संदर्भ
सर्वोच्च न्यायालय ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा है कि नागरिकता एवं विदेशी होने की स्थिति का निर्धारण निष्पक्ष, विधिसम्मत तथा तर्कसंगत प्रक्रिया के माध्यम से ही किया जाना चाहिए।
संबंधित तथ्य
- सर्वोच्च न्यायालय ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय के 27 निर्णयों को निरस्त कर दिया, जिनमें विदेशी न्यायाधिकरणों द्वारा अपीलकर्ताओं को विदेशी घोषित करने के निर्णयों को बरकरार रखा गया था। न्यायालय ने इन मामलों को पुनः विचारार्थ संबंधित विदेशी न्यायाधिकरणों को भेज दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
- इस मामले की शुरुआत 9 मई, 1997 के अवैध प्रवासी (निर्धारण) न्यायाधिकरण के एक आदेश से हुई थी, जिसमें साबित्री डे एवं उनके पति शंभु डे को अवैध प्रवासी घोषित कर दिया गया था, क्योंकि वे बार-बार समन जारी किए जाने के बावजूद न्यायाधिकरण के समक्ष उपस्थित नहीं हुए थे।

न्यायालय के समक्ष प्रमुख प्रश्न
- एकपक्षीय घोषणा की वैधता: क्या केवल विदेशी न्यायाधिकरण के समक्ष उपस्थित न होने के आधार पर किसी व्यक्ति को एकपक्षीय कार्यवाही के माध्यम से विदेशी घोषित किया जा सकता है?
- एकपक्षीय घोषणा वह निर्णय है, जिसे न्यायालय अथवा न्यायाधिकरण किसी एक पक्ष की अनुपस्थिति में पारित करता है, जब वह पक्ष विधिवत सूचना प्राप्त होने के बावजूद उपस्थित नहीं होता है।
- विदेशी न्यायाधिकरण की कार्यवाही में: यदि संबंधित व्यक्ति विधिवत सूचना प्राप्त होने के बाद भी उपस्थित नहीं होता है, तो विदेशी न्यायाधिकरण एकपक्षीय कार्यवाही कर सकता है। तथापि, किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने से पूर्व न्यायाधिकरण को उपलब्ध साक्ष्यों का स्वतंत्र रूप से परीक्षण करना अनिवार्य है।
- समुचित प्रक्रिया की आवश्यकता: क्या संबंधित व्यक्ति की अनुपस्थिति की स्थिति में भी विदेशी न्यायाधिकरण के लिए साक्ष्यों का स्वतंत्र परीक्षण करना तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक है?
- संवैधानिक संरक्षण का दायरा: क्या विदेशी अधिनियम, 1946 के अंतर्गत संचालित कार्यवाहियाँ संविधान द्वारा प्रदत्त निष्पक्षता, युक्तिसंगतता तथा मनमानेपन के निषेध के संवैधानिक सिद्धांत के अनुरूप होनी चाहिए ?
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देश
- सर्वोच्च न्यायालय ने सभी 27 निर्णयों तथा उनके आधार बने विदेशी न्यायाधिकरणों के मतों को निरस्त कर दिया।
- न्यायाधिकरणों को निर्देश दिया गया कि वे पूर्व निष्कर्षों से निष्पक्ष रहते हुए साक्ष्यों के स्वतंत्र मूल्यांकन के आधार पर मामलों का पुनः निर्णय करें। यह प्रक्रिया आदर्शतः छह माह के भीतर पूर्ण की जाए।
- जब तक विदेशी न्यायाधिकरण नए मत प्रस्तुत नहीं कर देते, तब तक अपीलकर्ताओं के विरुद्ध निरोध अथवा निर्वासन जैसी कोई बलपूर्वक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
- अपीलकर्ताओं को चार सप्ताह के भीतर संबंधित विदेशी न्यायाधिकरणों के समक्ष उपस्थित होकर कार्यवाही में सहयोग करना होगा तथा अनावश्यक स्थगन से बचना होगा।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मामलों को पुनर्विचार हेतु वापस भेजने का अर्थ यह नहीं है कि अपीलकर्ताओं के भारतीय नागरिक होने के दावे की पुष्टि कर दी गई है, बल्कि इसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि नागरिकता का निर्धारण विधिसम्मत एवं संविधान-सम्मत प्रक्रिया के माध्यम से किया जाए।
PWOnlyIAS विशेष
विदेशी न्यायाधिकरण (FTs) के बारे में
- विदेशी न्यायाधिकरण अर्द्ध-न्यायिक निकाय हैं, जिनका गठन यह निर्धारित करने के लिए किया जाता है कि कोई व्यक्ति विदेशी अधिनियम, 1946 के अंतर्गत विदेशी है या नहीं।
- वैधानिक आधार: इनका गठन विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 3 के अंतर्गत जारी विदेशी (न्यायाधिकरण) आदेश, 1964 के तहत किया जाता है।
- कार्य: न्यायाधिकरण सक्षम प्राधिकारी द्वारा संदर्भित मामलों का निर्णय करते हैं तथा साक्ष्यों की जाँच एवं पक्षकारों की सुनवाई के बाद यह निर्धारित करते हैं कि संबंधित व्यक्ति भारतीय नागरिक है या विदेशी।
- साक्ष्य का भार: विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 के अनुसार, यह सिद्ध करने का दायित्व कि कोई व्यक्ति विदेशी नहीं है, संबंधित व्यक्ति पर होता है।
विदेशी अधिनियम, 1946 के बारे में
- यह अधिनियम केंद्र सरकार को भारत में विदेशियों के प्रवेश, उपस्थिति, आवागमन एवं प्रस्थान को विनियमित करने की शक्ति प्रदान करता है।
- विदेशी की परिभाषा: धारा 2(क) के अनुसार, विदेशी वह व्यक्ति है जो भारत का नागरिक नहीं है।
- सरकार की शक्तियाँ: यह अधिनियम केंद्र सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा एवं लोक व्यवस्था के हित में विदेशियों के निवास, आवागमन, निरोध एवं निर्वासन को विनियमित करने का अधिकार प्रदान करता है।
- साक्ष्य का भार: धारा 9 के अनुसार, भारतीय नागरिकता सिद्ध करने का दायित्व उस व्यक्ति पर होता है जिसकी राष्ट्रीयता पर प्रश्न उठाया गया हो।
संबंधित संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद-14: विदेशियों सहित प्रत्येक व्यक्ति को विधि के समक्ष समानता तथा विधियों के समान संरक्षण की गारंटी देता है।
- अनुच्छेद-21: यह गारंटी देता है कि किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा तथा प्रत्येक निर्णयात्मक प्रक्रिया निष्पक्ष, न्यायसंगत एवं युक्तिसंगत होगी।
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सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का महत्त्व
- समुचित प्रक्रिया को सुदृढ़ करता है: यह निर्णय नागरिकता एवं विदेशी होने की स्थिति से संबंधित कार्यवाहियों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुप्रयोग को सुदृढ़ करता है।
- न्यायाधिकरणों की जवाबदेही बढ़ाता है: यह विदेशी न्यायाधिकरणों को केवल एकपक्षीय कार्यवाही पर यांत्रिक रूप से निर्भर रहने के बजाय साक्ष्य-आधारित, स्वतंत्र एवं तर्कसंगत निर्णय करने के लिए बाध्य करता है।
- व्यक्तिगत अधिकारों का संरक्षण करता है: यह निर्णय सुनिश्चित करता है कि नागरिकता से संबंधित निर्णय संविधान-सम्मत प्रक्रिया के माध्यम से लिए जाएँ, जिससे व्यक्तियों को मनमाने निरोध अथवा निर्वासन से संरक्षण मिलता है।
- संप्रभुता एवं संवैधानिक मूल्यों के मध्य संतुलन स्थापित करता है: यह निर्णय अवैध प्रवासियों की पहचान करने के राज्य के अधिकार को स्वीकार करता है, साथ ही यह भी सुनिश्चित करता है कि इस शक्ति का प्रयोग विधि के शासन एवं संवैधानिक गारंटियों के अनुरूप किया जाए।
निष्कर्ष
यह निर्णय पुनः स्थापित करता है कि नागरिकता का निर्धारण केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक संवैधानिक प्रक्रिया है। निष्पक्ष, विधिसम्मत एवं तर्कसंगत निर्णय पर बल देकर सर्वोच्च न्यायालय ने नागरिकता के विनियमन संबंधी राज्य की संप्रभु शक्ति तथा समुचित प्रक्रिया की संवैधानिक गारंटी के बीच संतुलन को सुदृढ़ किया है, जिससे विधि के शासन को और अधिक मजबूत किया गया है।