संदर्भ
हाल ही में केंद्र सरकार सभी फिल्मों के लिए, जिनमें ओवर-द-टॉप (OTT) प्लेटफॉर्मों पर प्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शित की जाने वाली फिल्में भी शामिल हैं, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) से प्रमाणन को अनिवार्य बनाने हेतु सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 तथा उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों में संशोधन करने पर विचार कर रही है।

वर्तमान विवाद
- प्रस्ताव का कारण: ‘सतलुज’ (पूर्व शीर्षक ‘पंजाब 95’) फिल्म से जुड़े विवाद के बाद OTT सामग्री के अनिवार्य प्रमाणन संबंधी प्रस्ताव को गति मिली। यह फिल्म जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित एक जीवनीपरक फिल्म है।
- विवाद की पृष्ठभूमि: CBFC ने फिल्म में 127 कट्स करने की अनुशंसा की थी, जिसे फिल्म निर्माताओं ने स्वीकार नहीं किया है। इसके परिणामस्वरूप, फिल्म को सिनेमाघरों में प्रदर्शन हेतु प्रमाणन प्रदान नहीं किया गया।
- इसके बाद फिल्म को CBFC प्रमाणन के बिना सीधे OTT प्लेटफॉर्म पर जारी किया गया, किंतु प्रदर्शन के कुछ समय बाद ही उसे प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया।
प्रस्तावित संशोधन के बारे में
- प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य सार्वजनिक प्रदर्शन हेतु उपलब्ध कराई जाने वाली सभी फिल्मों पर वर्तमान फिल्म प्रमाणन व्यवस्था का विस्तार करना है, चाहे उनका प्रदर्शन सिनेमाघरों, OTT प्लेटफॉर्मों अथवा किसी अन्य डिजिटल माध्यम पर किया जाए।
- कार्यान्वयन करने वाले मंत्रालय: प्रस्तावित संशोधन का क्रियान्वयन संयुक्त रूप से इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) द्वारा किए जाने की संभावना है।
- प्रमुख परिवर्तन: वर्तमान में अनिवार्य CBFC प्रमाणन केवल सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के अंतर्गत सिनेमाघरों में प्रदर्शित फिल्मों पर लागू होता है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य सिनेमाघरों एवं डिजिटल माध्यमों के बीच विद्यमान इस भेद को समाप्त करते हुए एक समान प्रमाणन व्यवस्था लागू करना है।
प्रस्तावित संशोधन की आवश्यकता
- मीडिया उपभोग के बदलते स्वरूप: नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम वीडियो, जियोहॉटस्टार, सोनी लाइव एवं जी5 जैसे OTT प्लेटफॉर्मों के तीव्र विस्तार ने फिल्मों के उपभोग के स्वरूप को परिवर्तित कर दिया है, जिससे बड़ी संख्या में फिल्में सीधे डिजिटल माध्यमों पर प्रदर्शित की जा रही हैं।
- नियामकीय समानता सुनिश्चित करना: वर्तमान में एक ही फिल्म केवल प्रदर्शन के माध्यम के आधार पर अलग-अलग नियामकीय मानकों के अधीन हो सकती है। जहाँ सिनेमाघरों में प्रदर्शित फिल्मों के लिए CBFC प्रमाणन अनिवार्य है, वहीं प्रत्यक्ष OTT प्रदर्शन के लिए ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा: सरकार का तर्क है कि आतंकवाद, अलगाववाद, उग्रवाद अथवा सांप्रदायिक हिंसा जैसे विषयों पर आधारित फिल्में जनमत को प्रभावित कर सकती हैं तथा उनका उपयोग विदेशी शत्रुतापूर्ण तत्त्वों अथवा चरमपंथी संगठनों द्वारा किया जा सकता है। ‘सतलुज’ फिल्म से जुड़ा विवाद इसका एक उदाहरण माना गया है।
- एकरूप नियामकीय पर्यवेक्षण सुनिश्चित करना: अनिवार्य CBFC प्रमाणन से यह सुनिश्चित होगा कि सार्वजनिक प्रदर्शन हेतु उपलब्ध प्रत्येक फिल्म का परीक्षण उसके प्रदर्शन मंच की परवाह किए बिना एक समान वैधानिक ढाँचे के अंतर्गत किया जाए।
वर्तमान विधिक ढाँचा
- केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC): केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC), सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के अंतर्गत गठित एक वैधानिक निकाय है, जो सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) के अधीन कार्य करता है।
- यह सिनेमाघरों में सार्वजनिक प्रदर्शन हेतु प्रदर्शित की जाने वाली फिल्मों के विनियमन के लिए उत्तरदायी है।
- कार्य: बोर्ड सिनेमाघरों में प्रदर्शन से पूर्व फिल्मों का परीक्षण करता है ताकि वे सिनेमैटोग्राफ अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप हों। प्रमाणन प्रदान करने से पूर्व बोर्ड आवश्यकतानुसार फिल्म निर्माताओं को दृश्यों में संशोधन, विलोपन अथवा परिवर्तन करने का निर्देश दे सकता है।
- प्रमाणन की श्रेणियाँ
- U (युनिवर्सल): सभी आयु वर्ग के दर्शकों के लिए उपयुक्त।
- UA: अभिभावकीय मार्गदर्शन में बच्चों के लिए उपयुक्त। सिनेमैटोग्राफ (संशोधन) अधिनियम, 2023 के अंतर्गत UA 7+, UA 13+ एवं UA 16+ श्रेणियाँ जोड़ी गई हैं।
- A (केवल वयस्क): केवल 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यक्तियों के लिए।
- S (विशेष): किसी विशिष्ट व्यवसाय अथवा विशिष्ट वर्ग के सदस्यों तक सीमित।
सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 के बारे में
- यह भारत का प्रमुख विधिक अधिनियम है, जो डिजिटल गतिविधियों एवं साइबर संचालन को विनियमित करता है।
- साइबर खतरों तथा प्रौद्योगिकीगत विकास के अनुरूप इसे वर्ष 2008 एवं वर्ष 2015 में संशोधित किया गया।
प्रमुख प्रावधान
- धारा 69A
- यह केंद्र सरकार को डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर उपलब्ध ऑनलाइन सामग्री को अवरुद्ध (ब्लॉक) करने की शक्ति प्रदान करती है, यदि ऐसा करना अनुच्छेद-19(2) में उल्लिखित हितों—जैसे भारत की संप्रभुता एवं अखंडता, राष्ट्रीय सुरक्षा, लोक व्यवस्था अथवा शिष्टाचार/नैतिकता की रक्षा के लिए आवश्यक हो।
- धारा 69A के अंतर्गत सुरक्षा उपाय
- ब्लॉकिंग आदेश केवल अनुच्छेद-19(2) में उल्लिखित आधारों तक ही सीमित होने चाहिए।
- सामग्री को अवरुद्ध करने के लिए सरकार को अपने कारण लिखित रूप में अभिलिखित करने होते हैं।
- धारा 79
- धारा 79 मध्यस्थों जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISPs) एवं ई-कॉमर्स संस्थाओं—को तृतीय पक्ष की सामग्री के संबंध में ‘सुरक्षित आश्रय (Safe Harbour)’ का संरक्षण प्रदान करती है, बशर्ते वे तटस्थ मंच के रूप में कार्य करें तथा यथोचित परिश्रम (Due Diligence) संबंधी प्रावधानों का पालन करें।
- धारा 79(3)(b): यह प्रावधान इस संरक्षण को सीमित करता है। यदि किसी न्यायालय के आदेश अथवा सरकारी अधिसूचना के माध्यम से वास्तविक जानकारी प्राप्त होने के पश्चात् भी मध्यस्थ अवैध सामग्री को शीघ्र नहीं हटाते हैं, तो वे सुरक्षित आश्रय के संरक्षण से वंचित हो जाते हैं।
- श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015): इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 79(3)(b) की व्याख्या को सीमित करते हुए स्पष्ट किया
- ‘वास्तविक जानकारी’ केवल वैध न्यायालयीय आदेश अथवा सरकार के आधिकारिक निर्देश के माध्यम से ही उत्पन्न होगी, मात्र उपयोगकर्ताओं की शिकायतों के आधार पर नहीं।
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OTT प्लेटफॉर्मों का विनियमन
OTT प्लेटफॉर्मों का विनियमन सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 तथा सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के अंतर्गत किया जाता है। सिनेमाघरों में प्रदर्शित फिल्मों के विपरीत, वर्तमान में इनका संचालन मुख्यतः स्व-नियमन (Self-Regulation) पर आधारित व्यवस्था के अंतर्गत होता है।
- वर्तमान व्यवस्था: OTT प्लेटफॉर्मों पर प्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शित की जाने वाली फिल्मों के लिए पूर्व CBFC प्रमाणन अनिवार्य नहीं है। इसके स्थान पर प्रकाशक (Publishers) स्वयं अपनी सामग्री का वर्गीकरण एवं विनियमन करने के लिए उत्तरदायी होते हैं।
- OTT प्लेटफॉर्मों के दायित्व: डिजिटल मीडिया आचार संहिता के अंतर्गत प्रकाशकों को सामग्री का आयु-आधारित वर्गीकरण करना होता है।
- सामग्री का आयु-आधारित श्रेणियों के अनुसार स्व-वर्गीकरण करना।
- उन्हें उपयुक्त सामग्री विवरण (Content Descriptors) एवं अभिभावकीय मार्गदर्शन (Parental Guidance) प्रदर्शित करना होता है।
- उन्हें निर्धारित आचार संहिता (Code of Ethics) का पालन करना होता है।
- उन्हें स्व-नियमन, स्व-नियामक निकायों तथा सरकारी पर्यवेक्षण पर आधारित त्रिस्तरीय शिकायत निवारण तंत्र का अनुपालन करना होता है।
संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद-19(1)(a): यह वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की गारंटी देता है, जिसमें कलात्मक, साहित्यिक, सिनेमाई एवं डिजिटल अभिव्यक्ति भी सम्मिलित है।
- अनुच्छेद-19(2): यह राज्य को निम्नलिखित आधारों पर इस अधिकार पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है
- भारत की संप्रभुता एवं अखंडता
- राज्य की सुरक्षा
- विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध
- लोक व्यवस्था
- शिष्टाचार या नैतिकता
- न्यायालय की अवमानना
- मानहानि
- अपराध हेतु उद्दीपन।
- अतः फिल्मों अथवा OTT सामग्री का कोई भी विनियमन अनुच्छेद-19(2) के अंतर्गत निर्धारित युक्तिसंगतता की कसौटी पर खरा उतरना आवश्यक है।
सर्वोच्च न्यायालय के महत्त्वपूर्ण निर्णय
- के. ए. अब्बास बनाम भारत संघ (1970): उच्चतम न्यायालय ने फिल्मों के पूर्व-सेंसरशिप (Pre-Censorship) की संवैधानिक वैधता को स्वीकार करते हुए कहा कि सिनेमा का भावनात्मक एवं श्रव्य-दृश्य प्रभाव अन्य अभिव्यक्ति माध्यमों की तुलना में अधिक होता है, इसलिए उसका पूर्व परीक्षण आवश्यक हो सकता है।
- प्रतिपादित सिद्धांत: न्यायालय ने कहा कि फिल्म प्रमाणन तभी संवैधानिक रूप से वैध होगा, जब लगाए गए प्रतिबंध युक्तिसंगत, मनमाने न हों तथा अनुच्छेद-19(2) में उल्लिखित आधारों के अंतर्गत आते हों।
- महत्त्व: यह निर्णय CBFC की पूर्व-प्रमाणन व्यवस्था का संवैधानिक आधार प्रदान करता है।
- एस. रंगराजन बनाम पी. जगजीवन राम (1989): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि केवल इस कारण कि समाज का कोई वर्ग किसी सामग्री से असहमत है अथवा विरोध-प्रदर्शन की धमकी देता है, वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाया नहीं जा सकता है।
- प्रतिपादित सिद्धांत: प्रतिबंध तभी उचित माने जाएँगे, जब अभिव्यक्ति और लोक व्यवस्था के लिए उत्पन्न खतरे के बीच स्पष्ट, प्रत्यक्ष एवं निकट संबंध हो। केवल लोक व्यवस्था भंग होने की आशंका प्रतिबंध लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
- महत्त्व: इस निर्णय ने स्पष्ट किया कि फिल्मों पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों को आवश्यकता एवं आनुपातिकता की संवैधानिक कसौटी पर खरा उतरना होगा।
चुनौतियाँ जिनका समाधान आवश्यक है:
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संबंधी चिंताएँ: अनिवार्य पूर्व-प्रमाणन (Pre-certification) से डिजिटल सामग्री पर राज्य का नियमन बढ़ सकता है, जिससे रचनात्मक स्वतंत्रता, कलात्मक स्वायत्तता तथा अनुच्छेद-19(1)(a) के दायरे को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- अनुपालन संबंधी बढ़ता बोझ: अतिरिक्त प्रमाणन आवश्यकताओं से विशेषकर स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं एवं छोटे प्रोडक्शन हाउसों के लिए लागत, प्रक्रियागत विलंब तथा प्रशासनिक बोझ बढ़ सकता है।
- संस्थागत अधिकार-क्षेत्र का अतिव्यापन: यह प्रस्ताव CBFC, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के मध्य अधिकार-क्षेत्र के अतिव्यापन की स्थिति उत्पन्न कर सकता है, जिससे नियामकीय अनिश्चितता तथा कार्यों का दोहराव बढ़ सकता है।
- वैश्विक डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र में क्रियान्वयन: चूँकि OTT प्लेटफॉर्म एक ही समय में अनेक देशों में सामग्री जारी करते हैं, इसलिए देश-विशिष्ट प्रमाणन व्यवस्था को लागू करना महत्त्वपूर्ण परिचालनात्मक एवं विधिक चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकता है।
आगे की राह
- संतुलित नियामकीय ढाँचा अपनाया जाए: प्रस्तावित व्यवस्था में राष्ट्रीय सुरक्षा, लोक व्यवस्था तथा वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी के बीच उपयुक्त संतुलन स्थापित किया जाना चाहिए।
- पारदर्शी एवं समयबद्ध प्रमाणन सुनिश्चित किया जाए: प्रमाणन प्रक्रिया को वस्तुनिष्ठ, पारदर्शी, पूर्वानुमेय तथा समयबद्ध बनाया जाना चाहिए तथा मनमानेपन को न्यूनतम करने के लिए स्पष्ट वैधानिक मानक निर्धारित किए जाने चाहिए।
- आयु-आधारित वर्गीकरण को सुदृढ़ किया जाए: अत्यधिक सेंसरशिप अथवा सामग्री संशोधन के स्थान पर आयु-आधारित वर्गीकरण, अभिभावकीय नियंत्रण तथा सामग्री विवरण (Content Descriptors) पर अधिक बल दिया जाना चाहिए।
- सह-विनियमन (Co-regulation) को बढ़ावा दिया जाए: उद्योग-आधारित स्व-नियमन तथा वैधानिक पर्यवेक्षण के संयोजन पर आधारित सह-विनियामक मॉडल तीव्र गति से विकसित हो रहे डिजिटल मीडिया पारिस्थितिकी तंत्र में उत्तरदायित्व सुनिश्चित करते हुए अधिक लचीलापन प्रदान कर सकता है।
निष्कर्ष
प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य OTT प्लेटफॉर्मों के तीव्र विस्तार के अनुरूप भारत की फिल्म प्रमाणन व्यवस्था का आधुनिकीकरण करना है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ऐसा संतुलित नियामकीय ढाँचा विकसित किया जाए, जो राष्ट्रीय सुरक्षा एवं लोकहित की रक्षा करते हुए वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा रचनात्मक स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी को भी अक्षुण्ण बनाए रखे।