संदर्भ
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट (SIPRI) ने अपनी वर्ष 2026 की ईयरबुक में आकलन किया है कि भारत के अनुमानित 190 परमाणु आयुधों में से 12 वर्तमान में संचालनात्मक रूप से तैनात हैं। यह ‘नो फर्स्ट यूज’ (NFU) की नीति के अंतर्गत भारत की द्वितीयक प्रहार क्षमता (Second-Strike Capability) की परिपक्वता को रेखांकित करता है।

SIPRI, 2026 के प्रमुख निष्कर्ष
- संचालनात्मक तैनाती: भारत के अनुमानित 190 परमाणु आयुधों में से लगभग 12 सक्रिय सैन्य बलों के साथ संचालनात्मक रूप से तैनात माने गए हैं।
- द्वितीय प्रहार क्षमता: यह तैनाती मुख्यतः भारत की प्रतिघाती क्षमता, विशेषकर समुद्र-आधारित परमाणु प्रतिरोधक क्षमता के सुदृढ़ीकरण को दर्शाती है।
- परमाणु त्रयी का सुदृढ़ीकरण: भारत की थल, वायु एवं समुद्र आधारित परमाणु प्रक्षेपण क्षमताओं के विस्तार ने उसकी प्रतिरोधक क्षमता की विश्वसनीयता को बढ़ाया है।
- कैनिस्टरयुक्त अग्नि मिसाइलें: कैनिस्टरयुक्त अग्नि शृंखला की मिसाइलों की बढ़ती तैनाती से संचालनात्मक तत्परता एवं क्षमता में वृद्धि हुई है।
- समुद्र-आधारित प्रतिरोधक क्षमता: यह तैनाती अरिहंत श्रेणी की SSBN के संचालनात्मक होने से जुड़ी है, जिससे निरंतर प्रतिरोधक गश्त (Deterrence Patrols) संभव हो सकी है।

संचालनात्मक रूप से तैनात परमाणु आयुधों के बारे में
- परिभाषा: ऐसे परमाणु आयुध, जिन्हें प्रक्षेपण प्रणालियों (मिसाइल, विमान अथवा पनडुब्बी) के साथ जोड़ा गया हो तथा अधिकृत कमान एवं नियंत्रण प्रणाली के अंतर्गत संचालनात्मक तत्परता की स्थिति में रखा गया हो।
- युद्ध तत्परता के समान नहीं: संचालनात्मक तैनाती का अर्थ आसन्न उपयोग अथवा परमाणु प्रयोग की सीमा (Nuclear Threshold) को कम करना नहीं है।
- भंडार से भिन्न: किसी देश के पास बड़ी संख्या में परमाणु आयुध हो सकते हैं, किंतु किसी भी समय उनमें से केवल एक सीमित संख्या ही संचालनात्मक रूप से तैनात रहती है।
भारत का परमाणु सिद्धांत
- ‘नो फर्स्ट यूज’ (NFU) की नीति: भारत परमाणु हथियारों का प्रथम प्रयोग नहीं करने के लिए प्रतिबद्ध है, किंतु उस पर परमाणु आक्रमण होने की स्थिति में व्यापक प्रतिघात (Massive Retaliation) का अधिकार सुरक्षित रखता है।
- विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता: भारत केवल उतनी ही परमाणु क्षमता बनाए रखता है, जितनी प्रतिद्वंद्वियों को प्रभावी रूप से निरुत्साहित करने के लिए आवश्यक हो।
- सुनिश्चित प्रतिघात: भारत का ध्यान बड़े पैमाने पर तैनात परमाणु आयुध रखने के बजाय ‘द्वितीयक प्रहार क्षमता’ (Second-Strike Capability) को सुरक्षित बनाए रखने पर केंद्रित है।
- नागरिक-राजनीतिक नियंत्रण: परमाणु हथियार परमाणु कमान प्राधिकरण (NCA) के माध्यम से कठोर नागरिक-राजनीतिक नियंत्रण के अधीन रहते हैं।
इसका महत्त्व
- द्वितीय प्रहार क्षमता को सुदृढ़ बनाना: यह NFU की विश्वसनीयता को बढ़ाता है, क्योंकि इससे प्रतिघाती क्षमता सुनिश्चित होती है।
- परमाणु त्रयी को पूर्ण करना: संचालनात्मक SSBN भारत की परमाणु प्रतिरोधक संरचना के सबसे सुरक्षित घटक के रूप में कार्य करती हैं।
- सामरिक स्थिरता में वृद्धि: विश्वसनीय प्रतिघाती क्षमता प्रतिद्वंद्वी देशों के लिए ‘निःशस्त्रीकरण हेतु प्रथम प्रहार’ (Disarming First Strike) करने की प्रेरणा को कम करती है।
- उभरती सामरिक चुनौतियों का सामना: यह विशेष रूप से चीन की विस्तारशील परमाणु क्षमताओं सहित बदलते सामरिक परिवेश के विरुद्ध भारत की प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ करती है।
भारत की पूर्व पहलें
- प्रारूप परमाणु सिद्धांत (वर्ष 1999): इसमें ‘नो फर्स्ट यूज’ (NFU) तथा विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता के सिद्धांत प्रस्तुत किए गए।
- आधिकारिक परमाणु सिद्धांत (वर्ष 2003): इसमें NFU, सुनिश्चित प्रतिघात तथा परमाणु कमान प्राधिकरण (NCA) के माध्यम से नागरिक-राजनीतिक नियंत्रण को औपचारिक रूप प्रदान किया गया।
- परमाणु त्रयी का विकास: अग्नि बैलिस्टिक मिसाइलों, वायु-आधारित परमाणु प्रक्षेपण क्षमता तथा अरिहंत श्रेणी की SSBN को क्रमिक रूप से शामिल कर परमाणु त्रयी का विकास किया गया।
- मिसाइलों का कैनिस्टरीकरण: अग्नि मिसाइल शृंखला की की क्षमता, गतिशीलता तथा त्वरित प्रक्षेपण क्षमता में वृद्धि की गई।
- INS अरिहंत कार्यक्रम: भारत की स्वदेशी समुद्र-आधारित परमाणु प्रतिरोधक क्षमता की स्थापना की गई, जिससे भारत की परमाणु त्रयी पूर्ण हुई।
उभरती चुनौतियाँ
- क्षेत्रीय शस्त्र प्रतिस्पर्द्धा: चीन एवं पाकिस्तान द्वारा समानांतर रूप से परमाणु आधुनिकीकरण किए जाने से सामरिक प्रतिस्पर्द्धा और अधिक तीव्र हो सकती है।
- प्रौद्योगिकीय व्यवधान: AI, साइबर युद्ध तथा मिसाइल रक्षा प्रणालियों में प्रगति परमाणु प्रतिरोधक क्षमता की स्थिरता को प्रभावित कर सकती है।
- शस्त्र नियंत्रण का अभाव: वैश्विक निःशस्त्रीकरण तंत्र के कमजोर पड़ने से दीर्घकालिक परमाणु जोखिम बढ़ सकते हैं।
- संकट प्रबंधन: बढ़ती संचालनात्मक तत्परता के कारण आकस्मिक तनाव-वृद्धि से बचने हेतु सुदृढ़ कमान एवं नियंत्रण प्रणाली की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है।
आगे की राह
- भारत की विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ बनाना
- द्वितीय प्रहार क्षमता को सुदृढ़ करना: अतिरिक्त SSBN तथा अधिक दूरी वाली SLBM के विकास एवं तैनाती के माध्यम से समुद्र-आधारित प्रतिरोधक क्षमता को और मजबूत किया जाए।
- कमान एवं नियंत्रण प्रणाली का आधुनिकीकरण: सुरक्षित संचार, पूर्व चेतावनी प्रणाली तथा परमाणु कमान एवं नियंत्रण प्रणाली को और अधिक सुदृढ़ बनाया जाए।
- NFU की विश्वसनीयता बनाए रखना: ‘नो फर्स्ट यूज’ (NFU) की नीति तथा विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को निरंतर दोहराया जाए।
- क्षमता निवेश: सामरिक परिसंपत्तियों की गतिशीलता, सुदृढ़ सुरक्षा तथा क्षमता का और विस्तार किया जाए।
- वैश्विक परमाणु स्थिरता को बढ़ावा देना
- शस्त्र नियंत्रण को पुनर्जीवित करना: परमाणु जोखिम में कमी तथा शस्त्र नियंत्रण के लिए नए बहुपक्षीय प्रयासों का समर्थन किया जाए।
- सामरिक संवाद को सुदृढ़ करना: पड़ोसी परमाणु शक्ति संपन्न देशों के साथ विश्वास निर्माण उपायों का विस्तार किया जाए।
- उभरती प्रौद्योगिकियों का समाधान: AI, हाइपरसोनिक हथियारों तथा स्वायत्त सैन्य प्रणालियों के नियमन हेतु अंतरराष्ट्रीय मानकों के विकास को प्रोत्साहित किया जाए।
- उत्तरदायी परमाणु शासन का समर्थन: सार्वभौमिक, सत्यापन योग्य एवं भेदभावरहित परमाणु निरस्त्रीकरण के पक्ष में भारत की दीर्घकालिक नीति को निरंतर आगे बढ़ाया जाए।
निष्कर्ष
भारत द्वारा सीमित संख्या में परमाणु आयुधों की संचालनात्मक तैनाती उसकी सुनिश्चित प्रतिघात क्षमता की परिपक्वता को दर्शाती है, न कि ‘नो फर्स्ट यूज’ (NFU) की नीति से किसी विचलन को। वैश्विक परमाणु प्रतिस्पर्द्धा के तीव्र होते परिदृश्य में विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता तथा उत्तरदायी परमाणु संयम के मध्य संतुलन बनाए रखना भारत की सामरिक सुरक्षा एवं अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रमुख आधार बना रहेगा।