संदर्भ
संस्थागत प्रसव, महिला सशक्तीकरण तथा मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों में सुधार के बावजूद, NFHS-6 (2023–24) के अनुसार केवल (पूर्ण) स्तनपान (Exclusive Breastfeeding–EBF) की दर में गिरावट दर्ज की गई है। यह प्रसवोत्तर सहायता, मातृत्व संरक्षण तथा कार्यस्थल पर स्तनपान-अनुकूल सुविधाओं में विद्यमान कमियों को उजागर करती है।
केवल (पूर्ण) स्तनपान (EBF): महत्त्व एवं NFHS-6 के निष्कर्ष
- केवल (पूर्ण) स्तनपान (EBF): इसका अर्थ है कि जन्म के बाद पहले छह महीनों तक शिशु को केवल माँ का दूध दिया जाए तथा इसके अतिरिक्त कोई अन्य भोजन या पेय न दिया जाए (चिकित्सकीय परामर्श के अनुसार दवाओं या ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ORS) को छोड़कर)। इसकी अनुशंसा विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) तथा संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) द्वारा की गई है।

- स्वास्थ्य संबंधी लाभ: अनन्य स्तनपान शिशु को संपूर्ण पोषण प्रदान करता है, संक्रमणों के विरुद्ध प्रतिरक्षा को सुदृढ़ करता है, संज्ञानात्मक विकास को बढ़ावा देता है तथा शिशु मृत्यु-दर एवं कुपोषण को कम करता है। साथ ही, यह माताओं में स्तन एवं डिंबग्रंथि (ओवेरियन) कैंसर के जोखिम को भी घटाता है।
- NFHS-6 के निष्कर्ष: संस्थागत प्रसव 90.6% तक बढ़ने तथा जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करने की दर 41.8% से बढ़कर 50.1% होने के बावजूद, अनन्य स्तनपान की दर NFHS-5 के 63.7% से घटकर NFHS-6 में 55.8% रह गई है।
- राज्यवार भिन्नता: उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और मध्य प्रदेश में अनन्य स्तनपान की दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई, जबकि केरल, गुजरात और पश्चिम बंगाल में सुधार देखा गया।
- उभरती चिंता: अनन्य स्तनपान में गिरावट शहरी एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में दर्ज की गई है, किंतु ग्रामीण क्षेत्रों में यह गिरावट अधिक तीव्र है, जो स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता से परे व्यापक संरचनात्मक एवं प्रणालीगत चुनौतियों की ओर संकेत करती है।
बेहतर मातृ स्वास्थ्य सेवाओं के बावजूद केवल (पूर्ण) स्तनपान में गिरावट के कारण
- असंगठित क्षेत्र में रोजगार: अधिकांश महिलाएँ असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं, जिससे आर्थिक विवशताओं के कारण उन्हें प्रसव के तुरंत बाद कार्य पर लौटना पड़ता है, परिणामस्वरूप अनन्य स्तनपान बाधित हो जाता है।
- सीमित मातृत्व संरक्षण: यद्यपि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (वर्ष 2017 में संशोधित) के तहत 26 सप्ताह के सवैतनिक मातृत्व अवकाश का प्रावधान है, किंतु इसका लाभ मुख्यतः संगठित क्षेत्र तक ही सीमित है।
- सीज़ेरियन (C-Section) प्रसव में वृद्धि: सीजेरियन प्रसव की दर 21.5% से बढ़कर 27.2% हो गई है, जिससे स्तनपान प्रारंभ करने में विलंब होता है तथा पर्याप्त स्तनपान परामर्श के अभाव में पूरक आहार पर निर्भरता बढ़ जाती है।
- प्रसवोत्तर सहायता का अभाव: स्तनपान संबंधी परामर्श की कमी, प्रशिक्षित लैक्टेशन कंसल्टेंट्स (स्तनपान परामर्शदाताओं) की अपर्याप्त उपलब्धता, परिवार का सीमित सहयोग तथा अस्पताल से छुट्टी के बाद नियमित अनुवर्ती देखभाल का अभाव स्तनपान की सफलता को प्रभावित करता है।
- सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन: शहरीकरण, प्रवासन, एकल परिवारों का बढ़ना, शिशु दुग्ध विकल्प का अधिक विपणन तथा जन्म के तुरंत बाद प्री-लैक्टियल फीडिंग (माँ के दूध से पहले अन्य पदार्थ पिलाने की परंपरा) जैसी प्रथाएँ अनन्य स्तनपान को कमजोर करती हैं।
स्तनपान एवं मातृ देखभाल को बढ़ावा देने हेतु प्रमुख सरकारी पहलें
- एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS), 1975: आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से माताओं एवं बच्चों को पूरक पोषण, टीकाकरण सहायता, स्वास्थ्य जाँच, वृद्धि निगरानी, प्री-स्कूल शिक्षा तथा पोषण परामर्श उपलब्ध कराती है।
- शिशु दुग्ध विकल्प, फीडिंग बोतल एवं शिशु आहार (उत्पादन, आपूर्ति एवं वितरण का विनियमन) अधिनियम, 1992 (2003 में संशोधित): यह विश्व के सबसे सशक्त कानूनों में से एक है, जो शिशु दुग्ध विकल्प एवं फीडिंग बोतलों के प्रचार, विज्ञापन और विपणन को विनियमित कर केवल (पूर्ण) स्तनपान को संरक्षण एवं प्रोत्साहन प्रदान करता है।
- प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY), 2017: गर्भावस्था के दौरान मजदूरी हानि की आंशिक भरपाई हेतु सशर्त नकद सहायता प्रदान करती है, जिससे मातृ पोषण, पर्याप्त विश्राम एवं स्तनपान को बढ़ावा मिलता है।
- समग्र स्तनपान प्रबंधन केंद्र (CLMCs) एवं स्तनपान प्रबंधन इकाइयाँ (LMUs) (2017 से): मदर्स एब्सॉल्यूट अफेक्शन (MAA) कार्यक्रम मुख्य रूप से स्तनपान को बढ़ावा देने और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को परामर्श के लिए प्रशिक्षित करने का एक देशव्यापी अभियान है। पाश्चुरीकृत दाता मानव दूध (Pasteurized Donor Human Milk) उपलब्ध कराने वाले केंद्रों को विशेष रूप से ‘व्यापक दुग्धपान प्रबंधन केंद्र’ (Comprehensive Lactation Management Centres – CLMC) या ह्यूमन मिल्क बैंक (Human Milk Bank) कहा जाता है, जो MAA कार्यक्रम और राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य पहलों के अंतर्गत स्थापित किए जाते हैं।
- पोषण अभियान (राष्ट्रीय पोषण मिशन), 2018: व्यवहार परिवर्तन संचार, डिजिटल निगरानी, सामुदायिक सहभागिता तथा विभिन्न क्षेत्रों के समन्वित प्रयासों के माध्यम से मातृ, शिशु एवं छोटे बच्चों के पोषण को प्रोत्साहित करता है।
केवल (पूर्ण) स्तनपान में गिरावट के प्रभाव
- बाल स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव: इससे कुपोषण, दस्त, निमोनिया, अन्य बाल्यकालीन संक्रमणों एवं शिशु मृत्यु-दर का जोखिम बढ़ता है, साथ ही प्रतिरक्षा क्षमता एवं स्वस्थ शारीरिक विकास प्रभावित होता है।
- मातृ स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव: समय से पूर्व स्तनपान बंद करने से स्तन एवं डिंबग्रंथि (ओवेरियन) कैंसर, प्रसवोत्तर रक्तस्राव के विरुद्ध मिलने वाला संरक्षण कम हो जाता है तथा लैक्टेशनल अमेनोरिया के माध्यम से प्राकृतिक जन्म-अंतराल बनाए रखने की क्षमता भी घटती है।
- स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि: रोकी जा सकने वाली बीमारियों की अधिकता से परिवारों का चिकित्सा व्यय बढ़ता है तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
- पोषण एवं मानव पूँजी की हानि: इससे स्टंटिंग (Stunting), वेस्टिंग (Wasting), संज्ञानात्मक विकास में कमी एवं कमजोर अधिगम परिणाम सामने आते हैं, जो मानव पूँजी निर्माण एवं उत्पादकता को प्रभावित करते हैं।
- आर्थिक बोझ: शिशु दुग्ध विकल्प पर व्यय बढ़ता है, कार्यबल की उत्पादकता घटती है तथा स्वास्थ्य देखभाल की लागत एवं भविष्य की आर्थिक हानि में वृद्धि होती है।
- सामाजिक एवं लैंगिक प्रभाव: यह मातृत्व संरक्षण, कार्यस्थल पर सहयोग एवं बाल देखभाल व्यवस्थाओं की अपर्याप्तता को दर्शाता है, जिससे महिलाओं के स्वास्थ्य, रोजगार की निरंतरता तथा बाल कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- पर्यावरणीय प्रभाव: शिशु दुग्ध विकल्पों पर बढ़ती निर्भरता से प्लास्टिक अपशिष्ट, ऊर्जा खपत एवं ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़ता है, जबकि स्तनपान अधिक पर्यावरण-अनुकूल एवं सतत् विकल्प है।
- सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) पर प्रभाव: यह SDG-2 (भुखमरी की समाप्ति), SDG-3 (अच्छा स्वास्थ्य एवं कल्याण), SDG-5 (लैंगिक समानता) तथा SDG-10 (असमानताओं में कमी) की प्राप्ति की दिशा में प्रगति को बाधित कर सकता है।