संदर्भ
भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर प्रति महिला 1.9 बच्चे रह गई है, जो 2.1 के प्रतिस्थापन-स्तर प्रजनन से नीचे है।
- यह जनसंख्या वृद्धि संबंधी चिंताओं से जनसंख्या के वृद्ध होने, श्रम बाजार असंतुलन तथा सामाजिक सुरक्षा की चुनौतियों की ओर एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है।
प्रमुख शब्दावली
- कुल प्रजनन दर (TFR): किसी महिला द्वारा अपने प्रजनन काल (15–49 वर्ष) के दौरान जन्म दिए जाने वाले बच्चों की औसत संख्या, यह मानते हुए कि वर्तमान आयु-विशिष्ट प्रजनन दरें उसके पूरे जीवनकाल में स्थिर बनी रहती हैं।
- प्रतिस्थापन-स्तर प्रजनन: लगभग प्रति महिला 2.1 बच्चों की कुल प्रजनन दर (TFR), जिस पर कोई जनसंख्या, प्रवासन के बिना एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक स्वयं को ठीक-ठीक प्रतिस्थापित कर लेती है।
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मुख्य संरचनात्मक चुनौतियाँ
- समृद्धि से पूर्व वृद्धावस्था: पश्चिमी देशों या जापान के विपरीत, भारत औपचारीकरण एवं समृद्धि से पूर्व ही जनसंख्या वृद्धावस्था का अनुभव कर रहा है। देश निम्न प्रति व्यक्ति आय (लगभग 2,800 डॉलर) तथा केवल 6% के संकीर्ण प्रत्यक्ष कर आधार के साथ व्यापक जनसांख्यिकीय वृद्धावस्था का सामना कर रहा है।
- भारत में 60 वर्ष एवं उससे अधिक आयु के लगभग 15 करोड़ लोग हैं। वर्ष 2050 तक यह संख्या बढ़कर 34.7 करोड़, अर्थात् कुल जनसंख्या का लगभग पाँचवाँ भाग, होने का अनुमान है।
- अनौपचारिक श्रम एवं देखभाल संबंधी अंतराल: चूँकि अधिकांश लोग अनौपचारिक रोजगार में कार्यरत हैं, इसलिए अंशदान-आधारित सामाजिक सुरक्षा तंत्र अत्यधिक अस्थिर आय के कारण प्रभावी नहीं हो पाते हैं।
- साथ ही, शहरीकरण एवं प्रवासन के कारण पारंपरिक संयुक्त परिवार व्यवस्था तथा महिलाओं द्वारा की जाने वाली अवैतनिक देखभाल में कमी आई है, जिससे यह अदृश्य घरेलू देखभाल का भार ऐसे राज्य-आधारित सुरक्षा तंत्र पर स्थानांतरित हो रहा है, जो वस्तुतः अस्तित्व में नहीं है।
- वृद्धावस्था का लैंगिक बोझ: महिलाएँ बहुआयामी संकट का सामना कर रही हैं। प्राथमिक देखभालकर्ता होने के कारण उनकी औपचारिक श्रम बल भागीदारी सीमित रहती है, जबकि पुरुषों की तुलना में अधिक जीवन प्रत्याशा के कारण वे वृद्धावस्था में विधवापन तथा आर्थिक विपन्नता की अधिक शिकार होती हैं।
- राजकोषीय-संघीय एवं राजनीतिक-अर्थव्यवस्था संबंधी संघर्ष: जनसांख्यिकीय परिवर्तन की भिन्न गति, राज्यों के मध्य गंभीर तनाव उत्पन्न कर सकती है।
- तेजी से वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहे तथा अधिक कर योगदान देने वाले दक्षिणी राज्य, अपेक्षाकृत युवा एवं कम आय वाले उत्तरी राज्यों को संसाधनों के हस्तांतरण को लेकर बढ़ती राजनीतिक एवं वित्तीय चिंता का सामना कर रहे हैं।
- गंभीर महामारी-विज्ञान संबंधी परिवर्तन: वर्तमान स्वास्थ्य प्रणाली का निर्माण तीव्र रोगों के उपचार के लिए हुआ है, दीर्घायु के लिए नहीं।
- नीति आयोग की सीनियर केयर रिफॉर्म्स रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 75% वृद्धजन दीर्घकालिक रोगों से पीड़ित हैं तथा लगभग 24% को दैनिक जीवन की गतिविधियों (ADL) को पूरा करने में कठिनाई होती है, जिससे प्राथमिक स्वास्थ्य अवसंरचना के शीघ्र संकटग्रस्त होने का जोखिम उत्पन्न हो गया है।
आगे की राह
- मुद्रास्फीति-सूचकांकित पेंशन न्यूनतम स्तर की स्थापना: वर्तमान राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) के अंतर्गत दी जाने वाली ₹200–₹500 की अपर्याप्त सहायता को संशोधित कर अनौपचारिक श्रमिकों को पूर्ण निर्धनता से सुरक्षित रखने हेतु कानूनी रूप से गारंटीकृत न्यूनतम मूल पेंशन प्रदान की जानी चाहिए।
- ‘सिल्वर इकोनॉमी’ एवं जेरियाट्रिक देखभाल मिशन की शुरुआत: वृद्धावस्था की चुनौती को आर्थिक अवसर में परिवर्तित करने के लिए सिल्वर अर्थव्यवस्था (वरिष्ठ नागरिक आवास, सहायक प्रौद्योगिकी, वृद्ध देखभाल सेवाएँ) को प्रोत्साहन दिया जाए। साथ ही, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में जेरियाट्रिक विशेषज्ञता को जिला स्वास्थ्य योजना तथा प्राथमिक नर्सिंग पाठ्यक्रमों में सम्मिलित किया जाए।
- अंतरराज्यीय लाभ पोर्टेबिलिटी लागू करना: निवास-आधारित कल्याणकारी प्रतिबंधों को समाप्त किया जाए। अधिक समृद्ध एवं तेजी से वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहे राज्यों को अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिकों को महत्त्वपूर्ण आर्थिक नागरिक के रूप में स्वीकार करते हुए, उनके लिए कानूनी रूप से संचलनीय स्वास्थ्य एवं सामाजिक अधिकार सुनिश्चित करने चाहिए, जो श्रमिक के साथ स्थानांतरित हो सकें।
- शेष जनसांख्यिकीय लाभांश का दोहन: उत्तरी राज्यों में शिक्षा तथा उच्च-मूल्य कौशल विकास में तीव्र निवेश कर राजकोषीय आधार का विस्तार किया जाए। इससे आंतरिक प्रवासन के माध्यम से उच्च वेतन, कर-सृजनकारी उत्पादकता प्राप्त होगी, न कि श्रमिकों का केवल ग्रामीण अल्प-रोजगार से कम वेतन वाले शहरी अनौपचारिक रोजगार की ओर स्थानांतरण।
निष्कर्ष
भारत की प्रतिस्थापन-स्तर से कम प्रजनन दर एक विशिष्ट चुनौती प्रस्तुत करती है, किंतु साथ ही डिजिटल अवसंरचना, टेलीमेडिसिन तथा सामाजिक सुरक्षा के माध्यम से सुदृढ़ कल्याणकारी प्रणालियों के निर्माण का एक अवसर भी प्रदान करती है। जैसे-जैसे पारंपरिक पारिवारिक सहयोग कमजोर होता जाएगा, राज्य को देखभाल, स्वास्थ्य तथा आय संबंधी आवश्यकताओं के समर्थन में अपनी भूमिका लगातार बढ़ानी होगी।