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इंडियन आर्मी यूनिफॉर्म कोड 2026: स्वदेशीकरण और औपनिवेशिक विरासत का उन्मूलन

22 Jun 2026

संदर्भ

इंडियन आर्मी यूनिफॉर्म-2026 पुस्तिका में सैन्य परंपराओं को भारत की सार्वभौमिक पहचान, राष्ट्रीय भावना और स्वदेशी मूल्यों के अनुरूप बनाने हेतु वेशभूषा नियमों में परिवर्तन प्रस्तुत किए गए हैं।

संबंधित तथ्य

  • इन सुधारों का उद्देश्य औपनिवेशिक काल के शेष प्रतीकों को हटाना है, जबकि भारतीय सेना की गरिमा, अनुशासन और परंपराओं को बनाए रखना है।

सैन्य उपनिवेशमुक्ति के बारे में

  • सैन्य उपनिवेशमुक्ति उस प्रक्रिया को संदर्भित करती है, जिसमें रक्षा संस्थानों को अनावश्यक औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त कर उनके प्रतीकों, प्रथाओं और परंपराओं को एक स्वतंत्र राष्ट्र की पहचान के अनुरूप बनाया जाता है।

मुख्य आयाम

  • औपनिवेशिक प्रतीकों और प्रथाओं का हटाना
    • इसमें ब्रिटिश काल के नामों, प्रतीकों, शब्दावली और परंपराओं को बदलना शामिल है, जो औपनिवेशिक सत्ता का प्रतिनिधित्व करते थे।
      • उदाहरण: सैन्य उपयोग से रॉयल’ जैसे औपनिवेशिक शब्दों को हटाना।
  • स्वदेशी पहचान को बढ़ावा
    • यह भारत के इतिहास, संस्कृति, सैन्य उपलब्धियों और राष्ट्रीय मूल्यों को प्रतिबिंबित करने पर केंद्रित है।
    • इसमें भारतीय सैनिकों, कमांडरों और स्वदेशी परंपराओं को अधिक मान्यता दी जाती है।
  • सैन्य पेशेवरिता का संरक्षण
    • उपनिवेशमुक्ति का अर्थ सभी विरासत में मिली प्रथाओं को त्यागना नहीं है।
    • जो परंपराएँ अनुशासन, साहस और संचालनात्मक दक्षता को बढ़ावा देती हैं, उन्हें बनाए रखा जाता है।
  • चयनात्मक सुधार दृष्टिकोण: उद्देश्य निम्न के बीच अंतर करना है-
    • औपनिवेशिक प्रतीक, जो विदेशी शासन का प्रतिनिधित्व करते हैं।
    • सैन्य परंपराएँ, जो पेशेवरिता और संस्थागत निरंतरता में योगदान देती हैं।
  • सार्वभौमिक सैन्य पहचान का निर्माण: इसका लक्ष्य एक ऐसी रक्षा व्यवस्था का निर्माण करना है, जो आधुनिक, स्वतंत्र भारत की आकांक्षाओं को दर्शाते हुए सैन्य विरासत और प्रभावशीलता को बनाए रखे।

प्रमुख परिवर्तन

  • स्वदेशी बंदी जैकेट का परिचय:
    • सेना ने अधिकारियों के लिए औपचारिक नागरिक वेशभूषा में बंदी जैकेट (बंद-गले का कोट) को शामिल किया है।
    • इसे फुल-स्लीव शर्ट, मेल खाते औपचारिक पतलून और बंद सामान्य जूतों के साथ पहना जाएगा।
    • यह निर्धारित अवसरों पर पश्चिमी शैली के औपचारिक कोट का स्थान लेगा।
  • सैन्य शब्दावली से  उपनिवेशमुक्ति
    • रॉयल’ जैसे औपनिवेशिक शब्दों को हटाना, सेना के स्वदेशी और संप्रभु पहचान की ओर बदलाव को दर्शाता है।
  • औपचारिक यूनिफॉर्म का सरलीकरण
    • मैस ड्रेस नंबर 5 और 6 से पाउच बेल्ट हटाने का उद्देश्य पारंपरिक सैन्य वेशभूषा को आधुनिक और सरल बनाना है।
  • तलवार धारण नियमों में परिवर्तन
    • पूर्व प्रथा: सैन्य परेड के दौरान निरीक्षण अधिकारी (Reviewing Officer) पारंपरिक रूप से तलवार धारण करते थे।
    • नया नियम: अब तलवार धारण केवल निम्न तक सीमित रहेगा-
      • परेड कमांडर
      • कॉन्टिन्जेंट कमांडर
      • मुख्य औपचारिक कार्यक्रमों में नामित कर्मी
  • नई शीतकालीन कार्य यूनिफॉर्म की शुरुआत: सेना ने बैटल जैकेट को नई शीतकालीन कार्य यूनिफॉर्म के रूप में प्रस्तुत किया है।
    • यह मौजूदा जर्सी-आधारित शीतकालीन यूनिफॉर्म (Dress 3A) का स्थान लेगा।
    • इसके लिए जून 2029 तक का संक्रमण काल निर्धारित किया गया है।
  • यूनिफॉर्म अनुशासन दिशानिर्देश
    • व्यक्तिगत स्वरूप मानक: नई पुस्तिका में निम्नलिखित पर कड़े नियम लागू किए गए हैं:-
      • हेयरस्टाइल: अत्यधिक या असामान्य हेयरस्टाइल की अनुमति नहीं।
      • दाढ़ी: बिना अनुमति दाढ़ी की अनुमति नहीं।
      • इलेक्ट्रॉनिक उपकरण: यूनिफॉर्म में रहते हुए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का प्रयोग निषिद्ध।
      • शारीरिक संशोधन: बिना अनुमति टैटू या बॉडी पियर्सिंग निषिद्ध।
      • मेकअप: यूनिफॉर्म में कॉस्मेटिक मेकअप की अनुमति नहीं।
  • यूनिफॉर्म पहनने पर प्रतिबंध: यूनिफॉर्म पहनना निम्न स्थानों/अवसरों पर प्रतिबंधित है—
    • राजनीतिक सभाएँ
    • धार्मिक कार्यक्रम
    • प्रदर्शन/आंदोलन
    • शादियाँ
    • निजी पार्टियाँ
    • बिना अनुमति भुगतान वाले मीडिया कार्यक्रम

चुनौतियाँ

  • परंपरा और आधुनिकीकरण के बीच संतुलन
    • सैन्य परंपराएँ ऐतिहासिक महत्त्व रखती हैं और रेजिमेंटल पहचान तथा एकजुटता को मजबूत करती हैं।
    • अत्यधिक परिवर्तन पारंपरिक निरंतरता को प्रभावित कर सकते हैं।
  • सैन्य विरासत का संरक्षण
    • औपनिवेशिक काल की प्रथाएँ सेना के संस्थागत इतिहास का हिस्सा हैं।
    • सुधारों में औपनिवेशिक प्रतीकों और मूल्यवान सैन्य परंपराओं के बीच अंतर करना आवश्यक है।
  • क्रियान्वयन से जुड़ी चुनौतियाँ: एक विशाल सेना में यूनिफॉर्म परिवर्तन लागू करने के लिए आवश्यक है:-
    • प्रशिक्षण
    • आपूर्ति शृंखला प्रबंधन
    • चरणबद्ध संक्रमण
  • एकरूपता और अनुशासन बनाए रखना: वेशभूषा नियमों में परिवर्तन के दौरान सभी रैंकों और इकाइयों में समानता और अनुशासन सुनिश्चित करना आवश्यक है।
  • केवल प्रतीकात्मक सुधारों से बचाव: स्वदेशीकरण केवल नामों और वर्दियों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें:-
    • प्रौद्योगिकी
    • संचालनात्मक क्षमता
    • संगठनात्मक सुधारों पर भी ध्यान देना चाहिए।

सैन्य उपनिवेशमुक्ति क्यों महत्त्वपूर्ण है?

  • राष्ट्रीय पहचान को सुदृढ़ करना: भारत के इतिहास, संस्कृति और मूल्यों को प्रतिबिंबित करने वाली सैन्य संस्थाएँ राष्ट्रीय गर्व और स्वामित्व की भावना को मजबूत करती हैं।
  • प्रतीकात्मक संप्रभुता: औपनिवेशिक प्रतीकों को हटाना, औपनिवेशिक विरासत से हटकर स्वतंत्र राष्ट्रीय पहचान की ओर भारत के परिवर्तन को दर्शाता है।
  • भारतीय नायकों की पहचान: सैन्य स्थलों का नाम सैनिकों के नाम पर रखना उनके बलिदान का सम्मान करता है और उनके योगदान को सार्वजनिक स्मृति में जीवित रखता है।
  • स्वदेशी सैन्य संस्कृति को बढ़ावा: यह भारत की अपनी विरासत और मूलभाव पर आधारित सैन्य परंपराओं, प्रतीकों और प्रथाओं को प्रोत्साहित करता है।
  • ऐतिहासिक असंतुलन का सुधार: औपनिवेशिक काल के नामों को बदलकर भारतीय नेताओं, सैनिकों और राष्ट्रीय योगदानों को अधिक मान्यता दी जाती है।
  • नागरिक-सैन्य संबंध को सुदृढ़ करना: भारतीय प्रतीक और नाम सैन्य संस्थानों को नागरिकों के लिए अधिक संबद्ध और भावनात्मक रूप से निकट बनाते हैं।
  • सैन्य मनोबल को बढ़ाना: राष्ट्रीय मूल्यों पर आधारित रक्षा पहचान सशस्त्र बलों में गर्व, आत्मविश्वास और अपनत्व की भावना को बढ़ाती है।
  • आधुनिकीकरण को समर्थन: उपनिवेशमुक्ति, स्वदेशीकरण, मानकीकरण और आधुनिक सैन्य दृष्टिकोण को बढ़ावा देकर व्यापक सुधारों का पूरक बनती है।

देश औपनिवेशिक विरासत / पृष्ठभूमि उपनिवेशवाद-उन्मूलन दृष्टिकोण
भारत स्वतंत्रता के बाद ब्रिटिश काल के कई सैन्य प्रतीक, शब्दावली, नाम और औपचारिक परंपराएँ विरासत में मिलीं। सैन्य पेशेवरिता को बनाए रखते हुए औपनिवेशिक संदर्भों को भारतीय नायकों, परंपराओं, स्वदेशी प्रतीकों और राष्ट्रीय ethos से प्रतिस्थापित करना।
घाना औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता के बाद ब्रिटिश सैन्य संरचनाएँ विरासत में मिलीं। पेशेवर संगठनात्मक ढाँचे को बनाए रखते हुए घानाई पहचान को दर्शाने वाले राष्ट्रीय सैन्य प्रतीक और परंपराएँ विकसित करना।
इंडोनेशिया डच औपनिवेशिक काल से सैन्य प्रभाव स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रीय मूल्यों और स्वदेशी परंपराओं के आधार पर सशस्त्र बलों की पहचान विकसित करना।
अफ्रीकी देश (सामान्य) कई देशों ने औपनिवेशिक झंडे, प्रतीक, रैंक और औपचारिक परंपराएँ विरासत में प्राप्त कीं। सैन्य प्रतीकों और परंपराओं में संशोधन कर उन्हें उपनिवेशोत्तर संप्रभुता और सांस्कृतिक पहचान के अनुरूप बनाना।
एशियाई उपनिवेशोत्तर देश (सामान्य) औपनिवेशिक शक्तियों का सैन्य प्रशासन, प्रशिक्षण और परंपराओं पर प्रभाव उपयोगी पेशेवर प्रथाओं को बनाए रखते हुए विरासत में मिले तंत्र को राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूलित करना।

आगे की राह

  • परंपरा और सुधार के बीच संतुलित दृष्टिकोण: सैन्य सुधारों में मूल्यवान परंपराओं को संरक्षित रखते हुए केवल उन औपनिवेशिक प्रतीकों को हटाया जाना चाहिए जो भारत की राष्ट्रीय पहचान के अनुरूप नहीं हैं।
  • क्रमिक और चरणबद्ध क्रियान्वयन: यूनिफॉर्म और ड्रेस सुधारों को उचित प्रशिक्षण, आपूर्ति प्रबंधन और संक्रमण अवधि के माध्यम से लागू किया जाना चाहिए, ताकि किसी प्रकार का व्यवधान न हो।
  • प्रतीकात्मक उपनिवेशमुक्ति से आगे बढ़ना: स्वदेशीकरण केवल यूनिफॉर्म और नामों तक सीमित न रहकर रक्षा प्रौद्योगिकी, सिद्धांत, प्रशिक्षण प्रणाली और संगठनात्मक सुधारों तक विस्तारित होना चाहिए।
  • सैन्य विरासत का संरक्षण: वे ऐतिहासिक प्रथाएँ जो अनुशासन, साहस और रेजिमेंट संबंधी गर्व को दर्शाती हैं, उन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए, साथ ही उन्हें औपनिवेशिक प्रभावों से अलग किया जाना चाहिए।
  • स्वदेशी सैन्य संस्कृति को सुदृढ़ करना: भारतीय सैन्य इतिहास, नायकों, परंपराओं और मूल्यों पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि एक मजबूत राष्ट्रीय रक्षा पहचान विकसित हो सके।
  • एकरूपता और अनुशासन बनाए रखना: स्पष्ट दिशानिर्देश और नियमित निगरानी यह सुनिश्चित करें कि सुधार पेशेवरिता को बढ़ाएँ और सभी रैंकों में मानकों को बनाए रखें
  • आधुनिक सैन्य दृष्टिकोण को बढ़ावा: यूनिफॉर्म संबंधीसुधारों को व्यापक आधुनिकीकरण प्रयासों के साथ जोड़ा जाना चाहिए, जिसमें प्रौद्योगिकी अपनाना, संचालनात्मक तत्परता और भविष्य-उन्मुख रक्षा सुधार शामिल हैं।
  • नागरिक-सैन्य संबंध को सुदृढ़ करना: भारतीय प्रतीकों, नामों और परंपराओं को बढ़ावा देकर रक्षा संस्थानों को नागरिकों और राष्ट्रीय आकांक्षाओं से अधिक जुड़ा हुआ बनाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

आर्मी यूनिफॉर्म कोड 2026 आधुनिकीकरण और सैन्य विरासत के संरक्षण के बीच संतुलन को दर्शाता है, साथ ही भारत के रक्षा संस्थानों को राष्ट्रीय मूलभाव, सांस्कृतिक पहचान और उत्तर-औपनिवेशिक मूल्यों के अनुरूप बनाता है।

इंडियन आर्मी यूनिफॉर्म कोड 2026: स्वदेशीकरण और औपनिवेशिक विरासत का उन्मूलन

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