संदर्भ
हाल ही में बिहार के तीन पारंपरिक उत्पाद बावन बूटी साड़ी एवं कपड़ा, पथरकट्टी प्रस्तर शिल्प तथा पिढ़िया पेंटिंग को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्राप्त हुआ है।
बावन बूटी साड़ी एवं कपड़ा (नालंदा) के बारे में
- बावन बूटी बिहार की एक विशिष्ट हथकरघा वस्त्र परंपरा है, जो कपड़े में प्रतीकात्मक आकृतियों को बुनने के लिए प्रसिद्ध है।

- उत्पत्ति: यह शिल्प मुख्यतः बसवन बिगहा गाँव तथा नालंदा जिले के आस-पास के क्षेत्रों में प्रचलित है।
- मुख्य विशेषताएँ
- बावन पारंपरिक आकृतियाँ: इस वस्त्र में 52 (बावन) बौद्ध, सांस्कृतिक और पारंपरिक आकृतियाँ शामिल होती हैं, जो इसे विशिष्ट पहचान प्रदान करती हैं।
- हथकरघा आधारित बुनाई: साड़ियाँ और कपड़े पारंपरिक हथकरघों का उपयोग करके तैयार किए जाते हैं, जिससे सदियों पुरानी बुनाई तकनीकों का संरक्षण होता है।
- सांस्कृतिक विरासत: इन आकृतियों में बौद्ध धर्म, स्थानीय परंपराओं और बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से संबंधित विषयों को दर्शाया जाता है।
पथरकट्टी प्रस्तर शिल्प (गया) के बारे में
- पथरकट्टी प्रस्तर शिल्प एक प्रसिद्ध प्रस्तर नक्काशी परंपरा है, जो अपनी सूक्ष्म मूर्तिकला और कलात्मक उत्कृष्टता के लिए जानी जाती है।

- उत्पत्ति: यह शिल्प गया जिले के पथरकट्टी गाँव में उत्पन्न हुआ और लगभग 300 वर्षों से विकसित हो रहा है।
- मुख्य विशेषताएँ
- काले ग्रेनाइट की कारीगरी: कारीगर स्थानीय रूप से उपलब्ध काले ग्रेनाइट पत्थर से मूर्तियाँ बनाते हैं, जो अपने स्थायित्व और महीन बनावट के लिए प्रसिद्ध है।
- धार्मिक मूर्तियाँ: यह शिल्प भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, हिंदू देवी-देवताओं तथा अन्य कलात्मक आकृतियों की मूर्तियों के लिए व्यापक रूप से जाना जाता है।
- ऐतिहासिक महत्त्व: स्थानीय परंपरा के अनुसार, पथरकट्टी के ग्रेनाइट का उपयोग गया स्थित विष्णुपद मंदिर के निर्माण में किया गया था।
पिढ़िया पेंटिंग (भोजपुर) के बारे में
- पिढ़िया पेंटिंग एक पारंपरिक लोक कला रूप है, जो ग्रामीण बिहार के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को दर्शाती है।
- उत्पत्ति: यह कला मुख्यतः बिहार के भोजपुर क्षेत्र में महिलाओं द्वारा प्रचलित है।

- मुख्य विशेषताएँ
- त्योहार आधारित परंपरा: ये चित्रकला परंपरागत रूप से त्योहारों, अनुष्ठानों और महत्त्वपूर्ण सामाजिक अवसरों के दौरान बनाई जाती है।
- प्राकृतिक रंगों का उपयोग: कलाकार प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक प्रतीकों का उपयोग करके जीवंत दृश्य कथाएँ प्रस्तुत करते हैं।
- ग्रामीण जीवन का चित्रण: ये चित्र पारिवारिक संबंधों, धार्मिक मान्यताओं, लोक परंपराओं और दैनिक ग्राम जीवन को दर्शाते हैं।
इन तीन उत्पादों के शामिल होने के साथ, बिहार में भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्राप्त उत्पादों की कुल संख्या आधिकारिक रूप से बढ़कर 16 हो गई है।
| श्रेणी |
GI उत्पाद |
| कृषि उत्पाद (6) |
मिथिला मखाना, शाही लीची, भागलपुरी जरदालू आम, कतरनी चावल, मार्चा चावल, मगही पान। |
| हस्तशिल्प एवं कला रूप (7) |
मधुबनी पेंटिंग, सुजनी कढ़ाई, सिक्की घास उत्पाद, एप्लिक (खटवा) कार्य, मंजूषा कला, पथरकट्टी पत्थर शिल्प, पिढ़िया पेंटिंग। |
| वस्त्र एवं परिधान (2) |
भागलपुरी सिल्क, बावन बूटी साड़ी एवं वस्त्र। |
| खाद्य पदार्थ (1) |
सिलाव खाजा। |
भौगोलिक संकेतक (GI) टैग के बारे में
- परिभाषा: भौगोलिक संकेतक (GI) एक बौद्धिक संपदा अधिकार है, जो किसी उत्पाद को एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से उत्पन्न होने के रूप में पहचानता है, जहाँ उसकी विशिष्ट गुणवत्ता या प्रतिष्ठा होती है।
- प्रदान करने वाली संस्था: भारत में GI पंजीकरण उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT), वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत चेन्नई स्थित भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री द्वारा प्रदान किया जाता है।
- कानूनी आधार: GI ढाँचा भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 के तहत संचालित होता है, जो वर्ष 2003 में लागू हुआ।
- वैश्विक मान्यता: GI प्रणाली को विश्व व्यापार संगठन (WTO) के बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार-संबंधी पहलुओं (TRIPS) समझौते के तहत अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है।
- वैधता: एक पंजीकृत GI को 10 वर्षों तक कानूनी संरक्षण मिलता है और इसे प्रत्येक दस-वर्षीय अवधि के लिए अनिश्चितकाल तक नवीनीकृत किया जा सकता है।