संदर्भ
हाल ही में, केरल ने मुल्लापेरियार बांध के निरीक्षण हेतु गठित समग्र बांध सुरक्षा मूल्यांकन समिति (CDSEC) से अपने नामित सदस्य को हटाए जाने पर आपत्ति जताई है।
संबंधित तथ्य
- राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण (NDSA) ने बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद पाँच सदस्यीय CDSEC का गठन किया।
- केरल के नामित सदस्य को बिना पूर्व परामर्श के समिति से हटा दिया गया।
- केरल ने पुनर्स्थापन की माँग करते हुए कहा कि बांध सुरक्षा के लिए केरल और तमिलनाडु के बीच सहयोग आवश्यक है।
मुल्लापेरियार बांध के बारे में
- अवस्थिति: मुल्लापेरियार बाँध केरल-तमिलनाडु सीमा पर पश्चिमी घाट की कार्डमम पहाड़ियों (Cardamom Hills) में, इडुक्की जिले के कुमिली के पास अवस्थित है।
- बांध केरल में स्थित है, लेकिन इसका संचालन तमिलनाडु द्वारा किया जाता है।

- निर्माण: इसका निर्माण 1895 में चूना पत्थर और सुरखी का उपयोग करके किया गया था। यह पेरियार नदी (केरल) के जल को तमिलनाडु के वैगई बेसिन की ओर मोड़ता है, ताकि सिंचाई और पेयजल की आवश्यकताएँ पूरी की जा सकें।
- जल सुरक्षा में महत्त्व: यह बांध दक्षिणी तमिलनाडु को कृषि और पेयजल उपलब्ध कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- अंतर-राज्यीय विवाद: यह केरल और तमिलनाडु के बीच लंबे समय से विवाद का विषय रहा है, विशेषकर बांध की सुरक्षा और संचालन नियंत्रण के मुद्दों पर।
- विवाद: तमिलनाडु बांध की सुरक्षा और जल आपूर्ति में इसके महत्त्व पर बल देता है।
- केरल इसके टूटने के संभावित जोखिमों को उजागर करता है, विशेषकर हाल की जलवायु-प्रेरित आपदाओं जैसे भूस्खलन को देखते हुए।
- यह एक भूकंपीय रूप से सक्रिय क्षेत्र में स्थित है, जिससे विशेषकर भारी वर्षा के दौरान इसकी सुरक्षा को लेकर चिंताएँ बढ़ती हैं।
- यह क्षेत्र भूकंपीय रूप से सक्रिय क्षेत्र में स्थित है, जिससे विशेषकर अत्यधिक वर्षा के दौरान इसकी सुरक्षा को लेकर चिंताएँ और बढ़ जाती हैं।
- मुल्लापेरियार अंतर-राज्यीय जल विवाद: तमिलनाडु वर्ष 2014 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार, जलस्तर को 142 फीट तक बढ़ाने की माँग करता है, जबकि केरल बांध की संभावित क्षति और पर्यावरणीय चिंताओं के कारण इसे 139 फीट पर बनाए रखने पर जोर देता है। केरल ने लीज समझौते की निष्पक्षता पर भी आपत्ति जताई है।
मुल्लापेरियार बांध मुद्दा क्यों महत्त्वपूर्ण है?
- बांध सुरक्षा चिंताएँ: पुराना मुल्लापेरियार बांध संरचनात्मक मजबूती, भूकंपीय संवेदनशीलता, बाढ़ सहनशीलता और निचले स्थानों पर रहने वाली आबादी की सुरक्षा को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करता है।
- संघवाद और अंतर-राज्यीय संबंध: यह विवाद अंतर-राज्यीय नदी संसाधनों के प्रबंधन, हित संतुलन और प्रभावी केंद्र–राज्य समन्वय की चुनौतियों को उजागर करता है।
- आपदा जोखिम प्रबंधन: किसी भी बांध विफलता से बड़े पैमाने पर मानव हानि, पारिस्थितिक क्षति और अवसंरचना नुकसान हो सकता है, जो जोखिम-आधारित सुरक्षा दृष्टिकोण की आवश्यकता को दर्शाता है।
- जल और आजीविका सुरक्षा: यह बांध दक्षिणी तमिलनाडु में सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और कृषि आजीविका के लिए महत्त्वपूर्ण बना हुआ है।
- जलवायु परिवर्तन संबंधी चुनौती: अत्यधिक वर्षा की बढ़ती घटनाएँ और अनिश्चित मौसम पैटर्न बांध संचालन और आपातकालीन तैयारी को लेकर चिंताओं को बढ़ाते हैं।
कानूनी एवं संस्थागत ढाँचा
- बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021: बांध निगरानी, निरीक्षण, संचालन, रखरखाव और बांध-संबंधित आपदाओं की रोकथाम के लिए एक व्यापक ढाँचा स्थापित करता है।
- राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण (NDSA): तकनीकी निगरानी प्रदान करता है, विशिष्ट बांध-सुरक्षा मुद्दों का समाधान करता है और राष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के क्रियान्वयन को सुनिश्चित करता है।
- राष्ट्रीय बांध सुरक्षा समिति: प्रभावी बांध सुरक्षा शासन के लिए नीतियाँ, नियम और तकनीकी दिशानिर्देश तैयार करती है।
- राज्य बांध सुरक्षा संगठन (SDSOs): राज्यों के भीतर बांधों की नियमित जाँच, निगरानी, सुरक्षा मूल्यांकन और रखरखाव के लिए जिम्मेदार होते हैं।
- आपातकालीन कार्य योजना (EAPs): आपात स्थितियों के दौरान पूर्व चेतावनी, निकासी और आपदा प्रतिक्रिया को सुगम बनाने के लिए अनिवार्य की गई हैं।
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भारत में बांध सुरक्षा की प्रमुख चुनौतियाँ
- पुरानी अवसंरचना: बड़ी संख्या में बांध अपनी निर्धारित डिजाइन आयु पार कर चुके हैं और उन्हें पुनर्वास, सुदृढ़ीकरण और आधुनिकीकरण की आवश्यकता है।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभाव: अत्यधिक वर्षा, क्लाउडबर्स्ट और बाढ़ की बढ़ती घटनाएँ बांध अवसंरचना पर दबाव बढ़ाती हैं।
- अंतर-राज्यीय समन्वय की समस्याएँ: क्षेत्राधिकार विवाद और जोखिम की भिन्न धारणाएँ अक्सर समय पर निर्णय लेने में देरी करती हैं।
- अपर्याप्त निगरानी प्रणाली: कई बांधों में अभी भी रियल-टाइम उपकरण, स्वचालित निगरानी और उन्नत जोखिम आकलन उपकरणों की कमी है।
- अवसादन और घटती क्षमता: जलाशयों में गाद जमाव (सिल्टेशन) से भंडारण क्षमता घटती है और बाढ़ नियंत्रण क्षमता प्रभावित होती है।
- आपातकालीन तैयारी में कमी: सीमित जन जागरूकता, चेतावनी प्रणाली और निकासी योजना डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों की संवेदनशीलता बढ़ाती है।
आगे की राह
- प्रौद्योगिकी-आधारित निगरानी: रिमोट सेंसिंग, IoT आधारित सेंसर, AI-सहायता प्राप्त विश्लेषण और रियल-टाइम निगरानी प्रणाली का उपयोग कर निरंतर सुरक्षा मूल्यांकन किया जाए।
- सहकारी संघवाद को सुदृढ़ करना: वैज्ञानिक आकलन, संस्थागत संवाद और सर्वसम्मति आधारित निर्णय के माध्यम से विवादों का समाधान किया जाए।
- नियमित सुरक्षा ऑडिट: संरचनात्मक स्वास्थ्य मूल्यांकन, भूकंपीय आकलन और स्वतंत्र सुरक्षा समीक्षा नियमित रूप से की जाए।
- आपदा तैयारी को मजबूत करना: बाढ़ पूर्वानुमान, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और निकासी प्रोटोकॉल को निचले क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के लिए सुदृढ़ किया जाए।
- बांध पुनर्वास और आधुनिकीकरण: राष्ट्रीय कार्यक्रमों के तहत पुराने बांधों की मरम्मत, रेट्रोफिटिंग और क्षमता वृद्धि को प्राथमिकता दी जाए।
- समेकित नदी बेसिन प्रबंधन: जल सुरक्षा, बांध सुरक्षा, पारिस्थितिक स्थिरता और आपदा सहनशीलता को एकीकृत करते हुए बेसिन-स्तरीय दृष्टिकोण अपनाया जाए।
निष्कर्ष
मुल्लापेरियार मुद्दा केवल बांध सुरक्षा विवाद से आगे बढ़कर जल सुरक्षा, आपदा सहनशीलता और सहकारी संघवाद के संगम का प्रतिनिधित्व करता है। एक संतुलित दृष्टिकोण, जो वैज्ञानिक आकलन, मजबूत सुरक्षा मानकों और अंतर-राज्यीय सहयोग पर आधारित हो, जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ भविष्य की पीढ़ियों के लिए सतत जल प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।