संदर्भ
एक नए उपग्रह अध्ययन से पता चला है कि अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में उच्च जोखिम वाली पाँच में से चार हिमनदीय झीलों में पिछले दस वर्षों में हिमनद पिघलने के कारण इनके आकार में विस्तार देखा गया है, जिससे फ्लैश फ्लड का खतरा बढ़ गया है।
अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष
- खतरे का स्थान: यह अध्ययन तवांग (अरुणाचल प्रदेश) के मागो चू बेसिन में स्थित पाँच झीलों पर केंद्रित था। इन झीलों को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा ‘उच्च जोखिम’ या ‘अत्यंत उच्च जोखिम’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- सान्हापो झील का विस्तार: इस झील में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई। इसका क्षेत्रफल वर्ष 2019 में 78.07 हेक्टेयर से बढ़कर वर्ष 2026 के मध्य में 88.81 हेक्टेयर हो गया। यह अब सुरक्षा निगरानी के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता वाली झील बन गई है।
- अन्य झीलें: दो “अत्यंत उच्च जोखिम” वाली झीलों का आकार लगभग एक हेक्टेयर तक बढ़ा, जबकि ‘धारखा त्सो’ नामक एक अन्य झील में भी धीमी वृद्धि देखी गई। केवल एक झील स्थिर रही।
- उपयोग किए गए उपग्रह: टीम ने वर्ष 2016 से 2026 के बीच परिवर्तन को ट्रैक करने के लिए ICEYE, प्लांटस्कोप और भारत के LISS-IV उपग्रहों जैसे उन्नत अंतरिक्ष उपकरणों का उपयोग किया।
संबद्ध भौगोलिक एवं वैज्ञानिक अवधारणाएँ
- ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF): GLOF एक अचानक और विनाशकारी बाढ़ होती है, जो तब उत्पन्न होती है, जब किसी हिमनदीय झील को रोकने वाला प्राकृतिक बाँध टूट जाता है।
- मोरेन बाँध: जब हिमनद पिघलते हैं और पीछे हटते हैं, तो वे संवेदनशील चट्टानों, बर्फ और मिट्टी की दीवारें छोड़ जाते हैं, जिन्हें मोरेन कहा जाता है। ये मोरेन प्राकृतिक बाँध का कार्य करते हैं और पिघले जल को रोकते हैं। चूँकि ये अवसाद से बने होते हैं, इसलिए ये अस्थिर होते हैं और विखंडनीय हो सकते हैं।
- कारक: झील का विस्तार अस्थिरता को दर्शाता है, लेकिन GLOF सामान्यतः अचानक घटनाओं से उत्पन्न होता है, जैसे भूस्खलन, हिमस्खलन, क्लाउडबर्स्ट (अत्यधिक वर्षा) या चट्टानों का झील में गिरना, जिससे बड़ी लहरें उत्पन्न होती हैं।
- हालिया आपदा उदाहरण: अक्टूबर 2023 में सिक्किम के ‘साउथ ल्होनाक’ झील में दरार आने से एक बड़ी बाढ़ आई, जिसने चुंगथांग जलविद्युत बाँध को नष्ट कर दिया और जनधन की हानि हुई।
नीतिगत ढाँचे एवं शमन पहलें
- राष्ट्रीय GLOF जोखिम शमन कार्यक्रम: NDMA द्वारा सिक्किम आपदा के बाद शुरू किया गया यह कार्यक्रम हिमालय क्षेत्र की 189 उच्च-जोखिम हिमनदीय झीलों पर सुरक्षा उपायों को लक्षित करता है।
- प्रमुख रणनीतियाँ: इस कार्यक्रम के अंतर्गत प्रारंभिक चेतावनी तंत्र स्थापित करना, स्वचालित मौसम स्टेशन स्थापित करना, जल स्तर की निगरानी करना तथा झील के जल स्तर को कम करने के उपाय शामिल हैं, जिससे प्राकृतिक बाँधों पर दबाव कम किया जा सके।
- उपग्रह निगरानी: केंद्रीय जल आयोग (CWC) वर्तमान में भारत में 900 से अधिक हिमनदीय झीलों और जल निकायों की निगरानी के लिए अंतरिक्ष डेटा का उपयोग कर रहा है।
- मुख्य चुनौती: विशेषज्ञों के अनुसार, भारत उपग्रह डेटा के माध्यम से जोखिम वाली झीलों की पहचान में तो सक्षम हो गया है, लेकिन वास्तविक चुनौती इन चेतावनियों को त्वरित इंजीनियरिंग समाधान में परिवर्तित करने में है, ताकि दूरस्थ पर्वतीय समुदायों की प्रभावी सुरक्षा की जा सके।