संदर्भ
हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA), 2006 के अंतर्गत निर्धारित विवाह की न्यूनतम आयु धर्म की परवाह किए बिना सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होती है तथा यौवनारंभ (Puberty) को विवाह की आयु मान्यता देने वाली मुस्लिम व्यक्तिगत विधि (शरीयत) केंद्रीय कानून के प्रावधानों को अधिरोहित (Override) नहीं कर सकती है।
निर्णय की प्रमुख विशेषताएँ
- PCMA की व्यक्तिगत विधि पर प्रधानता: न्यायालय ने कहा कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA), 2006 के अंतर्गत निर्धारित विवाह की न्यूनतम आयु धर्म की परवाह किए बिना सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होती है।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि मुस्लिम व्यक्तिगत विधि का वह सिद्धांत, जिसके अनुसार यौवनारंभ (Puberty) (सामान्यतः 15 वर्ष) को विवाह की आयु माना जाता है, व्यापक लोकहित में बनाए गए केंद्रीय कानून के प्रावधानों को अधिरोहित (Override) नहीं कर सकता है।
- लोकनीति पर आधारित PCMA एवं POCSO: न्यायालय ने अवलोकन किया कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA), 2006 तथा यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012 लोक स्वास्थ्य, बाल संरक्षण तथा राष्ट्रीय नीति पर आधारित कल्याणकारी विधियाँ हैं।
- न्यायालय ने कहा कि 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति के विवाह की अनुमति देना POCSO अधिनियम के उद्देश्यों के विपरीत होगा, क्योंकि यह अधिनियम बालक/बालिका के साथ किसी भी प्रकार के यौन कृत्य को अपराध घोषित करता है।
- केरल उच्च न्यायालय के निर्णय पर निर्भरता: न्यायालय ने मोइदुट्टी मुसलियार बनाम सब-इंस्पेक्टर, वडक्केनचेरी पुलिस स्टेशन मामले में केरल उच्च न्यायालय द्वारा अपनाए गए तर्क से सहमति व्यक्त की, जिसमें कहा गया था कि व्यक्तिगत विधियाँ बाल विवाह पर वैधानिक निषेध को अधिरोहित नहीं कर सकतीं तथा POCSO अधिनियम के प्रभाव को कम नहीं कर सकतीं।
- न्यायालय ने स्वीकार किया कि विभिन्न उच्च न्यायालयों ने इस विषय पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण अपनाए हैं, किंतु उसने ऐसी व्याख्या को प्राथमिकता दी, जो बाल कल्याण को सर्वोच्च महत्त्व देती है।
- पुलिस एवं ‘चाइल्डलाइन’ की कार्रवाई की वैधता: न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में 16 वर्षीय बालिका के प्रस्तावित विवाह से संबंधित प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को निरस्त करने से इनकार कर दिया।
- न्यायालय ने कहा कि पुलिस तथा चाइल्डलाइन अधिकारियों ने बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) एवं POCSO अधिनियम के संभावित उल्लंघन को रोकने के लिए अपनी वैधानिक शक्तियों के अंतर्गत कार्य किया।
बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA), 2006 के बारे में
- बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA), 2006 का उद्देश्य बाल विवाहों पर प्रतिबंध लगाना, बच्चों को शोषण से संरक्षण प्रदान करना तथा पीड़ितों के लिए वैधानिक उपचार एवं कल्याणकारी उपाय उपलब्ध कराना है।
विवाह की न्यूनतम वैधानिक आयु
- पुरुष: 21 वर्ष
- महिला: 18 वर्ष
प्रमुख प्रावधान
- बाल विवाह की परिभाषा: बाल विवाह वह विवाह है, जिसमें पुरुष की आयु 21 वर्ष से कम अथवा महिला की आयु 18 वर्ष से कम हो।
- निरस्तीकरणीय (Voidable) बाल विवाह: बाल विवाह सामान्यतः उस पक्षकार के विकल्प पर निरस्तीकरणीय होता है, जो विवाह के समय बालक/बालिका था।
- विवाह निरस्तीकरण हेतु याचिका सामान्यतः वयस्कता प्राप्त करने के दो वर्ष के भीतर दायर की जानी चाहिए।
- शून्य (Void) बाल विवाह: कुछ बाल विवाह प्रारंभ से ही शून्य (Void ab initio) होते हैं, विशेषकर जब बालक/बालिका का अपहरण, प्रलोभन, मानव तस्करी अथवा बल, कपट या दबाव के माध्यम से विवाह कराया गया हो।
- अपराधों के लिए दंड: इस अधिनियम के अंतर्गत दो वर्ष तक के कारावास तथा/अथवा ₹1 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान निम्नलिखित के लिए किया गया है:
- बाल विवाह करने वाला वयस्क पुरुष।
- बाल विवाह का संपादन, संचालन, निर्देशन अथवा संपन्न कराने वाला कोई भी व्यक्ति।
- माता-पिता, अभिभावक अथवा ऐसा कोई भी व्यक्ति, जो बाल विवाह को प्रोत्साहित, अनुमति, रोकने में लापरवाही अथवा सुगम बनाता है।
- बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी (CMPOs): अधिनियम के अंतर्गत बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारियों (CMPOs) की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है, ताकि वे:
- बाल विवाहों की रोकथाम करें।
- साक्ष्य एकत्रित करें तथा अभियोजन में सहायता प्रदान करें।
- बाल विवाह के दुष्प्रभावों के संबंध में जन-जागरूकता उत्पन्न करें।
- समुदायों को इस प्रथा को हतोत्साहित करने हेतु परामर्श एवं मार्गदर्शन प्रदान करें।
- बालक/बालिका का संरक्षण एवं कल्याण: यह अधिनियम न्यायालयों को बाल विवाह के संपादन पर रोक लगाने हेतु निषेधाज्ञा (Injunction) जारी करने का अधिकार प्रदान करता है।
- यह अधिनियम बाल विवाह से जन्मे बच्चों के भरण-पोषण, निवास, अभिरक्षा तथा कल्याण के संबंध में भी प्रावधान करता है।
यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 के बारे में
- बच्चों को यौन शोषण, यौन उत्पीड़न और अश्लील साहित्य से बचाने के लिए वर्ष 2012 में POCSO अधिनियम लागू किया गया था।
- यह जाँच से लेकर मुकदमे तक, कानूनी प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में बच्चों के अनुकूल प्रक्रिया सुनिश्चित करता है।
- यह अधिनियम 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के विरुद्ध संपर्क आधारित और सामान्य, दोनों प्रकार के यौन अपराधों को शामिल करता है।
- POCSO अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ
- परिभाषित बालक: बालक की परिभाषा 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी ऐसे व्यक्ति के रूप में की गई है जो ‘सहमति’ देने में असमर्थ है।
- समयबद्ध सुनवाई: संज्ञान की तिथि से एक वर्ष के भीतर सुनवाई पूरी करना अनिवार्य है।
- अनिवार्य रिपोर्टिंग: किसी भी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराधों की रिपोर्टिंग अनिवार्य है, ऐसा न करने पर दंड का प्रावधान है।
- बाल-अनुकूल प्रक्रियाएँ: बंद कमरे में सुनवाई, आक्रामक बहस से बचाव और पीड़ितों के लिए सहायक व्यक्तियों की उपलब्धता सुनिश्चित करती है।
- विशेष न्यायालय: राज्य सरकारों को विशेष POCSO मुकदमों के लिए विशेष न्यायालयों को नामित करने का अधिकार देता है।
- लैंगिक तटस्थता: लैंगिक अंतराल के बिना सभी बच्चों पर लागू होती है, जिसमें पुरुष और बाल ट्रांसजेंडर पीड़ितों के लिए प्रावधान शामिल हैं।
विधिक एवं संवैधानिक प्रावधान
संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद-14: विधि के समक्ष समानता तथा विधियों के समान संरक्षण की गारंटी प्रदान करता है, जिससे बच्चों सहित सभी नागरिकों को समान विधिक संरक्षण सुनिश्चित होता है।
- अनुच्छेद-15(3): राज्य को महिलाओं एवं बच्चों के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार प्रदान करता है, जिससे सकारात्मक कल्याणकारी उपायों को लागू किया जा सकता है।
- अनुच्छेद-21: जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी प्रदान करता है, जिसकी व्याख्या उच्चतम न्यायालय ने गरिमापूर्ण जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा शोषण से संरक्षण के अधिकार को सम्मिलित करते हुए की है।
- अनुच्छेद-21A: 6–14 वर्ष आयु के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की गारंटी प्रदान करता है, जो सार्वभौमिक प्रारंभिक शिक्षा का संवैधानिक आधार है।
- अनुच्छेद-39(f): राज्य को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देता है कि बच्चों का विकास स्वतंत्रता, गरिमा तथा स्वस्थ परिस्थितियों में हो तथा उन्हें शोषण, दुर्व्यवहार एवं उपेक्षा से संरक्षण प्राप्त हो।
- अनुच्छेद-44: राज्य को सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता (UCC) सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश देता है, जिसका उद्देश्य व्यक्तिगत विधियों में एकरूपता स्थापित करना है।
वैधानिक प्रावधान
- बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA), 2006: बाल विवाह पर प्रतिबंध लगाता है, इसे सुगम बनाने वाले व्यक्तियों के लिए दंड का प्रावधान करता है तथा बाल-विवाहित पक्षकारों को विधिक उपचार उपलब्ध कराता है।
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012: बच्चों के विरुद्ध लैंगिक अपराधों की रोकथाम, रिपोर्टिंग, जाँच तथा अभियोजन के लिए बाल-अनुकूल विधिक ढाँचा प्रदान करता है।
- किशोर न्याय (बालकों की देख-रेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015: देख-रेख एवं संरक्षण की आवश्यकता वाले तथा विधि के साथ संघर्षरत बच्चों की देख-रेख, संरक्षण, पुनर्वास, दत्तक ग्रहण एवं सामाजिक पुनर्वास का प्रावधान करता है।
- वयस्कता अधिनियम, 1875: अधिकांश व्यक्तियों के लिए 18 वर्ष को वयस्कता की आयु निर्धारित करता है, जिसके आधार पर संविदा करने तथा नागरिक अधिकारों के प्रयोग की विधिक क्षमता निर्धारित होती है।
- मुस्लिम व्यक्तिगत विधि (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम, 1937: मुसलमानों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार तथा अन्य व्यक्तिगत विषयों का विनियमन इस्लामी विधि (शरीयत) के अनुसार करता है।
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निर्णय का महत्त्व
- बाल संरक्षण कानूनों का समान अनुप्रयोग: यह निर्णय पुनः स्थापित करता है कि जहाँ बच्चों के कल्याण एवं अधिकारों से संबंधित विवाद में व्यक्तिगत विधियों और बाल संरक्षण कानूनों के मध्य टकराव हो, वहाँ बाल संरक्षण संबंधी विधियाँ प्रभावी होंगी।
- बच्चों के अधिकारों का सुदृढ़ीकरण: यह निर्णय बच्चों को अल्पायु विवाह, शोषण, मानव तस्करी तथा लैंगिक दुर्व्यवहार से संरक्षण प्रदान करते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य एवं समग्र विकास को प्रोत्साहित करता है।
- विधिक स्पष्टता: यह निर्णय विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा अपनाई गई भिन्न-भिन्न न्यायिक व्याख्याओं के बावजूद PCMA एवं POCSO अधिनियम की समान रूप से लागू होने की स्थिति को अधिक स्पष्ट करता है।
- संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करना: यह निर्णय समानता, गरिमा, लैंगिक न्याय तथा बालक के सर्वोत्तम हित के संवैधानिक सिद्धांतों को सुदृढ़ करता है, साथ ही संसद द्वारा अधिनियमित कल्याणकारी विधानों की सर्वोच्चता की पुनः पुष्टि करता है।