“भारत में महिलाएँ और पुरुष, 2025: चयनित संकेतक और आँकड़े संबंधी रिपोर्ट”

1 May 2026

संदर्भ

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने अपने प्रकाशन भारत में महिलाएँ और पुरुष 2025: चयनित संकेतक एवं आँकड़े संबंधी रिपोर्ट” का 27वाँ संस्करण जारी किया है।

संबंधित तथ्य

  • यह प्रकाशन डेटा फॉर डेवलपमेंट” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय विचार-विमर्श शिखर सम्मेलन में भुवनेश्वर, ओडिशा में जारी किया गया।

भारत में महिलाएँ और पुरुष 2025: चयनित संकेतक एवं आँकड़े संबंधी रिपोर्ट” के बारे में

  • यह भारत में जनसंख्या, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं निर्णय-निर्माण से संबंधित लैंगिक प्रवृत्तियों का व्यापक अवलोकन प्रस्तुत करती है।

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  • यह ग्रामीण-शहरी वर्गीकरण तथा राज्यवार वितरण के आधार पर विभिन्न संकेतकों का संक्षिप्त दृष्टिकोण भी प्रदान करती है, जिससे देश में विकसित होती लैंगिक असमानताओं एवं विकास संबंधी प्रवृत्तियों की समझ प्राप्त होती है।
    • यह विभिन्न मंत्रालयों, विभागों एवं संगठनों से प्राप्त लैंगिक रूप से विभाजित आँकड़ों का संकलन करती है।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • जन्म के समय लिंगानुपात में सुधार: अखिल भारतीय स्तर पर जन्म के समय लिंगानुपात वर्ष 2017-19 में 904 से बढ़कर वर्ष 2021-23 में 917 हो गया, जो जन्म के समय बालिकाओं के जीवित रहने में प्रगति को दर्शाता है।
  • शिशु मृत्यु दर में कमी: वर्ष 2008 से 2023 के मध्य लड़कियों एवं लड़कों दोनों के लिए शिशु मृत्यु दर में निरंतर गिरावट दर्ज की गई है।

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  • विद्यालयी शिक्षा में लैंगिक समानता की उपलब्धि: शिक्षा के क्षेत्र में प्राथमिक से उच्च माध्यमिक स्तर तक लैंगिक समानता प्राप्त कर ली गई है।
  • उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (GER) में वृद्धि: उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात में सुधार हुआ है, जो वर्ष 2021-22 से वर्ष 2022-23 के बीच महिलाओं के लिए 28.5 से 30.2 तथा पुरुषों के लिए 28.3 से 28.9 तक बढ़ा है।
  • श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) में वृद्धि: श्रम बल भागीदारी के संदर्भ में 15 वर्ष एवं उससे अधिक आयु के पुरुषों एवं महिलाओं दोनों में वृद्धि देखी गई है, जिसमें ग्रामीण महिलाओं में सर्वाधिक वृद्धि दर्ज की गई।
    • महिला श्रम भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि: ग्रामीण क्षेत्रों में महिला श्रम भागीदारी दर वर्ष 2022 से 2025 के बीच 37.5 प्रतिशत से 45.9 प्रतिशत तक बढ़ी है।
  • प्रबंधकीय पदों पर महिलाओं की संख्या में वृद्धि: प्रबंधकीय भूमिकाओं में महिलाओं की भागीदारी में वर्ष 2017 से 2025 के बीच 102.54 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि पुरुषों में यह वृद्धि 73.80 प्रतिशत रही।
  • लैंगिक आँकड़ा एवं नीतिगत ढाँचे का सुदृढ़ीकरण: इस रिपोर्ट में 50 प्रमुख संकेतकों के लिए मेटा डाटा सम्मिलित किया गया है, जिससे आँकड़ों की संकल्पना, परिभाषा एवं कार्यप्रणाली की बेहतर समझ विकसित हो तथा नीति-निर्माताओं एवं शोधकर्ताओं को लैंगिक-संवेदनशील नीति निर्माण में सहायता मिले।
  • अवैतनिक देखभाल कार्य: महिलाएँ अभी भी पुरुषों की तुलना में अवैतनिक घरेलू कार्यों में असमान रूप से अधिक समय व्यतीत करती हैं।

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  • डिजिटल धोखाधड़ी संबंधी जोखिम: महिलाओं में प्रायः डिजिटल साक्षरता का अभाव होता है, जिससे वे साइबर अपराधों की रिपोर्टिंग या रोकथाम में कठिनाई का सामना करती हैं।
  • विवाह की आयु में परिवर्तन: महिलाओं के विवाह की औसत आयु में वर्ष 2021 के बाद से निरंतर वृद्धि देखी गई है।
    • विवाह की औसत आयु: वर्ष 2023 में यह 24.3 वर्ष तक पहुँच गई, जिससे शैक्षिक एवं व्यावसायिक विकास के लिए अधिक समय उपलब्ध होता है।

स्वास्थ्य, शिक्षा एवं रोजगार में लैंगिक परिणामों को प्रभावित करने वाले नीतिगत हस्तक्षेप

  • महिलाओं के स्वास्थ्य परिणामों में सुधार हेतु पहलें
    • बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ: घटते बाल लिंगानुपात को संबोधित करने हेतु एक प्रमुख पहल, जिसका उद्देश्य बालिका के जन्म को बढ़ावा देना, लैंगिक-आधारित भ्रूण चयन को रोकना तथा उसके जीवन की रक्षा, संरक्षण एवं शिक्षा सुनिश्चित करना है।
    • जननी सुरक्षा योजना: एक माँग-आधारित हस्तक्षेप, जो गर्भवती महिलाओं को नकद प्रोत्साहन प्रदान करता है ताकि संस्थागत प्रसव को बढ़ावा मिले और विशेषकर गरीब एवं संवेदनशील वर्गों में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाई जा सके।
    • प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना: एक मातृत्व लाभ योजना, जो गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं को आंशिक वेतन क्षतिपूर्ति प्रदान करती है, जिससे वे पर्याप्त विश्राम, बेहतर पोषण प्राप्त कर सकें तथा माता एवं शिशु दोनों के स्वास्थ्य परिणाम बेहतर हो सकें।
    • पोषण अभियान: यह एक व्यापक पोषण मिशन है, जिसका उद्देश्य कुपोषण, स्टंटिंग, एनीमिया को कम करना है, जिसमें विभिन्न योजनाओं का समेकन तथा प्रौद्योगिकी आधारित वास्तविक समय निगरानी शामिल है।
    • आयुष्मान भारत: एक प्रमुख स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम है, जो द्वितीयक एवं तृतीयक स्तर की चिकित्सा सेवाओं हेतु वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे महिलाओं की बिना आर्थिक बोझ के गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित होती है।

महिलाओं की शिक्षा में सुधार हेतु पहलें

  • समग्र शिक्षा अभियान: एक एकीकृत योजना, जो पूर्व-प्राथमिक से उच्च माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा को शामिल करती है, जिसमें समावेशी शिक्षा, लैंगिक समानता, अवसंरचना विकास एवं अधिगम परिणामों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
  • कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय: यह आवासीय विद्यालयों की स्थापना करता है, जो वंचित समुदायों की बालिकाओं के लिए शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में स्थापित किए जाते हैं, जिससे उच्च छात्र ड्रॉपआउट दर वाले क्षेत्रों में शिक्षा की पहुँच सुनिश्चित हो सके।
  • माध्यमिक शिक्षा हेतु बालिकाओं के लिए प्रोत्साहन की राष्ट्रीय योजना: यह विशेष रूप से वंचित समूहों की बालिकाओं को वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती है, जिससे वे प्राथमिक स्तर के बाद भी शिक्षा जारी रखें तथा प्रारंभिक ड्रॉपआउट दर एवं बाल विवाह की दर में कमी लाई जा सके।
  • प्रधानमंत्री ई-विद्या: एक डिजिटल शिक्षा पहल, जो ऑनलाइन मंचों, दूरदर्शन एवं मोबाइल अनुप्रयोगों का उपयोग कर शिक्षा की निरंतरता सुनिश्चित करती है, विशेषकर दूरस्थ एवं वंचित क्षेत्रों की बालिकाओं को लाभान्वित करती है।

महिला श्रम बल भागीदारी (FLFP) बढ़ाने हेतु पहलें

  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा): ग्रामीण क्षेत्रों में गारंटीकृत वेतन रोजगार प्रदान करता है, जिसमें महिलाओं की भागीदारी पर विशेष बल दिया जाता है, जिससे आय सुरक्षा एवं वित्तीय समावेशन सुनिश्चित होता है।
  • दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM): महिला-नेतृत्व वाले स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को बढ़ावा देता है, जिससे ऋण तक पहुँच, कौशल विकास एवं सतत् आजीविका अवसरों में वृद्धि होती है।
  • प्रधानमंत्री मुद्रा योजना: सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को बिना जमानत ऋण उपलब्ध कराती है, जिससे महिला उद्यमियों को अपने व्यवसाय प्रारंभ या विस्तार करने में सहायता मिलती है।
  • स्टैंड-अप इंडिया योजना: महिलाओं में उद्यमिता को प्रोत्साहित करती है, जिसके अंतर्गत विनिर्माण, सेवा या व्यापार क्षेत्र में नवीन उद्यमों की स्थापना हेतु बैंक ऋण प्रदान किया जाता है।
  • कौशल भारत मिशन: कौशल प्रशिक्षण, व्यावसायिक शिक्षा एवं उद्योग-संबंधित पाठ्यक्रमों के माध्यम से रोजगार क्षमता को बढ़ाने पर केंद्रित है, जिससे कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि होती है।
  • प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना: गरीब परिवारों की महिलाओं को रसोई गैस कनेक्शन प्रदान करती है, जिससे ईंधन संग्रहण में लगने वाला श्रम एवं समय कम होता है और इसे शिक्षा या आय-सृजन गतिविधियों में लगाया जा सकता है।

चुनौतियाँ

  • जन्म के समय प्रतिकूल लिंगानुपात (SRB) का बने रहना: यद्यपि लिंगानुपात में सुधार हुआ है, फिर भी यह प्राकृतिक स्तर से नीचे बना हुआ है, जो बालकों के जन्म को सामाजिक वरीयता एवं गर्भपूर्व निदान तकनीकों के दुरुपयोग को दर्शाता है।
    • उदाहरण: कुछ उत्तरी राज्य विधिक प्रावधानों के बावजूद विकृत अनुपात प्रदर्शित करते हैं।
  • क्षेत्रीय एवं ग्रामीण-शहरी असमानताएँ: लैंगिक संकेतकों में प्रगति असमान है, जिसमें राज्यों तथा ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के बीच महत्त्वपूर्ण भिन्नता पाई जाती है, जो स्वास्थ्य, शिक्षा एवं रोजगार अवसरों तक असमान पहुँच को दर्शाती है।
    • उदाहरण: दक्षिणी एवं पश्चिमी राज्य अनेक उत्तरी एवं पूर्वी राज्यों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
    • महिला रोजगार की निम्न गुणवत्ता एवं अनौपचारिक प्रकृति: महिला श्रम भागीदारी में वृद्धि प्रायः अनौपचारिक, कम वेतन एवं असुरक्षित कार्यों में केंद्रित है, जिससे वास्तविक आर्थिक सशक्ती करण सीमित रहता है।
    • ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में महिलाएँ अवैतनिक पारिवारिक कार्य या अनियमित श्रम में संलग्न हैं।
  • नेतृत्व एवं निर्णय-निर्माण में कम प्रतिनिधित्व: प्रबंधकीय स्तर पर वृद्धि के बावजूद, वरिष्ठ नेतृत्व पदों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी अत्यंत सीमित है।
    • कॉरपोरेट शीर्ष पदों एवं उच्च प्रशासनिक सेवाओं में महिलाओं की उपस्थिति कम है।
  • शिक्षा से रोजगार में संक्रमण की कमजोरी: शैक्षिक उपलब्धियों में सुधार के बावजूद यह कार्यबल भागीदारी में पर्याप्त रूप से परिवर्तित नहीं हो पा रहा है, जिसका कारण सामाजिक मान्यताएँ, सुरक्षा संबंधी चिंताएँ एवं अनुकूल कार्य वातावरण का अभाव है।
    • कई शिक्षित महिलाएँ विवाह या मातृत्व के बाद कार्यबल से बाहर हो जाती हैं।
  • स्थायी लैंगिक वेतन अंतर: महिलाएँ समान कार्य के लिए भी पुरुषों की तुलना में कम वेतन प्राप्त करती हैं, जो संरचनात्मक असमानताओं एवं व्यावसायिक उत्तरदायित्त्व संबंधी पृथक्करण को दर्शाता है।
    सूचना प्रौद्योगिकी एवं सेवा क्षेत्रों जैसे औपचारिक क्षेत्रों में भी वेतन अंतर विद्यमान है।
  • महिलाओं के कार्य एवं योगदान का अपर्याप्त आकलन: आँकड़ा प्रणालियाँ अभी भी अवैतनिक देखभाल कार्य एवं अनौपचारिक योगदानों को समुचित रूप से नहीं माप पातीं, जिससे नीति निर्माण में इनका कम मूल्यांकन होता है। घरेलू एवं देखभाल संबंधी कार्य अभी भी सकल घरेलू उत्पाद की गणना में व्यापक रूप से अदृश्य बने रहते हैं।

आगे की राह

  • लैंगिक न्याय संबंधी कानूनों के प्रवर्तन को सुदृढ़ करना: लैंगिक चयन एवं लैंगिक भेदभाव के विरुद्ध कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए, साथ ही सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन हेतु जन-जागरूकता अभियान संचालित किए जाएँ।
  • पिछड़े क्षेत्रों के लिए लक्षित हस्तक्षेप: विभाजित आँकड़ों का उपयोग कर क्षेत्र-विशिष्ट नीतियाँ तैयार की जाएँ, जिससे स्थानीय लैंगिक अंतराल को संबोधित किया जा सके।
  • गुणवत्तापूर्ण एवं औपचारिक रोजगार अवसरों को बढ़ावा देना: कौशल विकास पहल, डिजिटल समावेशन एवं औद्योगिक नीतियों के माध्यम से महिलाओं की कुशल एवं औपचारिक क्षेत्रों में भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए।
  • नेतृत्व में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाना: शासन, कॉरपोरेट बोर्ड एवं निर्णय-निर्माण निकायों में महिलाओं की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु नीतिगत एवं संस्थागत सुधार किए जाएँ।
  • कार्य-जीवन संतुलन एवं देखभाल अवसंरचना को सुदृढ़ करना: बाल देखभाल सुविधाओं, अभिभावकीय अवकाश एवं लचीली कार्य व्यवस्थाओं का विस्तार किया जाए, जिससे महिलाओं को कार्यबल में बनाए रखा जा सके।
  • समान वेतन सुनिश्चित करना एवं व्यावसायिक उत्तरदायित्त्व संबंधी पृथक्करण को कम करना: समान वेतन कानूनों के प्रवर्तन को सुदृढ़ किया जाए तथा महिलाओं की गैर-पारंपरिक क्षेत्रों में भागीदारी को बढ़ावा दिया जाए।
  • लैंगिक आँकड़ा प्रणालियों को सुदृढ़ करना: अवैतनिक कार्य, समय-उपयोग एवं अनौपचारिक क्षेत्र में योगदान से संबंधित आँकड़ों के संग्रहण में सुधार किया जाए, जिससे अधिक लैंगिक-संवेदनशील नीतिनिर्माण संभव हो सके।

निष्कर्ष  

वर्ष 2025 की रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत महिलाओं की शिक्षा एवं नेतृत्व के क्षेत्र में अच्छी प्रगति कर रहा है तथा प्रबंधकीय पदों पर महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि हुई है। तथापि, 14.4% साक्षरता अंतर एवं स्वास्थ्य जाँच की निम्न दर जैसी चुनौतियाँ अभी भी विद्यमान हैं। वास्तविक लैंगिक समानता तभी संभव होगी, जब ये सुधार प्रत्येक महिला के दैनिक जीवन में परिलक्षित हों।

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