उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019

14 Mar 2026

संदर्भ

भारत सरकार ने लोकसभा में एक विधेयक प्रस्तुत किया है, जिसमें उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है, ताकि ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा को पुनर्परिभाषित किया जा सके और स्व-धारित लैंगिक पहचान के अधिकार को हटाया जा सके।

संबंधित तथ्य

  • प्रस्तावित प्रमुख परिवर्तन “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” की परिभाषा तथा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के विरुद्ध अपराधों और उनके लिए दंड से संबंधित प्रावधानों के विस्तार से जुड़े हैं।

उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में प्रस्तुत प्रमुख परिवर्तन

  • ट्रांसजेंडर लोगों की परिभाषा

पहलू वर्तमान परिभाषा प्रस्तावित संशोधन
परिभाषा का आधार जन्म के समय निर्धारित लैंगिक रूप से भिन्न पहचान पर आधारित सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों तथा जैविक/जन्मजात विविधताओं पर केंद्रित
शामिल श्रेणियाँ ट्रांस-मैन, ट्रांस-वुमन, इंटरसेक्स व्यक्ति, जेंडरक्वीर तथा किन्नर, अरावनी, जोगता जैसी पहचानें। किन्नर, अरावनी, जोगता, नपुंसक, इंटरसेक्स व्यक्ति तथा यौन विशेषताओं में जन्मजात विविधताएँ।
अतिरिक्त प्रावधान जबरन थोपी गई पहचान या अपवर्जन का उल्लेख नहीं। ट्रांसजेंडर पहचान के लिए बाध्य किए गए व्यक्तियों को शामिल करता है, लेकिन यौन अभिविन्यास और स्वयं-अनुभूत लैंगिक पहचान को बाहर रखता है।

  • “प्राधिकरण” के लिए प्रावधान का परिचय: प्रस्तावित संशोधनों में “प्राधिकरण” शब्दावली को शामिल करने का सुझाव दिया गया है, जिसे “एक चिकित्सा बोर्ड, जिसकी अध्यक्षता मुख्य चिकित्सा अधिकारी या उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी करेंगे, जिन्हें केंद्र सरकार, राज्य सरकार या केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन द्वारा नियुक्त किया जा सकता है” के रूप में परिभाषित किया गया है।
  • आधिकारिक दस्तावेजों में नाम परिवर्तन का अधिकार: यह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को जन्म प्रमाण-पत्र और अन्य पहचान दस्तावेजों में अपना पहला नाम बदलने का अधिकार प्रदान करता है, इस शर्त के साथ कि व्यक्ति प्रस्तावित नई परिभाषा के अनुसार “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” होना चाहिए।
  • जेंडर-पुनर्निर्धारण शल्य चिकित्सा (SRS) के बाद संशोधित जेंडर प्रमाण-पत्र अनिवार्य: यह भी अनिवार्य करता है कि जेंडर-पुनर्निर्धारण शल्य चिकित्सा (SRS) कराने के बाद ट्रांसजेंडर व्यक्ति को संशोधित जेंडर प्रमाण-पत्र के लिए आवेदन करना होगा, जबकि वर्तमान कानून में यह निर्णय व्यक्ति पर छोड़ दिया गया है।
  • चिकित्सा संस्थानों द्वारा अनिवार्य रिपोर्टिंग: एक नया प्रावधान प्रस्तावित किया गया है, जिसके तहत जेंडर-पुनर्निर्धारण शल्य चिकित्सा (SRS) करने वाले चिकित्सा संस्थानों को इन प्रक्रियाओं का विवरण जिला मजिस्ट्रेट को उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा।
  • अपराध और दंड का विस्तार: अपराधों और दंड से संबंधित धारा में प्रस्तावित संशोधन को काफी विस्तृत किया गया है, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों और बच्चों के विरुद्ध अपराधों को शामिल किया गया है तथा कठोर कारावास से लेकर आजीवन कारावास और ₹5 लाख तक के जुर्माने तक के दंड का प्रावधान किया गया है।
  • ट्रांसजेंडर प्रमाण-पत्र जारी करने की प्रक्रिया में परिवर्तन 

पहलू वर्तमान प्रावधान प्रस्तावित संशोधन
जिला मजिस्ट्रेट (DM) की भूमिका जिला मजिस्ट्रेट निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार, प्रमाण-पत्र जारी करता है। प्रमाण-पत्र जारी करने से पहले जिला मजिस्ट्रेट को किसी प्राधिकरण की सिफारिशों की जाँच करनी होगी।
सत्यापन प्रक्रिया अपेक्षाकृत प्रक्रियात्मक और प्रशासनिक। प्रमाणपत्र प्रदान करने से पहले DM चिकित्सीय विशेषज्ञों की सहायता ले सकता है।
निर्णय प्रक्रिया आवेदन और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर प्रमाण-पत्र जारी किया जाता है। समीक्षा के बाद DM को आवश्यक या उपयुक्त लगने पर ही प्रमाण-पत्र जारी किया जाएगा।

प्रस्तावित संशोधनों को लेकर चिंताएँ

  • स्व-धारित लैंगिक पहचान के अधिकार को हटाना: प्रस्तावित संशोधन स्व-धारित लैंगिक पहचान के अधिकार को हटाता है, जो ऐतिहासिक नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी बनाम भारत संघ (2014) के निर्णय के सिद्धांतों के विपरीत है, जिसमें लैंगिक पहचान के स्व-निर्णय के अधिकार को मान्यता दी गई थी।
  • ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की सीमित परिभाषा: कार्यकर्ताओं का तर्क है कि नई परिभाषा ट्रांसजेंडर पहचान को मुख्यतः कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक श्रेणियों तक सीमित कर देती है, जिससे कई ऐसे व्यक्ति बाहर हो सकते हैं, जो स्वयं को ट्रांसजेंडर के रूप में पहचानते हैं।
  • सांस्कृतिक और शब्दावली से जुड़ी चिंताएँ: आलोचकों का कहना है कि प्रस्तावित परिभाषा हिजड़ा, किन्नर, अरावनी जैसे शब्दों को प्राथमिकता देती है, जबकि भारत के विभिन्न समुदायों द्वारा प्रयुक्त अन्य सम्मानजनक क्षेत्रीय शब्दों को अनदेखा करती है।
  • समुदाय के भीतर पहचान और वैधता से जुड़ी समस्या: नई परिभाषा के कारण ट्रांसजेंडर समुदाय के भीतर यह भ्रम और विभाजन उत्पन्न हो सकता है कि कानून के अनुसार कौन ट्रांसजेंडर माना जाएगा।

प्रस्तावित संशोधनों के लिए सरकार का तर्क

  • कार्यान्वयन संबंधी कठिनाइयों का समाधान: सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने कहा कि उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 लागू होने के बाद ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषा और पहचान को लेकर कई संदेह और व्यावहारिक कठिनाइयाँ सामने आई हैं।
  • वर्तमान परिभाषा को अस्पष्ट माना गया: सरकार का तर्क है कि वर्तमान परिभाषा अत्यधिक अस्पष्ट है, जिससे यह पहचान करना कठिन हो जाता है कि वास्तव में कौन-से वंचित व्यक्ति अधिनियम के लाभ प्राप्त करने के पात्र हैं।
  • कानूनी और प्रशासनिक संगतता: सरकार के अनुसार मौजूदा परिभाषा दंडात्मक, दीवानी और व्यक्तिगत कानूनों को लागू करने में व्यावहारिक समस्याएँ उत्पन्न करती है तथा संसद तथा राज्य विधानसभाओं द्वारा बनाए गए अन्य कानूनों के साथ पूरी तरह संगत नहीं है।
  • जैविक कारणों से होने वाले सामाजिक बहिष्कार को लक्षित करना: सरकार का कहना है कि कानून का उद्देश्य उन व्यक्तियों की सुरक्षा करना है, जो जैविक कारणों से गंभीर सामाजिक बहिष्कार का सामना करते हैं, न कि सभी प्रकार की लैंगिक पहचान या स्व-धारित लैंगिक पहचान को शामिल करना।
  • सटीक परिभाषा की आवश्यकता: चूँकि यह अधिनियम व्यापक सुरक्षा और लाभ प्रदान करता है, इसलिए सरकार का तर्क है कि स्पष्ट और सटीक पहचान मानदंड आवश्यक हैं, ताकि लाभ वास्तव में लक्षित समूहों तक पहुँच सकें।

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