कृषि में चक्रीय अर्थव्यवस्था: अपशिष्ट से धन

19 Feb 2026

संदर्भ

भारत सरकार ने कृषि अपशिष्ट को मूल्यवान संसाधनों में परिवर्तित करने, पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान करने और आर्थिक दक्षता बढ़ाने के लिए कृषि में चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों के महत्त्व पर जोर दिया है।

संबंधित तथ्य

  • वर्ष 2050 तक, भारत की चक्रीय अर्थव्यवस्था का बाजार मूल्य 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचने और 10 मिलियन रोजगार सृजित करने की आशा है।

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‘अपशिष्ट से धन’ दृष्टिकोण के बारे में

  • यह एक ऐसी रणनीति है, जो अपशिष्ट पदार्थों को ऊर्जा, खाद, पुनर्चक्रित वस्तुओं या औद्योगिक इनपुट जैसे मूल्यवान उत्पादों में परिवर्तित करती है, जिससे प्रदूषण कम होता है और साथ ही आर्थिक मूल्य और स्थायी आजीविका उत्पन्न होती है।
  • अपशिष्ट की स्थिति
    • अपशिष्ट की मात्रा: भारत में प्रतिवर्ष लगभग 35 करोड़ टन कृषि अपशिष्ट उत्पन्न होता है।
    • यदि इन अवशेषों का कुशलतापूर्वक उपयोग किया जाए, तो इनसे प्रतिवर्ष 18,000 मेगावाट से अधिक बिजली उत्पन्न की जा सकती है।

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चक्रीय कृषि के बारे में

  • चक्रीय कृषि एक सतत् कृषि पद्धति है, जो संसाधनों के पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण और पुनर्जनन द्वारा अपशिष्ट को कम करती है, जैसे कि फसल अवशेषों, पशु अपशिष्ट तथा उप-उत्पादों को खाद एवं जैव ऊर्जा में परिवर्तित करना।
  • यह सतत् विकास लक्ष्य 2 का समर्थन करती है, जिसका उद्देश्य “भूख को समाप्त करना, खाद्य सुरक्षा प्राप्त करना, पोषण में सुधार करना और सतत् कृषि को बढ़ावा देना” है।
  • उदाहरण के लिए
    • यह वैश्विक खाद्य अपशिष्ट को कम करके सतत् विकास लक्ष्यों का समर्थन करती है, जो वर्ष 2022 में 1.05 अरब टन तक पहुँच गया था, जिसमें से 60% घरेलू स्तर पर उत्पन्न हुआ था।

चक्रीय कृषि पद्धतियाँ

  • फसल अवशेष प्रबंधन: बचे हुए अवशेषों को जलाने के बजाय मल्चिंग, कंपोस्टिंग या जैव ऊर्जा के लिए उपयोग करना।
  • एकीकृत कृषि प्रणाली: उप-उत्पादों के पुन: उपयोग के लिए फसलों, पशुधन, मत्स्यपालन और कृषि-वानिकी को आपस में जोड़ना।
  • जैविक खाद और जैव उर्वरक: पशु अपशिष्ट और बायोमास को कंपोस्ट या बायोगैस स्लरी में परिवर्तित करना।
  • जल पुनर्चक्रण: उपचारित अपशिष्ट जल का सिंचाई के लिए पुन: उपयोग करना।
  • कृषि-वानिकी और मिश्रित फसल: मृदा की उर्वरता और जैव विविधता को प्राकृतिक रूप से बढ़ाना।

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चक्रीय कृषि के लाभ

  • ऊर्जा उत्पादन: अपशिष्ट का उपयोग बिजली और जैव-ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जा सकता है।
  • मृदा स्वास्थ्य: अपशिष्ट से बने जैविक उर्वरक मृदा पोषण में सुधार करते हैं और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करते हैं।
  • पर्यावरण संरक्षण: खेतों में अपशिष्ट जलाने से होने वाले वायु, मृदा और जल प्रदूषण को कम करता है।

चुनौतियाँ

  • उच्च प्रारंभिक लागत: बायोगैस संयंत्र, खाद इकाइयाँ या बायो-सीएनजी सुविधाएँ स्थापित करने के लिए पर्याप्त पूँजी की आवश्यकता होती है।
    • उदाहरण के लिए: छोटे किसानों को बायोमास आधारित ऊर्जा प्रणालियों को अपनाने में कठिनाई होती है।
  • तकनीकी और कौशल संबंधी कमियाँ: सीमित जागरूकता और तकनीकी जानकारी सटीक खेती और अवशेष प्रबंधन को अपनाने में बाधा उत्पन्न करती हैं।
    • उदाहरण के लिए: पंजाब जैसे पराली-प्रवण राज्यों में मल्चिंग मशीनों का अनुचित उपयोग।
  • बाजार और मूल्य शृंखला संबंधी बाधाएँ: जैविक खाद या जैव-उत्पादों के लिए कमजोर बाजार संपर्क लाभप्रदता को कम करते हैं।
    • उदाहरण के लिए: रासायनिक उर्वरकों की तुलना में खाद के सीमित खरीदार।
  • खंडित भूमि जोत: छोटे और बिखरे हुए खेतों के कारण कुशल अपशिष्ट संग्रहण और पुनर्चक्रण कठिन हो जाता है (पूर्वी भारत में यह सामान्य है)।

कृषि में चक्रीयता को बढ़ावा देने वाली सरकारी पहलें

  • जैविक जैव-कृषि संसाधनों को बढ़ावा देने वाली योजना (गोबरधन): यह योजना कई मंत्रालयों को एक साथ लाती है ताकि गोबर, फसल अवशेष और खाद्य अपशिष्ट को संपीड़ित बायोगैस (CBG) और जैविक खाद में परिवर्तित किया जा सके।
    • उदाहरण के लिए: 14 जनवरी, 2026 तक, इस योजना ने भारत के 51.4% जिलों को कवर किया और 979 बायोगैस संयंत्र चालू हो गए, जो सतत् अपशिष्ट प्रबंधन में महत्त्वपूर्ण प्रगति का संकेत देता है।
  • फसल अवशेष प्रबंधन (CRM): CRM पहल पराली जलाने पर अंकुश लगाती है और इसके लिए फसल अवशेष प्रबंधन (मृदा में मिलाना/मल्चिंग) और फसल अवशेष का उपयोग (कंपोस्टिंग, बायोगैस, जैव ऊर्जा) को बढ़ावा दिया जाता है।
    • वर्ष 2018-19 से वर्ष 2025-26 तक, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और ICAR को ₹3,926.16 करोड़ जारी किए गए, जिसके परिणामस्वरूप 42,000 से अधिक कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित हुए और 3.24 लाख फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों का वितरण हुआ।
  • कृषि अवसंरचना कोष (AIF): यह जैविक किसानों, प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PAC) और कृषि उद्यमियों को गोदामों, शीत भंडारण, ग्रेडिंग और प्राथमिक प्रसंस्करण अवसंरचना के वित्तपोषण द्वारा मूल्य शृंखलाओं को मजबूत करने में सहायता करता है।
  • पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (AHIDF): आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत वर्ष 2020 में ₹15,000 करोड़ के कोष के साथ आरंभ किया गया।
    • यह पशुधन मूल्य शृंखला को मजबूत करने के लिए डेयरी, मांस प्रसंस्करण, पशु आहार निर्माण और अपशिष्ट-से-धन में निजी और सहकारी निवेश को प्रोत्साहित करता है।
  • सतत् कृषि के लिए जल प्रबंधन: जल शक्ति मंत्रालय स्वच्छ गंगा राष्ट्रीय मिशन और जल शक्ति अभियान जैसी योजनाओं के माध्यम से कृषि, भू-निर्माण और बागवानी जैसे गैर-पेय उद्देश्यों के लिए घरेलू और अपशिष्ट जल के उपचार और पुन: उपयोग को बढ़ावा देता है।

आगे की राह

  • वित्तीय सहायता और ऋण पहुँच को मजबूत करना: कृषि अवसंरचना कोष (AIF) जैसी योजनाओं के तहत खाद इकाइयों, बायो-सीएनजी संयंत्रों और भंडारण सुविधाओं के लिए सब्सिडी तथा कम ब्याज वाले ऋणों का विस्तार करना।
  • विकेंद्रीकृत अपशिष्ट-से-ऊर्जा मॉडल को बढ़ावा देना: गोबरधन योजना के तहत ग्राम स्तर पर बायोगैस संयंत्रों का विस्तार करना, जो गोबर और फसल अपशिष्ट को जैव ऊर्जा और जैविक खाद में परिवर्तित करते हैं।
  • प्रौद्योगिकी और मशीनीकरण सहायता बढ़ाना: फसल अवशेष प्रबंधन योजना के अंतर्गत कस्टम हायरिंग केंद्रों की संख्या में वृद्धि की जानी चाहिए, ताकि छोटे किसानों को मल्चर और हैप्पी सीडर जैसी मशीनें सुलभ रूप से उपलब्ध कराई जा सकें।
  • मजबूत बाजार संपर्क विकसित करना: लाभप्रदता बढ़ाने के लिए किसान-उत्पादक संगठनों (FPOs) के माध्यम से जैविक उत्पादों की ब्रांडिंग और सुनिश्चित खरीद को बढ़ावा देना।

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