संदर्भ
हाल ही में केंद्र सरकार ने उच्च एथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल (22%–30% एथेनॉल मिश्रण) को केंद्रीय उत्पाद शुल्क से छूट प्रदान की है, जिससे इनके कराधान को वर्तमान में पेट्रोल पंपों पर मानक मिश्रण के रूप में उपलब्ध 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) के समान कर दिया गया है।
संबंधित तथ्य
- भारत सरकार ने केंद्रीय मोटर वाहन नियमों के अंतर्गत 85% एथेनॉल-मिश्रित ईंधन तथा 100% एथेनॉल ईंधन को मान्यता देने के लिए भी संशोधन प्रस्तावित किए हैं।
- ये दोनों कदम इस बात का संकेत हैं कि भारत सरकार देश के वाहन और ईंधन पारिस्थितिकी तंत्र को एथेनॉल के उपयोग के अगले चरण के लिए तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
एथेनॉल मिश्रण क्या है?
- एथेनॉल मिश्रण का तात्पर्य जीवाश्म ईंधन की खपत को कम करने तथा वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को घटाने के लिए पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से है।
- E20 ईंधन: E20 में 20% एथेनॉल और 80% पेट्रोल होता है।
- उच्च एथेनॉल मिश्रण: E27, E30, E85 और E100 जैसे ईंधनों में क्रमशः अधिक अनुपात में एथेनॉल होता है। (UPSC CSE Prelims 2010, 2020)
- एथेनॉल (C₂H₅OH) एक रंगहीन, वाष्पशील और ज्वलनशील जलीय अल्कोहल है। यह वही अल्कोहल है, जो मादक पेयों में पाया जाता है तथा ईंधन, विलायक, कीटाणुनाशक एवं औद्योगिक रसायन के रूप में भी व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
- एथेनॉल का उत्पादन
- जैविक उत्पादन (किण्वन): एथेनॉल का उत्पादन यीस्ट द्वारा शर्करा के किण्वन के माध्यम से किया जाता है, जिसमें ग्लूकोज एथेनॉल और कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है। यह विधि पेय-अल्कोहल तथा जैव-ईंधन उत्पादन के लिए व्यापक रूप से उपयोग की जाती है।
- औद्योगिक उत्पादन (एथिलीन का जलयोजन): एथेनॉल का औद्योगिक उत्पादन एथिलीन के जलयोजन द्वारा भी किया जाता है, जिसमें एथिलीन जल के साथ अभिक्रिया कर एथेनॉल का निर्माण करती है।
- भारत की राष्ट्रीय जैव-ईंधन नीति के तहत कसावा, क्षतिग्रस्त गेहूँ के दाने, सड़े हुए आलू तथा शुगर बीट को संभावित जैव-ईंधन फीडस्टॉक के रूप में मान्यता दी गई है।
- मक्का (Maize) एथेनॉल उत्पादन के लिए एक महत्त्वपूर्ण फीडस्टॉक है और इसकी कृषि विशेष रूप से एथेनॉल उत्पादन हेतु की जा सकती है।
भारत का एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम
- इस कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 2003 में की गई थी और इसे भारत सरकार द्वारा तेल विपणन कंपनियों (Oil Marketing Companies-OMCs) के माध्यम से लागू किया जा रहा है।
- उद्देश्य: इस कार्यक्रम का उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता को कम करना, ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करना, किसानों की आय को समर्थन देना तथा कार्बन उत्सर्जन को घटाना है।
- प्रमुख उपलब्धि: भारत ने 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) के लक्ष्य को निर्धारित समय से पहले प्राप्त कर लिया है, जिससे यह विश्व के सबसे तेजी से बढ़ते एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रमों में से एक बन गया है।
- मिश्रण लक्ष्य
- पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) प्राप्त करने का मूल लक्ष्य वर्ष 2030 तक निर्धारित किया गया था, जिसे संशोधित राष्ट्रीय जैव-ईंधन नीति के तहत आगे बढ़ाकर वर्ष 2025–26 कर दिया गया।
- भारत ने बाद में E20 लक्ष्य को निर्धारित समय से पहले ही प्राप्त कर लिया और अब परिवहन क्षेत्र में उच्च एथेनॉल मिश्रण स्तरों की दिशा में संभावनाओं का अन्वेषण कर रहा है।
- फीडस्टॉक आधार: एथेनॉल उत्पादन मुख्य रूप से गन्ना, शुगर सिरप, बी-हेवी शीरा (B-Heavy Molasses), सी-हेवी शीरा (C-Heavy Molasses), क्षतिग्रस्त खाद्यान्न, तथा अधिशेष चावल और मक्का पर आधारित है।
राष्ट्रीय जैव-ईंधन नीति, 2018 (संशोधित 2022)
- इस नीति का उद्देश्य जैव-ईंधनों के उत्पादन और उपयोग को बढ़ावा देकर ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करना, कच्चे तेल के आयात को कम करना, किसानों की आय में वृद्धि करना तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को घटाना है।
- यह नीति एथेनॉल उत्पादन के लिए अनुमत फीडस्टॉक की सीमा का विस्तार करती है, जिसमें गन्ना-आधारित उत्पाद, मक्का, अधिशेष खाद्यान्न, क्षतिग्रस्त अनाज तथा कृषि अवशेष शामिल हैं।
- इस नीति ने पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) प्राप्त करने के लक्ष्य को वर्ष 2030 से आगे बढ़ाकर वर्ष 2025–26 कर दिया, जिससे स्वच्छ परिवहन ईंधनों की दिशा में भारत के संक्रमण को गति मिली।
- यह नीति वित्तीय प्रोत्साहनों और संस्थागत समर्थन के माध्यम से उन्नत जैव-ईंधनों तथा कृषि अवशेषों से द्वितीय पीढ़ी (2G) एथेनॉल के उत्पादन को बढ़ावा देती है।
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भारत उच्च एथेनॉल मिश्रण पर विचार क्यों कर रहा है?
- तेल आयात में कमी: उच्च एथेनॉल मिश्रण से भारत की आयातित कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता को कम करने में सहायता करता है, जिससे व्यापार संतुलन में सुधार होता है।
- ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करना: घरेलू स्तर पर उत्पादित जैव-ईंधनों के बढ़ते उपयोग से वैश्विक तेल कीमतों की अस्थिरता तथा आपूर्ति व्यवधानों के प्रति भारत की क्षमता और लचीलापन बढ़ता है।
- किसानों को समर्थन: एथेनॉल उद्योग के विस्तार से कृषि-आधारित कच्चे माल की निरंतर माँग उत्पन्न होती है, जिससे किसानों को आय का एक अतिरिक्त और स्थिर स्रोत प्राप्त होता है।
- जलवायु प्रतिबद्धताओं की पूर्ति: अधिक एथेनॉल मिश्रण परिवहन क्षेत्र से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में योगदान देता है, जिससे भारत के जलवायु लक्ष्यों तथा ‘नेट-जीरो’ उत्सर्जन उद्देश्यों को समर्थन मिलता है।
- ग्रामीण औद्योगीकरण और रोजगार: जैव-ईंधन मूल्य शृंखला के विस्तार से ग्रामीण औद्योगीकरण को बढ़ावा मिलता है तथा उत्पादन, प्रसंस्करण एवं परिवहन क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सृजित होते हैं।

- विदेशी मुद्रा की बचत: उच्च एथेनॉल मिश्रण से आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम होती है, जिसके परिणामस्वरूप विदेशी मुद्रा की उल्लेखनीय बचत होती है।
- सरकारी अनुमानों के अनुसार, एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम के माध्यम से संचयी रूप से लगभग ₹1.59 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है।
- आयात निर्भरता में कमी: एथेनॉल मिश्रण बढ़ने से आयातित पेट्रोलियम उत्पादों की माँग घटती है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होती है और वैश्विक तेल मूल्य उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशीलता कम होती है।

E20 से आगे बढ़ने में प्रमुख चिंताएँ
- वाहन अनुकूलता संबंधी चिंताएँ: भारत में अधिकांश वाहन वर्तमान में E20 ईंधन के लिए डिजाइन किए गए हैं। उच्च एथेनॉल मिश्रण के उपयोग हेतु इंजनों, ईंधन प्रणालियों तथा भंडारण घटकों में संशोधन की आवश्यकता हो सकती है, ताकि सुरक्षित और कुशल प्रदर्शन सुनिश्चित किया जा सके।
- फीडस्टॉक उपलब्धता संबंधी चिंताएँ: उच्च मिश्रण लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एथेनॉल की कहीं अधिक मात्रा की आवश्यकता होगी, जिससे कृषि उत्पादन और कच्चे माल की उपलब्धता पर दबाव पड़ सकता है।
- खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: मक्का और गन्ने जैसी खाद्य फसलों का एथेनॉल उत्पादन की ओर बढ़ता उपयोग खाद्य उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है तथा आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव ला सकता है।
- जल उपभोग संबंधी चिंताएँ: भारत का एथेनॉल कार्यक्रम मुख्यतः गन्ने पर आधारित है, जो अत्यधिक जल-गहन फसल है। इससे भूजल दोहन और क्षेत्रीय जल-संकट की चिंताएँ बढ़ती हैं।
- पर्यावरणीय स्थिरता संबंधी चिंताएँ: एकल फसल खेती के विस्तार तथा उर्वरकों के बढ़ते उपयोग से, यदि सतत् तरीके से प्रबंधन न किया जाए, तो मृदा क्षरण और पारिस्थितिकी असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
- आर्थिक व्यवहार्यता संबंधी चिंताएँ: उच्च एथेनॉल मिश्रण की ओर संक्रमण के लिए ईंधन अवसंरचना, भंडारण प्रणालियों, वितरण नेटवर्क तथा वाहन प्रौद्योगिकी उन्नयन में बड़े निवेश की आवश्यकता होती है, जिससे संक्रमण की कुल लागत बढ़ जाती है।
ब्राजील से भारत क्या सीख सकता है?
- ‘फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स’ को बढ़ावा: ब्राजील का अनुभव दर्शाता है कि फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स को व्यापक रूप से अपनाने से विभिन्न स्तर के एथेनॉल मिश्रित ईंधनों का उपयोग संभव हो जाता है। इससे पारंपरिक पेट्रोल पर निर्भरता कम होती है।
- एथेनॉल फीडस्टॉक का विविधीकरण: भारत कृषि अवशेषों, अपशिष्ट बायोमास तथा द्वितीय पीढ़ी के जैव-ईंधनों से एथेनॉल उत्पादन का विस्तार करके गन्ने और खाद्यान्नों पर अत्यधिक निर्भरता को कम कर सकता है।
- जल उपयोग दक्षता में सुधार: सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों तथा सतत् कृषि पद्धतियों को अपनाने से एथेनॉल उत्पादन से जुड़े जल उपयोग को उल्लेखनीय रूप से कम किया जा सकता है।
- आपूर्ति शृंखला को सुदृढ़ बनाना: उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधनों की विश्वसनीय और देशव्यापी उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कुशल भंडारण, परिवहन तथा वितरण नेटवर्क का विकास आवश्यक है।
- नीतिगत स्थिरता सुनिश्चित करना: एथेनॉल उत्पादन, वाहन प्रौद्योगिकी तथा सहायक अवसंरचना में दीर्घकालिक निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए एक स्थिर, स्पष्ट और पूर्वानुमेय जैव-ईंधन नीति ढाँचा आवश्यक है।
फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स (Flex-Fuel Vehicles – FFVs) के बारे में
- फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स ऐसे विशेष रूप से डिजाइन किए गए वाहन हैं, जो पेट्रोल, एथेनॉल या दोनों के विभिन्न मिश्रणों पर संचालित हो सकते हैं।
- उच्च एथेनॉल अनुकूलता: ये वाहन E85 (85% एथेनॉल और 15% पेट्रोल) सहित उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधनों का कुशलतापूर्वक उपयोग कर सकते हैं, बिना उपयोगकर्ताओं को इंजन में बड़े संशोधन करने की आवश्यकता के।
- पर्यावरणीय लाभ: फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स का उपयोग ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में सहायता करता है तथा स्वच्छ परिवहन ईंधनों की ओर संक्रमण को बढ़ावा देता है।
- एथेनॉल मिश्रण को समर्थन: ये वाहन उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधनों को अपनाने में सहायक होते हैं, जिससे कच्चे तेल के आयात में कमी आती है और ऊर्जा सुरक्षा सुदृढ़ होती है।
- भारत की पहल: भारत सरकार एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को आगे बढ़ाने तथा दीर्घकालिक कार्बन-मुक्ति लक्ष्यों को प्राप्त करने की अपनी रणनीति के तहत फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स को प्रोत्साहित कर रही है।
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संस्थागत एवं नीतिगत ढाँचा
- नीति आयोग–जैव-ईंधन संबंधी सिफारिशें: नीति आयोग गन्ना-आधारित एथेनॉल पर निर्भरता कम करने के लिए विविधीकृत जैव-ईंधन रणनीति का समर्थन करता है, क्योंकि गन्ना एक अत्यधिक जल-गहन फसल है।
- यह कृषि अवशेषों, बायोमास तथा नगर ठोस अपशिष्ट के उपयोग से द्वितीय पीढ़ी (2G) एथेनॉल उत्पादन को बढ़ाने पर बल देता है, जिससे खाद्य बनाम ईंधन की समस्या का समाधान किया जा सके।
- नीति आयोग फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स के व्यापक उपयोग को बढ़ावा देने तथा दीर्घकालिक ऊर्जा संक्रमण के लिए एथेनॉल मिश्रण से संबंधित अवसंरचना एवं आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ करने की भी सिफारिश करता है।
- राष्ट्रीय जैव ईंधन समन्वय समिति (NBCC): NBCC राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति के अंतर्गत स्थापित सर्वोच्च अंतर-मंत्रालयी निकाय है, जो भारत के जैव ईंधन पारितंत्र के समन्वय हेतु उत्तरदायी है।
- यह एथेनॉल मिश्रण लक्ष्यों की प्रगति की निगरानी करती है, विनियमित परिस्थितियों में अधिशेष खाद्यान्न सहित विभिन्न फीडस्टॉक (कच्चे माल) के उपयोग को अनुमोदित करती है तथा ऊर्जा सुरक्षा के उद्देश्यों और खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बीच संतुलन सुनिश्चित करती है।
- इसके अतिरिक्त, यह E85 जैसे उच्च एथेनॉल मिश्रणों तथा उन्नत जैव ईंधनों के विस्तार हेतु नीतिगत निर्णयों को सुगम बनाती है एवं विभिन्न क्षेत्रों में उनके समन्वित क्रियान्वयन को सुनिश्चित करती है।
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निष्कर्ष
E20 से आगे की दिशा में भारत का संक्रमण ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकता है, कच्चे तेल के आयात को कम कर सकता है तथा जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति में योगदान दे सकता है। हालाँकि, इस परिवर्तन की दीर्घकालिक सफलता फीडस्टॉक की सतत् उपलब्धता सुनिश्चित करने, खाद्य एवं जल सुरक्षा की रक्षा करने, फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स को बढ़ावा देने एवं एक सुदृढ़ जैव-ईंधन पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने पर निर्भर करेगी।