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नेशनल टास्क फोर्स (NTF) ऑन स्टूडेंट मेंटल हेल्थ एंड सुसाइड्स

15 Jun 2026

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त नेशनल टास्क फोर्स (NTF) ने छात्र मानसिक स्वास्थ्य पर अपनी अंतरिम रिपोर्ट जारी की है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यापक अध्ययन इस कारण आदेशित किया था क्योंकि भारत में पिछले एक दशक में छात्र आत्महत्याओं में तीव्र वृद्धि होकर यह संख्या दोगुनी हो गई है।

नेशनल टास्क फोर्स (NTF) के प्रमुख निष्कर्ष

टास्क फोर्स ने सामान्य मनोविज्ञान से आगे बढ़कर भारत की शैक्षणिक व्यवस्था में विद्यमान संरचनात्मक  विफलताओं को उजागर किया है:

  • व्यक्तिगत बीमारी नहीं, संरचनात्मक संकट: NTF का मुख्य तर्क है कि छात्र आत्महत्याओं को गलत रूप से केवल व्यक्तिगत मानसिक स्वास्थ्य समस्या माना गया है। वास्तविकता में ये संस्थागत और संरचनात्मक विफलताओं के कारण घटित होती हैं, जिन्हें केवल दिशा-निर्देशों से निस्तारित नहीं किया जा सकता है।
  • नियामकीय एवं कानूनी शून्यता: भारत में उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्र आत्महत्याओं की रोकथाम हेतु कोई प्रत्यक्ष वैधानिक या बाध्यकारी ढाँचा नहीं है।
    • राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति केवल एक नीतिगत दस्तावेज है, जिसमें स्पष्ट कार्यान्वयन दिशानिर्देश नहीं हैं।
  • जाति आधारित प्रोफाइलिंग और अदृश्य भेदभाव: कैंपस संस्कृति में प्रवेश रैंक (JEE/NEET स्कोर) को जातिगत पहचान से जोड़कर देखा जाता है।
    • अनौपचारिक “वातावरण आकलन” के माध्यम से शहरी अभिजात्य व्यवहार और अंग्रेजी दक्षता को प्राथमिकता दी जाती है। छोटे शहरों के छात्रों को अपमानजनक शब्दों से मजाक उड़ाया जाता है।
  • छात्रवृत्ति के माध्यम से वित्तीय शोषण: राज्य विश्वविद्यालयों में सरकारी छात्रवृत्ति भुगतान में देरी सामान्य है।
    • इसका बोझ अक्सर छात्रों पर डाल दिया जाता है, जिससे उन्हें परीक्षाओं से वंचित किया जाता है, हॉस्टल से निकाला जाता है और डिग्री रोक दी जाती है।
  • कठोर शैक्षणिक व्यवस्था: मेडिकल विद्यार्थियों को भोजन और पर्याप्त नींद के बिना लगातार 36 से 48 घंटे तक की अत्यंत कठिन ड्यूटी करनी पड़ती है।
    • विश्राम की माँग करने वाले छात्रों को अक्सर सार्वजनिक रूप से “कमजोर” या “आलसी” कहकर अपमानित किया जाता है। इसी प्रकार, कुछ नर्सिंग कॉलेज अत्यधिक प्रतिबंधात्मक नियम लागू करते हैं, जैसे प्रतिदिन मोबाइल फोन जब्त कर लेना, जिससे छात्र अपने परिवारों से अलगाव महसूस करते हैं।
  • परामर्श प्रणाली की वास्तविकता बनाम भ्रम: UGC के अनुसार, काउंसलर-छात्र अनुपात संतोषजनक दिखाया गया है, लेकिन NTF ऑडिट में पाया गया कि 50 में से 47 काउंसलर वास्तव में अप्रशिक्षित फैकल्टी या प्लेसमेंट स्टाफ हैं।
    • 70% से अधिक कॉलेजों में पूर्णकालिक मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर मौजूद नहीं हैं।

भारत में छात्र मानसिक स्वास्थ्य एवं आत्महत्याओं पर डेटा

रिपोर्ट तेजी से बढ़ते छात्र नामांकन और स्थिर संस्थागत बजट के बीच एक स्पष्ट अंतर को उजागर करती है:-

  • आत्महत्याओं में वृद्धि: एक दशक में छात्र आत्महत्याएँ दोगुनी हो गईं, और वर्ष 2022 में रिकॉर्ड 13,000 मामले दर्ज हुए। यह संख्या उसी वर्ष किसानों की आत्महत्याओं से अधिक थी और देश में कुल आत्महत्या के कारण हुईं मृत्यु का 7.6% थी।
  • आत्महत्या प्रवृत्ति का दायरा: भारत में प्रत्येक छात्र आत्महत्या मृत्यु के लिए 200 से अधिक छात्र आत्महत्या विचारों (आत्म-क्षति के विचार, गंभीर अवसाद) का अनुभव करते हैं। साथ ही 15 से अधिक वास्तविक आत्महत्या प्रयास होते हैं।
  • नामांकन–वित्तपोषण अंतराल: उच्च शिक्षा नामांकन वर्ष 2001–02 में 88 लाख से बढ़कर 2021–22 में 4.33 करोड़ हो गया, और सकल नामांकन अनुपात (GER) 28.4% तक पहुँचा।
    • लेकिन उच्च शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय लगभग GDP का 1.3% ही है, जो अनुशंसित 2% से कम है, जिससे बुनियादी ढाँचे, शिक्षकों, शोध और छात्र सेवाओं पर दबाव बढ़ता है।
  • उच्च जोखिम ड्रॉपआउट: वर्ष 2018 से 2023 के बीच केंद्रीय विश्वविद्यालयों, IITs और IIMs से 13,600 से अधिक SC, ST और OBC छात्रों ने पढ़ाई छोड़ी।
    • वर्ष 2025 के एक अध्ययन के अनुसार, IIT दिल्ली और खड़गपुर में SC/ST छात्रों का ड्रॉपआउट सामान्य वर्ग की तुलना में 318% अधिक है, जिसमें 47.6% मामले वित्तीय संकट से जुड़े थे।
  • संस्थागत निस्तब्धता: NTF ने पाया कि 60,000 से अधिक उच्च शिक्षा संस्थानों में से केवल 3.5% ने ही न्यायालय-निर्देशित सर्वेक्षण का उत्तर दिया, जो संस्थागत जवाबदेही की गंभीर कमी को दर्शाता है।

नेशनल टास्क फोर्स (NTF) की सिफारिशें

अंतरिम सिफारिशें त्वरित एवं अनिवार्य कदमों के रूप में तैयार की गई हैं, ताकि अंतिम रिपोर्ट से पूर्व राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक कानून बनने तक शैक्षणिक तंत्र को स्थिर किया जा सके:

  • फैकल्टी रिक्तियों को तुरंत भरना: सभी रिक्त शिक्षण पद, विशेषकर लंबे समय से लंबित आरक्षित श्रेणी के पद, 3 महीने की सख्त समय-सीमा में भरे जाएँ। कुलपति जैसे प्रमुख प्रशासनिक पद 1 महीने के भीतर भरे जाएँ।
  • अनिवार्य घटना रिपोर्टिंग: सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को छात्र आत्महत्या की प्रत्येक घटना की रिपोर्ट राष्ट्रीय नियामकों और राज्य नोडल अधिकारियों को देनी अनिवार्य होगी, चाहे घटना कैंपस के भीतर हो या बाहर।
  • 24×7 पेशेवर चिकित्सा सुविधा: प्रत्येक आवासीय परिसर में 24 घंटे योग्य चिकित्सा कर्मियों और प्रमाणित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
  • सूक्ष्म सांख्यिकी प्रणाली: NCRB को अपनी डेटा प्रणाली में सुधार कर स्कूल शिक्षा और उच्च शिक्षा के आत्महत्या आँकड़ों को अलग-अलग प्रकाशित करना होगा।
  • सख्त गोपनीयता सुनिश्चित करना: कैंपस काउंसलिंग केंद्र विश्वविद्यालय प्रशासन से पूर्णतः स्वतंत्र हों। उच्च जोखिम मामलों में स्वचालित रूप से फैकल्टी या अभिभावकों को सूचित करने की प्रथा समाप्त की जाए, क्योंकि यह विशेषकर कमजोर और LGBTQ+ छात्रों को सहायता लेने से रोकती है।
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