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सुपर एल नीनो

19 Jun 2026

संदर्भ

हाल ही में मौसम विज्ञान एजेंसियों ने पुष्टि की है कि वर्ष 2026 में एक अत्यंत तीव्र सुपर एल नीनो (Super El Niño) विकसित हो रहा है, जिसके प्रभाव वर्ष 2027 तक बने रहने की संभावना है। चूँकि जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक महासागर पहले से ही अधिक गर्म हैं, इसलिए यह घटना चरम मौसमी व्यवधानों को बढ़ा सकती है तथा दक्षिण एशियाई ग्रीष्मकालीन मानसून को प्रभावित कर सकती है।

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प्रमुख बिंदु

  • प्रभाव की उच्च संभावना: विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार, वर्ष 2026 के उत्तरार्द्ध तक एल नीनो परिस्थितियों के बने रहने की 90% संभावना है।
    • अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) का अनुमान है कि इसके वर्ष 2026–27 की शीत ऋतु तक बने रहने की 96% संभावना है। वैज्ञानिकों के अनुसार, प्रशांत महासागर का तापमान औसत से 2.5°C अधिक हो सकता है।
  • गर्म महासागरीय आधाररेखा: मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक तापमान पहले ही पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में लगभग 1.4°C अधिक हो चुका है।
    • यह एक जलवायु गुणक (Climate Multiplier) के रूप में कार्य करता है, जिसके परिणामस्वरूप एल नीनो की नई स्थिति पहले से ही गर्म हो चुके पृथ्वी पर प्रभाव डालते हुए हीटवेव और सूखे को और अधिक गंभीर बना सकती है।
  • ऐतिहासिक तुलना (1876–78): मौसम पूर्वानुमानकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यह घटना वर्ष 1876–78 के विनाशकारी एल नीनो के समान हो सकती है, जिसे अब तक के सबसे शक्तिशाली एल नीनो में गिना जाता है।
    • उस समय एशिया में 800 वर्षों की सबसे भीषण मानसूनी विफलता दर्ज की गई थी, जिसके परिणामस्वरूप व्यापक फसल हानि और वैश्विक अकाल उत्पन्न हुआ तथा लगभग 5 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई थी।
  • सुपर एल नीनो की दुर्लभता: सुपर एल नीनो अत्यंत विरल जलवायवीय घटनाएँ हैं। वर्ष 1950 से अब तक केवल चार प्रमुख अवसरों वर्ष 1972–73, 1982–83, 1997–98 तथा वर्ष 2015–16 में ही इनकी तीव्रता असाधारण स्तर तक पहुँची है।

सुपर एल नीनो (Super El Niño) के बारे में

  • एल नीनो (El Niño) भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य एवं पूर्वी भागों में समुद्र के सतही तापमान (SST) में होने वाली आवधिक वृद्धि की घटना है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) इसकी तीव्रता का वर्गीकरण नीनो 3.4 क्षेत्र (Niño 3.4 Region) में दीर्घकालिक औसत से तापमान विचलन के आधार पर करता है—
    • कमजोर: औसत से 0.5°C–1.0°C अधिक
    • मध्यम: औसत से 1.0°C–1.5°C अधिक
    • प्रबल: औसत से 1.5°C–2.0°C अधिक
    • अत्यंत प्रबल / सुपर: औसत से 2.0°C से अधिक।
  • सुपर एल नीनो का निर्माण कैसे होता है?
    • व्यापारिक पवनों का कमजोर होना: सामान्यतः भूमध्यरेखीय व्यापारिक पवनें पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं और गर्म सतही जल को एशिया की ओर धकेलती हैं। एल नीनो के दौरान ये पवनें कमजोर पड़ जाती हैं या कभी-कभी दिशा भी बदल लेती हैं।
    • गर्म जल का पूर्व की ओर खिसकना: पवनों के कमजोर होने पर विशाल मात्रा में गर्म सतही जल पूर्व की ओर खिसककर दक्षिण अमेरिका के तटों तक पहुँच जाता है।
    • सकारात्मक प्रतिपुष्टि चक्र: पूर्वी प्रशांत महासागर के गर्म होने से वायुमंडलीय दाब पैटर्न में परिवर्तन होता है, जिससे व्यापारिक पवनें और अधिक कमजोर हो जाती हैं। यह एक स्व-प्रबलित (Self-Reinforcing) चक्र उत्पन्न करता है, जो महासागरीय तापमान को 2°C से अधिक की महत्त्वपूर्ण सीमा तक पहुँचा सकता है।
  • मौसमी समयरेखा: एल नीनो सामान्यतः एक निश्चित मौसमी चक्र का अनुसरण करता है। यह प्रायः वसंत ऋतु में विकसित होना शुरू होता है, शीत ऋतु में अपनी अधिकतम तीव्रता पर पहुँचता है तथा अगले वसंत तक तेजी से कमजोर होकर समाप्त हो जाता है।

भारत एवं विश्व पर इसके प्रभाव

  • भारत पर प्रभाव
    • मानसून का कमजोर होना: एल नीनो सामान्यतः दक्षिण एशियाई ग्रीष्मकालीन मानसून को कमजोर करता है।
      • वर्ष 1950 के बाद से आए लगभग दो दर्जन एल नीनो वर्षों में से लगभग 15 वर्षों में सामान्य से कम वर्षा हुई, जबकि 10 वर्षों में प्रत्यक्ष रूप से सूखे की स्थिति उत्पन्न हुई।
      • उदाहरण: भारत के कुछ सबसे गंभीर सूखे वर्ष 1972, 1982, 2009 और 2015 में दर्ज किए गए, जो एल नीनो वर्ष थे।
    • वर्षा वितरण में असंतुलन: समस्या केवल कुल वर्षा में कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्षा के स्थानिक एवं कालिक वितरण से भी जुड़ी है।
      • एल नीनो मानसून के आगमन में विलंब कर सकता है तथा वर्षा ऋतु के दौरान लंबे शुष्क अंतराल उत्पन्न कर सकता है, जिससे फसल वृद्धि एवं कृषि उत्पादकता प्रभावित होती है।
    • विलंबित प्रभाव: चूँकि प्रशांत महासागर का तापवृद्धि चरण वसंत ऋतु में प्रारंभ होकर वर्ष के उत्तरार्द्ध में परिपक्व होता है, इसलिए इसका प्रतिकूल प्रभाव सामान्यतः जून–सितंबर मानसून के मध्य एवं अंतिम चरणों में अधिक दिखाई देता है, न कि प्रारंभिक चरण में।
    • हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) की भूमिका: सकारात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव (Positive IOD) तब उत्पन्न होता है, जब पश्चिमी हिंद महासागर पूर्वी भाग की तुलना में अधिक गर्म हो जाता है। यह कभी-कभी एल नीनो के शुष्क प्रभावों को कम करने में सहायक होता है।
      • उदाहरण: वर्ष 1997–98 के सुपर एल नीनो के दौरान एक शक्तिशाली सकारात्मक IOD ने भारत में पर्याप्त वर्षा सुनिश्चित की थी, जिससे एल नीनो का प्रभाव लगभग निष्प्रभावी हो गया था।
      • हालाँकि, वर्ष 2026 के लिए IMD ने संकेत दिया है कि IOD संभवतः इतना मजबूत नहीं होगा कि पर्याप्त राहत प्रदान कर सके।
  • वैश्विक प्रभाव
    • चक्रवातीय गतिविधियों का स्थानांतरण: एल नीनो वैश्विक स्तर पर चक्रवातों की संख्या नहीं बढ़ाता, बल्कि उनके गठन के क्षेत्रों को परिवर्तित करता है।
      • यह अटलांटिक महासागर में प्रबल पवन कर्तन (Wind Shear) उत्पन्न करता है, जिससे विकसित होते तूफान कमजोर पड़ जाते हैं और अटलांटिक हरिकेन गतिविधियाँ बाधित हो जाती हैं।
      • इसके विपरीत, यह प्रशांत महासागर में सुपर टाइफून के विकास के लिए अत्यंत अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है, जो प्रायः पूर्वी एशिया और अमेरिका के तटीय क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं।
    • पारिस्थितिकीय क्षति: पूर्व के सुपर एल नीनो घटनाक्रमों ने व्यापक पर्यावरणीय क्षति पहुँचाई है।
      • वर्ष 1997–98 के सुपर एल नीनो के दौरान समुद्री हीटवेव्स के कारण विश्व की लगभग 1/6 प्रवाल भित्तियाँ नष्ट हो गई थीं। वहीं वर्ष 2015–16 के एल नीनो ने पूर्वी एवं दक्षिणी अफ्रीका में गंभीर सूखा, खाद्य संकट तथा मानवीय चुनौतियाँ उत्पन्न की थीं।

निष्कर्ष

अनुमानित वर्ष 2026–27 का सुपर एल नीनो इस बात को रेखांकित करता है कि वैश्विक तापन प्राकृतिक जलवायु चक्रों की तीव्रता को और बढ़ा रहा है। भारत के लिए यह मानसून की स्थिरता, खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों तथा ग्रामीण आजीविकाओं के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकता है। अतः जलवायु-सहिष्णु कृषि, कुशल जल प्रबंधन तथा पूर्वानुमेय एवं सक्रिय अनुकूलन रणनीतियों को अपनाना अत्यंत आवश्यक होगा।

सुपर एल नीनो

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