संदर्भ
नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन “ब्रिजिंग द बेंच गैप: वीमेन एंड ज्यूडिशियल लीडरशिप” को संबोधित करते हुए, भारत के मुख्य न्यायाधीश ने न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में सुधार की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
संबंधित तथ्य
यह कार्यक्रम भारतीय महिला विधि संगठन द्वारा भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सभागार में आयोजित किया गया।
वर्तमान आँकड़े
भारतीय न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व को अक्सर “फनल प्रभाव” के रूप में वर्णित किया जाता है, जहाँ प्रवेश स्तर पर संख्या अपेक्षाकृत मजबूत होती है, लेकिन नेतृत्व के उच्चतम स्तरों पर यह काफी कम हो जाती है।
- सर्वोच्च न्यायालय की स्थिति: वर्ष 2026 की शुरुआत तक, सर्वोच्च न्यायालय की पीठ में महिलाओं का हिस्सा केवल एक छोटा भाग है।
- ऐतिहासिक रूप से, केवल 11 महिलाएँ (लगभग 4%) ही सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में सेवा कर चुकी हैं।
- विशेष रूप से, वर्ष 2021 में तीन महिलाओं की एक साथ ऐतिहासिक नियुक्ति के बाद से किसी नई महिला न्यायाधीश को सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत नहीं किया गया है, जिससे समान अवसर को लेकर चिंताएँ बढ़ी हैं।
- उच्च न्यायालय में प्रतिनिधित्व: उच्च न्यायालयों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 15% है।
- जहाँ पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय जैसे कुछ न्यायालयों में लगभग 30% महिलाएँ हैं, वहीं मणिपुर, त्रिपुरा और उत्तराखंड जैसे न्यायालयों में वर्तमान में कोई महिला न्यायाधीश नहीं है।
- निम्न/जिला न्यायपालिका: यह स्तर सबसे अधिक आशाजनक दिखाई देता है, जहाँ महिलाएँ कार्यबल का 35% से 37% हिस्सा बनाती हैं।
- गोवा (70%) और मेघालय (62.7%) जैसे राज्यों ने उच्च समानता प्राप्त की है, क्योंकि यहाँ प्रवेश वस्तुनिष्ठ प्रतिस्पर्द्धी परीक्षाओं और राज्य-स्तरीय आरक्षण के आधार पर होता है।
महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व के कारण
- बार में न्यायिक विविधता: न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने कहा कि न्यायिक विविधता केवल नियुक्ति के चरण पर ही प्राप्त नहीं की जा सकती।
- यदि “बार से बेंच तक की पाइपलाइन” कमजोर है—अर्थात् कम महिलाएँ आवश्यक 15–20 वर्षों तक सक्रिय वकालत में बनी रहती हैं—तो पात्र उम्मीदवारों का समूह छोटा रह जाता है।
- ऐतिहासिक और सामाजिक बाधाएँ: पितृसत्तात्मक बहिष्कार का लंबा इतिहास और “ओल्ड बॉयज क्लब” मानसिकता महिलाओं के लिए न्यायिक पदों के लिए पैरवी करना अधिक कठिन बना देती है।
- कई महिलाओं को आपराधिक या कर कानून जैसे जटिल मामलों को सँभालने की उनकी क्षमता को लेकर लैंगिक रूढ़िवादिता का सामना करना पड़ता है।
- नियम और विनियम: जिला न्यायाधीशों के लिए 7 वर्ष के निरंतर अभ्यास का नियम और न्यूनतम आयु सीमा (आमतौर पर 35–45 वर्ष) अक्सर उस अवधि से टकराते हैं, जिन्हें महिलाएँ पारंपरिक रूप से विवाह और देखभाल की जिम्मेदारियों के लिए समर्पित करती हैं, जिससे कॅरियर में ठहराव उत्पन्न हो सकता है।
न्यायपालिका में महिलाओं की अधिक संख्या होने का महत्त्व
- विविध दृष्टिकोण: महिला न्यायाधीश घरेलू हिंसा, पारिवारिक कानून और यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों में लैंगिक-संवेदनशील दृष्टिकोण लेकर आती हैं।
- उदाहरण के लिए, न्यायमूर्ति सुजाता मनोहर ने ऐतिहासिक विशाखा दिशा-निर्देश के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
- जन विश्वास और वैधता: ऐसी न्यायपालिका जो भारत के सामाजिक विविधता (जिसमें लगभग 50% महिलाएँ हैं) को प्रतिबिंबित करती है, जन विश्वास को मजबूत करती है।
- यह सुनिश्चित करती है कि न्याय प्रणाली को निष्पक्ष, समावेशी और सभी नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने वाली माना जाए।
- आदर्श व्यक्तित्व: उच्च पदों पर कार्यरत महिला न्यायाधीश कानूनी पेशे में प्रवेश करने वाली युवा महिलाओं के लिए प्रेरणादायक व्यक्तित्व बनती हैं, जिससे पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं को तोड़ने में मदद मिलती है।
भारत में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बाधित करने वाली चुनौतियाँ:
- कार्य-जीवन संतुलन और पेशे से बाहर होना: उच्च दबाव वाली कार्य आवश्यकताएँ अक्सर पारिवारिक भूमिकाओं से टकराती हैं।
- न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने यह रेखांकित किया कि मुख्य चुनौती महिलाओं के पेशे में प्रवेश से अधिक, लिटिगेशन में उनकी निरंतरता बनाए रखना है।
- अवसंरचना की कमी: एक महत्वपूर्ण बाधा समर्थनकारी अवसंरचना का अभाव है।
- लगभग 22% ट्रायल कोर्टों में महिलाओं के लिए अलग से शौचालय नहीं हैं, और क्रेच सुविधाएँ अत्यधिक कम उपलब्ध हैं।
- संस्थागत पक्षपात: कॉलेजियम प्रणाली को अक्सर अपारदर्शी होने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ता है।
- पारदर्शी चयन मानदंडों के अभाव में, पेशेवर और व्यक्तिगत नेटवर्क (जो प्रायः पुरुषों के पक्ष में होते हैं) नियुक्तियों को प्रभावित करते हैं।
न्यायपालिका में महिलाओं को बढ़ावा देने के लिए भारत की पहलें और कार्यवाही
- बार काउंसिलों में आरक्षण: एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं के लिए कम से कम 30% सीटों को आरक्षित करने का प्रावधान है। इससे कानूनी पेशे में महिलाओं के लिए नेतृत्व के अवसर बढ़ते हैं।
- “विचार क्षेत्र” का विस्तार: उच्च न्यायालय के कॉलेजियमों से आग्रह किया गया है कि यदि पारंपरिक आयु सीमा के भीतर उपयुक्त स्थानीय उम्मीदवार उपलब्ध न हों, तो सर्वोच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करने वाली महिला अधिवक्ताओं में प्रतिभा की पहचान की जाए।
- लैंगिक संवेदनशीलता: न्यायिक संस्थाओं ने अवचेतन पक्षपात और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को समाप्त करने के लिए कानूनी ढाँचे के भीतर जागरूकता कार्यक्रम प्रारंभ किए हैं।
वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ और पहलें:
- यूएनओडीसी का “वीमेन इन जस्टिस इनिशिएटिव”: मार्च 2024 में शुरू की गई इस पहल का उद्देश्य भ्रष्टाचार-विरोधी कानून प्रवर्तन और न्यायपालिका में कार्यरत महिलाओं के लिए मेंटॉरशिप, व्यावहारिक नेतृत्व मार्गदर्शन और वैश्विक नेटवर्किंग अवसर प्रदान करना है।
- इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ वीमेन जजेस (IAWJ): वर्ष 1991 में स्थापित, यह संगठन न्यायपालिका में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ाने, लैंगिक पक्षपात को कम करने, और अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों में महिलाओं से जुड़े मुद्दों को आगे बढ़ाने के लिए कार्य करता है।
- एशिया पैसिफिक फोरम ऑन वीमेन, लॉ एंड डेवलपमेंट (APWLD): वर्ष 1986 में स्थापित, यह संगठन एशिया-प्रशांत क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण और लैंगिक न्याय को बढ़ावा देता है तथा नीति-निर्माण और कानूनी से संबंधित चर्चाओं में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देता है।
- हीफॉरशी अभियान (HeForShe Campaign): वर्ष 2015 में यूएन वीमेन द्वारा शुरू किया गया यह वैश्विक एकजुटता आंदोलन लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए पुरुषों और बालकों को शामिल करने का प्रयास करता है, जिसमें कानूनी पेशा भी शामिल है।
- जेंडर डाइवर्सिटी इन द ज्यूडिशियरी इनिशिएटिव: यह पहल यूएनडीपी (UNDP) और कॉमनवेल्थ सचिवालय द्वारा शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य विशेष रूप से न्यायपालिका में लैंगिक विविधता पर ध्यान केंद्रित करते हुए कानूनी पेशे में महिलाओं की पूर्ण और प्रभावी भागीदारी को बढ़ाना है।
PWOnlyIAS विशेष
भारतीय न्यायपालिका में महिलाओं को बढ़ावा देने के लिए संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद-14 – कानून के समक्ष समानता: संविधान कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी प्रदान करता है। यह सुनिश्चित करता है कि महिलाओं को भी पुरुषों के समान लैंगिक आधार पर भेदभाव के बिना, न्यायिक पदों तक पहुँचने का अधिकार हो।
- अनुच्छेद-15 – भेदभाव का निषेध: अनुच्छेद-15(1) धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान आदि के आधार पर भेदभाव को निषिद्ध करता है। इसमें लैंगिक समानता का प्रावधान भी शामिल है, जो न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी के अधिकार का समर्थन करता है।
- अनुच्छेद-39(क) – समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता: यह प्रावधान राज्य को समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता सुनिश्चित करने का निर्देश देता है। इसका उद्देश्य न्याय तक पहुँच में लैंगिक असमानताओं को कम करना है, जो अप्रत्यक्ष रूप से कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देता है।
- अनुच्छेद-46 – पिछड़े वर्गों के कल्याण को बढ़ावा: राज्य को महिलाओं, विशेषकर पिछड़े वर्गों की महिलाओं के कल्याण को बढ़ावा देने का निर्देश दिया गया है, ताकि वे न्यायपालिका और विधिक पेशे में अधिक पूर्ण रूप से भाग ले सकें।
- अनुच्छेद-51A(e) – मूल कर्तव्य: प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह सभी लोगों के बीच, विशेष रूप से पुरुषों और महिलाओं के बीच, सद्भाव और भ्रातृत्व की भावना को बढ़ावा दे। यह प्रावधान न्यायपालिका सहित सभी क्षेत्रों में लैंगिक पक्षपात को समाप्त करने का आह्वान करता है।
- अनुच्छेद-32 – संवैधानिक उपचार का अधिकार: महिलाएँ अनुच्छेद-32 का उपयोग कर लैंगिक भेदभाव से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए न्याय की माँग कर सकती हैं, जिसमें न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रश्न भी शामिल हैं।
- राज्य के नीति निदेशक तत्त्व (DPSP) – अनुच्छेद-39A: यह सुनिश्चित करता है कि राज्य न्यायिक व्यवस्था में पुरुषों और महिलाओं दोनों को समान अवसर प्रदान करे तथा लैंगिक-संवेदनशील कानूनों को बढ़ावा दे।
भारतीय न्यायपालिका में महिलाओं को बढ़ावा देने के लिए एसडीजी (SDG) प्रावधान
- सतत् विकास लक्ष्य 5 – लैंगिक समानता: सतत् विकास लक्ष्य (SDG) 5 एक वैश्विक लक्ष्य है, जिसका उद्देश्य लैंगिक समानता प्राप्त करना और सभी महिलाओं तथा लड़कियों को सशक्त बनाना है। यह लक्ष्य निर्णय-निर्माण पदों, जिनमें न्यायपालिका भी शामिल है, में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को सीधे बढ़ावा देता है तथा महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास करता है।
- सतत् विकास लक्ष्य 10 – असमानताओं में कमी: सतत् विकास लक्ष्य (SDG) 10 का उद्देश्य देशों के भीतर और देशों के बीच असमानताओं को कम करना है, जिसमें न्यायपालिका सहित सभी सार्वजनिक संस्थानों में लैंगिक असमानता को संबोधित करना भी शामिल है।
- सतत् विकास लक्ष्य 16 – शांति, न्याय और सशक्त संस्थान: सतत् विकास लक्ष्य (SDG) 16 का उद्देश्य शांति को बढ़ावा देना और सभी के लिए न्याय सुनिश्चित करना है। विशेष रूप से लक्ष्य 16.7 उत्तरदायी, समावेशी, सहभागितापूर्ण और प्रतिनिधिक निर्णय-निर्माण का समर्थन करता है, जिसमें न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाना और न्याय प्रणाली में लैंगिक समानता सुनिश्चित करना शामिल है।
|
आगे की राह
- 50% प्रतिनिधित्व का लक्ष्य: पूर्व मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमन्ना के सुझाव के अनुसार, भारत को न्यायपालिका में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण का लक्ष्य रखना चाहिए, ताकि संरचनात्मक असंतुलन को समाप्त किया जा सके।
- कॉलेजियम प्रणाली में सुधार: नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और लैंगिक-संवेदनशील बनाया जाना चाहिए, ताकि महिलाओं को उच्च न्यायिक पदों तक पहुँचने का निष्पक्ष अवसर प्राप्त हो सकें।
- सुरक्षित और समावेशी कार्य वातावरण: हर न्यायालय में यौन उत्पीड़न-रोधी नीतियाँ स्थापित की जानी चाहिए और लचीली कार्य नीतियाँ, मातृत्व अवकाश तथा बाल-देखभाल सुविधाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि महिला प्रतिभा को बनाए रखा जा सके।
- मार्गदर्शन (मेंटरशिप) प्रणाली: ऐसा औपचारिक नेटवर्क स्थापित किया जाना चाहिए, जिसमें वरिष्ठ महिला न्यायाधीश, युवा सहकर्मियों का मार्गदर्शन करें, जिससे वे पुरुष-प्रधान क्षेत्र में विद्यमान चुनौतियों का बेहतर तरीके से निपटान करने में सक्षम हो सकें।
निष्कर्ष
न्यायपालिका में लैंगिक विविधता को बढ़ावा देना केवल समान अवसर के लिए ही नहीं, अपितु भारत की न्याय वितरण प्रणाली की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। कानूनी शिक्षा से लेकर बेंच में उपस्थिति तक की राह को सुदृढ़ करके तथा समानता और न्याय के संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखते हुए, भारत वास्तव में एक ऐसी समावेशी न्यायपालिका का निर्माण कर सकता है, जो अपने सभी नागरिकों की सेवा प्रदान करती है।