संदर्भ
हाल ही में साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत के गंगा के अनुप्रवाही मैदानों में दुग्ध उत्पादन में उल्लेखनीय कमी आ रही है। साथ ही, भैंसें ऊष्मीय तनाव के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील पाई गई हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा तथा किसानों की आजीविका के समक्ष जोखिम उत्पन्न हो रहा है।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष
- दुग्ध उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट: ‘ग्लोबल वार्मिंग’ गोवंशीय दुग्ध उत्पादन में गिरावट का एक प्रमुख कारण बनकर उभरा है, जिसमें हरियाणा का उच्च दुग्ध उत्पादक क्षेत्र विशेष रूप से गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है।
- ऊष्मीय तनाव से उत्पादकता में कमी: 38°C से अधिक तापमान तथा 70% से अधिक आर्द्रता, दुग्ध पशुओं में शारीरिक तनाव उत्पन्न करके दुग्ध उत्पादन को उल्लेखनीय रूप से कम कर देती है।
- भैंसें सर्वाधिक संवेदनशील: भैंसें कम स्वेद ग्रंथियों, गहरे रंग की त्वचा तथा जल में विचरण पर निर्भरता के कारण सर्वाधिक संवेदनशील होती हैं। संभावित वाष्पोत्सर्जन (PET) में वृद्धि से दुग्ध उत्पादन में 1.4 लीटर/दिन तक की कमी आ सकती है।
- संभावित वाष्पोत्सर्जन (PET): यह उस अधिकतम जलराशि को संदर्भित करता है, जो प्रचलित मौसमी परिस्थितियों में, यदि जल की उपलब्धता सीमित न हो, तो भूमि से वाष्पित तथा पौधों से वाष्पोत्सर्जित हो सकती है। यह वायुमंडलीय आर्द्रता की माँग तथा ऊष्मीय तनाव का एक प्रमुख संकेतक है।
- सँकर नस्ल की गायें भी प्रभावित: संकर नस्ल की गायों में ऊष्मा सहनशीलता कम होने के कारण लू के दौरान उत्पादकता में तीव्र गिरावट देखी जाती है।
- देशी नस्लें अधिक सहनशील: साहीवाल तथा हरियाणा नस्लों में प्रभावी स्वेदन, ढीली त्वचा तथा कम उपापचयी ऊष्मा उत्पादन की विशेषताएँ होती हैं, जो उनकी ऊष्मा सहनशीलता को बढ़ाती हैं।
- जलवायु संकेतकों का महत्त्व: संभावित वाष्पोत्सर्जन (PET), तापमान-आर्द्रता सूचकांक (THI), लू, सौर विकिरण तथा वाष्प दाब दुग्ध उत्पादकता को उल्लेखनीय रूप से प्रभावित करते हैं।
जलवायु परिवर्तन दुग्ध उत्पादन को किस प्रकार प्रभावित करता है
- शारीरिक ऊष्मीय तनाव: उच्च तापमान के कारण श्वसन में तीव्रता, चारे का कम सेवन, कॉर्टिसोल स्तर में वृद्धि तथा गतिविधियों में कमी होती है, जिससे दुग्ध उत्पादन के स्थान पर ऊर्जा का उपयोग अन्य शारीरिक क्रियाओं में होने लगता है।
- दुग्ध स्राव में कमी: ऊष्मीय तनाव दुग्ध निष्कासन की प्रक्रिया को बाधित करता है, जिससे दुग्ध उत्पादन में कमी आती है तथा अत्यधिक परिस्थितियों में पशुधन की मृत्यु-दर भी बढ़ जाती है।
- चारे की उपलब्धता में गिरावट: बढ़ते तापमान के कारण चारे की मात्रा, गुणवत्ता तथा उपलब्धता में कमी आती है, साथ ही जल संकट भी बढ़ता है।
- रोगों का बढ़ता बोझ: जलवायु परिवर्तन पशुओं की प्रतिरक्षा क्षमता को कमजोर करता है, जिससे परजीवी संक्रमण, संक्रामक रोगों तथा पशु-चिकित्सा व्यय में वृद्धि होती है।
- आर्थिक हानि: ऊष्मीय तनाव के कारण प्रतिवर्ष लगभग 32 लाख टन दुग्ध उत्पादन का नुकसान (लगभग ₹2,661 करोड़) होता है, जिसके 2050 के दशक तक बढ़कर 1.5 करोड़ टन होने का अनुमान है।
भारत के लिए निहितार्थ
- दुग्ध अर्थव्यवस्था के लिए खतरा: दुग्ध उत्पादकता में गिरावट खाद्य सुरक्षा, पोषण तथा ग्रामीण दुग्ध अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती उत्पन्न करती है।
- आजीविका पर जोखिम: लगभग 8 करोड़ लघु डेयरी किसानों की आय जलवायु-जनित उत्पादकता ह्रास के कारण प्रभावित होने का जोखिम है।
- पोषण सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: दुग्ध की उपलब्धता में कमी से प्रोटीन, कैल्शियम तथा आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्त्वों तक पहुँच प्रभावित होती है।
- कृषि की जलवायु संवेदनशीलता: यह अध्ययन पशुपालन तथा फसल कृषि दोनों की बढ़ती जलवायु संवेदनशीलता को रेखांकित करता है।
अनुकूलन उपाय एवं जलवायु-सहिष्णु प्रथाएँ
- सूक्ष्म-जलवायु प्रबंधन: स्प्रिंकलर, फॉगर, मिस्टिंग प्रणाली, छायायुक्त पशुशालाओं तथा जलकुंडों को अपनाने से ऊष्मीय तनाव में कमी आती है।
- उन्नत पोषण प्रबंधन: संतुलित पोषण, बेहतर चारा प्रबंधन तथा पर्याप्त जल उपलब्धता पशुओं की जलवायु सहनशीलता को बढ़ाती है।
- पूर्व चेतावनी प्रणाली: समय पर हस्तक्षेप सुनिश्चित करने के लिए संभावित वाष्पोत्सर्जन (PET) तथा तापमान-आर्द्रता सूचकांक (THI) को क्षेत्रीय पूर्व चेतावनी प्रणालियों में एकीकृत किया जाए।
- ऊष्मा-सहनशील प्रजनन: बोस इंडिकस (Bos indicus) के गुणों का उपयोग करते हुए ऊष्मा-सहनशीलता बढ़ाने के लिए प्रजनन कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाए।
- देशी नस्लों का संरक्षण: देशी गोवंशीय नस्लों के यथास्थान संरक्षण (In-situ Conservation) तथा किसान-नेतृत्व वाले नस्ल सुधार कार्यक्रमों को सुदृढ़ किया जाए।
पूर्ववर्ती सरकारी पहलें
- राष्ट्रीय गोकुल मिशन (RGM): देशी गोवंशीय नस्लों के संरक्षण तथा आनुवंशिक सुधार को प्रोत्साहित करता है।
- राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम (NPDD): डेयरी अवसंरचना, दुग्ध क्रय तथा मूल्य शृंखलाओं को सुदृढ़ करता है।
- राष्ट्रीय पशुधन मिशन (NLM): चारा विकास, नस्ल सुधार तथा जलवायु-सहिष्णु पशुधन प्रबंधन को समर्थन प्रदान करता है।
- जलवायु-सहिष्णु कृषि पर राष्ट्रीय नवाचार (NICRA): कृषि एवं पशुपालन के लिए जलवायु-सहिष्णु प्रौद्योगिकियों का विकास करता है।
- जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना (NAPCC): सतत् कृषि हेतु राष्ट्रीय मिशन (NMSA) के माध्यम से जलवायु अनुकूलन तथा संसाधन दक्षता को प्रोत्साहित करती है।
आगे की राह
- जलवायु-स्मार्ट डेयरी कृषि को प्रोत्साहन: ऊष्मा शमन अवसंरचना, जलवायु-सहिष्णु पशु आवास तथा जलवायु परामर्श सेवाओं का विस्तार किया जाए।
- देशी नस्ल सुधार कार्यक्रमों को सुदृढ़ करना: ऊष्मा-सहनशील देशी नस्लों के सुधार कार्यक्रमों का व्यापक विस्तार किया जाए।
- चारा सुरक्षा में सुधार: जलवायु-सहिष्णु चारा फसलों, साइलेज तथा सूखा-सहिष्णु चारा के विकास में निवेश बढ़ाया जाए।
- जलवायु परामर्श सेवाओं का विस्तार: ऊष्मीय तनाव पूर्वानुमान, डिजिटल परामर्श तथा विस्तार सेवाओं का विकास किया जाए।
- लघु किसानों को समर्थन: वित्तीय प्रोत्साहन, बीमा, ऋण तथा प्रौद्योगिकी सहायता उपलब्ध कराई जाए।
- अनुसंधान एवं नवाचार को सुदृढ़ करना: पशुधन जीनोमिक्स, परिशुद्ध डेयरी कृषि, जलवायु-सहिष्णु प्रजनन तथा पशु स्वास्थ्य अनुसंधान में निवेश बढ़ाया जाए।
निष्कर्ष
यह निष्कर्ष जलवायु-स्मार्ट डेयरी कृषि, ऊष्मा-सहिष्णु देशी नस्लों, पूर्व चेतावनी प्रणालियों तथा अनुकूलनशील पशुधन प्रबंधन की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं, ताकि बढ़ते वैश्विक तापमान की परिस्थितियों में दुग्ध उत्पादन, पोषण सुरक्षा तथा लघु किसानों की आय का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।