमेरिका के मध्य संवाद आवश्यक है।

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