भारत–यू.के. मुक्त व्यापार समझौता

17 Jun 2026

संदर्भ 

भारत, भारत–यू.के. मुक्त व्यापार समझौते के क्रियान्वयन में आ रही एक प्रमुख बाधा को हल करने के लिए लगभग 900 मिलियन डॉलर के इस्पात कोटा की माँग कर रहा है। यह मुद्दा मुख्य रूप से यू.के. द्वारा लगाए गए नए आयात प्रतिबंधों और आगामी पर्यावरण करों के कारण उत्पन्न हुआ है, जो दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते की प्रगति में देरी का कारण बन रहे हैं।

संबंधित तथ्य 

  • औद्योगिक निर्यातों को दो प्रमुख नियामकीय बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है, भले ही व्यापार वार्ताएँ पूरी हो चुकी हों।
  • अधिकारियों ने बताया कि तत्काल चिंता इस्पात कोटा को लेकर है, क्योंकि यह 1 जुलाई से लागू होने जा रहा है।
  • इसके बाद यूनाइटेड किंगडम का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) लागू होगा, जो 1 जनवरी, 2027 से प्रभावी होने की योजना है।

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भारत–यू.के. मुक्त व्यापार समझौता 

  • वर्तमान स्थिति: वार्ता एक वर्ष पहले पूर्ण हो चुकी थी और यह ऐतिहासिक द्विपक्षीय समझौता जुलाई 2025 में औपचारिक रूप से हस्ताक्षरित किया गया।
    • हालाँकि भारत–यू.के. मुक्त व्यापार समझौता (FTA) वर्ष 2025 में हस्ताक्षरित हो चुका है, इसके लाभ तभी प्राप्त होंगे, जब घरेलू स्तर पर इसकी अनुमोदन प्रक्रिया और कार्यान्वयन तंत्र स्थापित हो जाएगा।
    • इसलिए वास्तविक व्यापारिक लाभ कानूनी और संस्थागत क्रियान्वयन पर निर्भर हैं।
  • द्विपक्षीय व्यापार मूल्य: भारत का यूनाइटेड किंगडम को कुल वस्तु निर्यात लगभग 13.4 बिलियन डॉलर है, जिसमें लोहे, इस्पात और संबंधित उत्पादों का हिस्सा लगभग 893.4 मिलियन डॉलर है।
  • मुख्य उद्देश्य: इस FTA का उद्देश्य आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है, जिसके तहत टैरिफ (आयात शुल्क) को कम करना और बाजार पहुँच को सरल बनाना शामिल है, विशेष रूप से भारतीय वस्त्र और ब्रिटिश ऑटोमोबाइल जैसे प्रमुख क्षेत्रों के लिए।

यू.के.–भारत मुक्त व्यापार समझौता– प्रमुख विशेषताएँ 

  • शुल्क (टैरिफ)
    • शून्य-शुल्क पहुँच: भारत से यूनाइटेड किंगडम को निर्यात होने वाली 99% वस्तुओं पर अब कोई आयात शुल्क नहीं लगेगा, जिससे लगभग सभी भारतीय निर्यात हित सकारात्मक लाभ प्राप्त करेंगे।
    • भारत द्वारा टैरिफ में कमी: भारत यू.के. की 90% टैरिफ लाइनों पर शुल्क कम करेगा, जिनमें से 85% वस्तुओं पर 10 वर्षों के भीतर शून्य शुल्क लागू हो जाएगा।
  • व्यापार 
    • व्यापार वृद्धि: अनुमान है कि वर्ष 2040 तक द्विपक्षीय व्यापार में प्रति वर्ष 25.5 अरब पाउंड की वृद्धि होगी।
    • वर्तमान द्विपक्षीय व्यापार: वर्ष 2024 में यह 42.6 अरब पाउंड था, जिसमें भारत यूनाइटेड किंगडम का 11वाँ सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।
  • यू.के. के प्रमुख लाभान्वित क्षेत्र 
    • शराब: व्हिस्की और जिन पर शुल्क 150% से घटाकर 75% किया जाएगा, और समझौते के दसवें वर्ष तक इसे 40% तक लाया जाएगा।
      • भारत में शराब उद्योग को आशंका है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ इसी प्रकार के समझौते भारतीय शराब उद्योग पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।
    • ऑटोमोबाइल: यू.के. की कारों पर आयात शुल्क, कोटा व्यवस्था के तहत, 100% से अधिक से घटाकर 10% किया जाएगा।
  • भारत के प्रमुख लाभान्वित क्षेत्र 
    • श्रम-प्रधान निर्यात: वस्त्र, चमड़ा, समुद्री उत्पाद, खिलौने, रत्न एवं आभूषण, खेल सामान और जूते।
    • औद्योगिक क्षेत्र: इंजीनियरिंग सामान, ऑटो पार्ट्स और ऑर्गेनिक केमिकल्स।
  • गतिशीलता और सेवाएँ
    • कार्य वीजा: IT और स्वास्थ्य क्षेत्र सहित भारतीय पेशेवरों के लिए प्रति वर्ष लगभग 100 नए वीजा उपलब्ध होंगे।
    • सामाजिक सुरक्षा समझौता/दोहरा अंशदान समझौता: इस समझौते के तहत यू.के. में कार्यरत कुशल भारतीय कर्मचारी और उनके नियोक्ता तीन वर्षों तक सामाजिक सुरक्षा अंशदान से मुक्त रहेंगे।
    • अत्यधिक अनुकूल राष्ट्र (MFN) प्रतिबद्धताएँ: यूनाइटेड किंगडम ने 92 क्षेत्रों/उप-क्षेत्रों में MFN प्रतिबद्धताएँ दी हैं, जिनमें निजी रूप से वित्तपोषित स्वास्थ्य सेवाएँ तथा पेशेवर और शिक्षा सेवाएँ शामिल हैं।
    • आर्थिक आवश्यकता परीक्षण (ENT): यू.के. ने अपने क्षेत्र में व्यक्तियों के अस्थायी प्रवेश पर किसी प्रकार की संख्या सीमा या आर्थिक आवश्यकता परीक्षण लागू न करने पर सहमति दी है।

भारत–यू.के. FTA की आवश्यकता के कारण 

  • कोविड-19 के बाद आपूर्ति शृंखला विविधीकरण: पश्चिमी कंपनियों ने चीन पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम को समझा।
    • “चाइना-प्लस-वन” रणनीति के तहत स्रोतों को विविध बनाने और निर्भरता कम करने पर जोर दिया गया।
  • ब्रेक्सिट के बाद यू.के. की आर्थिक रणनीति: यूरोपीय सिंगल मार्केट से बाहर निकलने के बाद यू.के. ने यूरोप के भीतर सहज व्यापार और गतिशीलता खो दी।
    • भारत का बड़ा और तेजी से बढ़ता बाजार इस नुकसान की भरपाई के लिए एक महत्त्वपूर्ण विकल्प के रूप में उभरा।
  • यू.के. की घरेलू आर्थिक चुनौतियाँ: यू.के. में जीवनयापन की लागत बढ़ी है।
    • FTA से सस्ते आयात और निर्यात के अधिक अवसर मिलने की संभावना है।
  • RCEP से भारत के बाहर रहने के बाद की रणनीति: भारत ने वर्ष 2019 में RCEP से बाहर रहने का निर्णय लिया, जिससे वह चीन के प्रभुत्व वाले इस व्यापारिक गुट का हिस्सा बनने से बच गया।
    • इसके बाद भारत के लिए यू.के. जैसे देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते करना आवश्यक हो गया।

PWOnlyIAS विशेष

मुख्य शब्दावली

  • मुक्त व्यापार समझौता (FTA): यह एक ऐसा समझौता है, जिसमें दो या अधिक देश व्यापार बाधाओं जैसे कर सीमाओं को हटाने पर सहमत होते हैं, ताकि उनके बीच वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार सस्ता और आसान हो सके।
  • टैरिफ-रेट कोटा (TRQ): यह एक दो-स्तरीय व्यापार नियम है। किसी उत्पाद की एक निश्चित मात्रा को कम या शून्य शुल्क पर आयात करने की अनुमति होती है, लेकिन उस सीमा से अधिक आयात पर बहुत अधिक शुल्क लगाया जाता है।
  • कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM): यह एक हरित सीमा कर है, जो उन आयातित वस्तुओं पर लगाया जाता है, जिनका उत्पादन प्रदूषणकारी प्रक्रियाओं से हुआ हो। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी वस्तुएँ भी घरेलू जलवायु नियमों के समान कार्बन लागत वहन करें।
  • कार्बन रिसाव (Carbon Leakage): यह वह स्थिति है, जब कंपनियाँ कठोर पर्यावरण नियमों वाले देश से अपना उत्पादन हटाकर ऐसे देश में ले जाती हैं, जहाँ प्रदूषण नियम ढीले हों, ताकि लागत कम हो सके।
  • व्यापार विचलन (Trade Diversion): जब किसी बड़े वैश्विक बाजार में उच्च कर या बाधाओं के कारण व्यापारी अपने अतिरिक्त माल को किसी अन्य अपेक्षाकृत कमजोर बाजार में भेजने लगते हैं।
  • मोस्ट फेवर्ड नेशन’ (MFN) स्थिति: इसका अर्थ है कि एक देश को अपने सभी WTO व्यापारिक साझेदारों के साथ समान व्यवहार करना होता है। यदि वह किसी एक देश को व्यापारिक लाभ देता है, तो उसे अन्य सभी WTO सदस्यों को भी वही लाभ देना होता है।
  • आर्थिक आवश्यकता परीक्षण (ENT): यह एक गैर-पारदर्शी और विवेकाधीन मानदंड है, जिसके तहत किसी देश द्वारा विदेशी सेवा प्रदाताओं को तभी प्रवेश दिया जाता है, जब वहाँ “आर्थिक आवश्यकता” सिद्ध हो।
    • आर्थिक आवश्यकता परीक्षण को सेवा व्यापार पर सामान्य समझौते (GATS) के अनुच्छेद XVI के तहत बाजार पहुँच में बाधा के रूप में पहचाना गया है।
      • यह विश्व व्यापार संगठन (WTO) की एक संधि है, जो सेवाओं के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित करती है।

भारत के लिए भारत–यू.के. FTA का महत्त्व 

  • व्यापार: भारत सरकार को उम्मीद है कि यह समझौता दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करेगा, जो वर्तमान में लगभग 60 अरब डॉलर है, और वर्ष 2030 तक इसमें उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
  • रणनीतिक साझेदारी: यह समझौता ब्रेक्सिट के बाद भारत–यू.के. संबंधों को मजबूत करता है और भारत को यू.के. की ‘वैश्विक ब्रिटेन’ रणनीति में एक प्रमुख साझेदार के रूप में स्थापित करता है।
  • संरक्षित क्षेत्रों का खुलना: पहली बार भारत ने ऑटोमोबाइल जैसे अत्यधिक संरक्षित क्षेत्रों में टैरिफ कटौती की अनुमति दी है, जो व्यापार नीति में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन है।
  • निर्यात और घरेलू उद्योग को बढ़ावा: यू.के. ने वस्त्र, जूते, ऑटो पार्ट्स, रत्न एवं आभूषण, इंजीनियरिंग सामान आदि जैसे अनेक भारतीय उत्पादों पर टैरिफ समाप्त कर दिया है।
    • ये श्रम-प्रधान क्षेत्र हैं, इसलिए शुल्क-मुक्त पहुँच से निर्यात, रोजगार और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में वृद्धि होगी।
  • श्रमिक गतिशीलता: भारतीय पेशेवरों के लिए 3 वर्षों की सामाजिक सुरक्षा छूट से लागत प्रतिस्पर्द्धा और कार्यबल की गतिशीलता बढ़ेगी।
    • इससे आईटी, वित्त, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सेवा क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।
  • भविष्य के एफटीए के लिए मॉडल: भारत का यह दृष्टिकोण बाजार पहुँच और राष्ट्रीय हितों के मध्य संतुलन बनाता है, जो यूरोपीय संघ तथा अमेरिका जैसे देशों के साथ भविष्य की वार्ताओं के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करता है।
  • संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा: भारत ने डेयरी, सेब और कुछ कृषि उत्पादों को टैरिफ कटौती से बाहर रखा है, जिससे छोटे किसानों तथा घरेलू कृषि अर्थव्यवस्था की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
    •  यह दर्शाता है कि भारत उच्च-स्तरीय व्यापार समझौतों में भी अपने कमजोर क्षेत्रों की रक्षा करने में सक्षम है।

समाधान की आवश्यकता वाली चुनौतियाँ 

  • आधुनिक एफटीए का संदर्भ: यह विवाद दर्शाता है कि मुक्त व्यापार समझौते अब केवल टैरिफ कटौती के साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि वे नियामकीय संरक्षणवाद से प्रभावित ढाँचों में विकसित हो चुके हैं, जिनमें कार्बन सीमा कर, संरक्षणात्मक उपाय, स्थिरता मानक और उत्पत्ति के नियमों का अनुपालन शामिल है।
  • कड़े इस्पात कोटा: यूनाइटेड किंगडम 1 जुलाई, 2026 से आयातित इस्पात पर लागू अपने शुल्क-मुक्त कोटा में उल्लेखनीय कटौती कर रहा है।
    • भारत का तर्क है कि इस्पात कोटा प्रतिबंध उसके पिछले तीन वर्षों के औसत निर्यात के आधार पर निर्धारित किए जाने चाहिए। इस मानदंड के अभाव में, एफटीए के तहत रियायती टैरिफ उपलब्ध होने के बावजूद भारत की वास्तविक बाजार पहुँच सीमित हो सकती है।
  • उच्च दंडात्मक शुल्क: यूनाइटेड किंगडम द्वारा निर्धारित नई सीमा से अधिक निर्यात किए गए भारतीय इस्पात पर कर की दर दोगुनी होकर 25% से बढ़कर 50% हो जाएगी।
  • घरेलू राजनीतिक संरक्षण: यद्यपि इस्पात क्षेत्र यूनाइटेड किंगडम के कुल आर्थिक उत्पादन का केवल 0.1% हिस्सा है, फिर भी यह लगभग 37,000 श्रमिकों की नौकरियों की सुरक्षा करता है, जो सत्तारूढ़ लेबर पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
    • यूनाइटेड किंगडम के ये प्रतिबंध वैश्विक इस्पात उत्पादन क्षमता की अधिकता, व्यापार विचलन के जोखिम तथा घरेलू औद्योगिक रोजगार की सुरक्षा की चिंताओं से प्रेरित हैं।
    • हाल के उपाय यह दर्शाते हैं कि यूनाइटेड किंगडम मुक्त व्यापार समझौते की प्रतिबद्धताओं और घरेलू राजनीतिक-आर्थिक दबावों के मध्य संतुलन बनाने के लिए अधिक रक्षात्मक व्यापार नीति अपना रहा है।
  • आसन्न हरित कर: औद्योगिक निर्यातों के सामने 1 जनवरी, 2027 से दूसरी बड़ी चुनौती उत्पन्न होगी, जब यूनाइटेड किंगडम अपना कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) लागू करेगा। यह इस्पात, सीमेंट और एल्युमिनियम जैसे अधिक कार्बन-उत्सर्जन वाले आयातित उत्पादों पर लगाया जाने वाला एक विशेष कर है।
  • वैश्विक व्यापार विचलन: यूनाइटेड किंगडम रक्षात्मक रुख अपना रहा है क्योंकि अमेरिका और यूरोपीय संघ पहले ही इस्पात पर अपने शुल्क को 50% तक बढ़ा चुके हैं। इससे यह आशंका बढ़ गई है कि वैश्विक स्तर पर अतिरिक्त इस्पात उत्पादन खुले ब्रिटिश बाजारों में बड़ी मात्रा में भेजा जा सकता है।

आगे की राह 

  • पिछले औसत के आधार पर कोटा सुनिश्चित करना: भारत को कानूनी और कूटनीतिक स्तर पर यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि इस्पात कोटा उसके पिछले तीन वर्षों के औसत निर्यात के आधार पर निर्धारित किया जाए, ताकि वर्तमान व्यापार मात्रा बनी रहे।
  • रणनीतिक प्रतिकार: भारत अपने विशाल घरेलू बाजार का उपयोग करते हुए स्कॉच व्हिस्की जैसे प्रमुख ब्रिटिश उत्पादों पर पारस्परिक शुल्क लगाने की संभावना का संकेत देकर यूनाइटेड किंगडम को समझौते की दिशा में प्रेरित कर सकता है।
  • औद्योगिक मानकों का उन्नयन: भारतीय इस्पात निर्माताओं को हरित विनिर्माण प्रक्रियाओं को तेजी से अपनाना होगा, ताकि वे वर्ष 2027 से लागू होने वाले कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म की पर्यावरणीय आवश्यकताओं को सफलतापूर्वक पूरा कर सकें।

निष्कर्ष

वर्तमान गतिरोध यह दर्शाता है कि आधुनिक व्यापार समझौते अब केवल टैरिफ कम करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनमें घरेलू रोजगार सुरक्षा, जलवायु नियमों और जटिल नियामकीय चुनौतियों के मध्य संतुलन स्थापित करना भी शामिल है। वर्ष 2025 के भारत–यू.के. मुक्त व्यापार समझौते से वास्तविक आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए दोनों देशों को ऐसा मध्य मार्ग खोजने की आवश्यकता है, जो भारत की निर्यात क्षमता तथा यूनाइटेड किंगडम की हरित संक्रमण संबंधी प्राथमिकताओं और घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलताओं के मध्य संतुलन स्थापित कर सके।

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