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नीति आयोग की ‘मिलियन-प्लस’ शहरों के लिए रूपरेखा

1 May 2026

संदर्भ

नीति आयोग ने ‘मिलियन-प्लस’ शहरों में शासन को सुदृढ़ करने हेतु एक व्यापक रूपरेखा संबंधी रिपोर्ट जारी की है, जिसका उद्देश्य शहरी विकास को प्रोत्साहित करना एवं विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करना है।

“प्रभावी नगर सरकार की ओर – मिलियन-प्लस शहरों हेतु रूपरेखा” रिपोर्ट के बारे में

  • यह रिपोर्ट नीति आयोग द्वारा प्रस्तुत एक संरचित मार्गदर्शिका प्रदान करती है, जिसका उद्देश्य संस्थागत क्षमता को सुदृढ़ करना एवं भारत के बड़े शहरों में सेवा प्रदायगी में सुधार कर शहरी शासन में सुधार लाना है।
  • उद्देश्य: शहर सरकारों को सशक्त संस्थानों में परिवर्तित करना, जो कुशल सेवाएँ प्रदान करने, उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने तथा भारत की दीर्घकालिक विकास दृष्टि के अनुरूप सतत् आर्थिक वृद्धि को प्रोत्साहित करने में सक्षम हों।

भारत में मिलियन-प्लस शहरों के बारे में

  • परिभाषा: मिलियन-प्लस शहर वे शहरी केंद्र हैं, जिनकी जनसंख्या 10 लाख से अधिक होती है, जो बड़ी एवं जटिल प्रशासनिक इकाइयों का प्रतिनिधित्व करते हैं और जिनके लिए सुदृढ़ शासन ढाँचे की आवश्यकता होती है।
  • भारत में स्थिति: वर्तमान में भारत में 47 मिलियन-प्लस शहर हैं, जो मिलकर देश की शहरी जनसंख्या के लगभग एक-तिहाई का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 60% का योगदान देते हैं।

मिलियन-प्लस शहरों का महत्त्व

  • आर्थिक वृद्धि के प्रमुख चालक: ये शहर औद्योगिक उत्पादन, सेवाओं एवं समग्र सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान देकर आर्थिक गतिविधियों के मुख्य केंद्र के रूप में कार्य करते हैं।
  • नवाचार एवं रोजगार के केंद्र: मिलियन-प्लस शहर नवाचार, उद्यमिता एवं रोजगार सृजन के केंद्र के रूप में कार्य करते हैं, जो निवेश आकर्षित करते हैं, स्टार्ट-अप पारितंत्र को प्रोत्साहित करते हैं तथा गतिशील श्रम बाजार का समर्थन करते हैं।
  • शहरीकरण के प्रेरक: ये शहर भारत के शहरी संक्रमण को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि ये जनसंख्या वृद्धि को समाहित करते हैं तथा प्रवास, अवसंरचना विकास एवं आर्थिक परिवर्तन के पैटर्न को प्रभावित करते हैं।

‘मिलियन-प्लस’ शहरों में प्रमुख समस्याएँ

  • शक्तियों का सीमित हस्तांतरण: 74वें संविधान संशोधन अधिनियम के प्रावधानों के बावजूद, शहर सरकारों के पास प्रमुख कार्यों पर सीमित नियंत्रण है तथा उनके पास केवल एक छोटे हिस्से पर ही प्रभावी अधिकार है।
    • इस संशोधन द्वारा बारहवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें नगरपालिकाओं को 18 दायित्व सौंपे गए।
  • खंडित शासन एवं कमजोर नेतृत्व: निर्वाचित प्रतिनिधियों एवं प्रशासनिक निकायों के बीच स्पष्ट संस्थागत भूमिकाओं के अभाव तथा महापौर की कमजोर शक्तियों के कारण निर्णय-निर्माण में विखंडन एवं उत्तरदायित्व में कमी देखी जाती है।
  • कमजोर वित्तीय क्षमता: नगर निकायों में स्वयं के स्रोत से राजस्व सृजन अपर्याप्त है, राज्य एवं केंद्र से मिलने वाले हस्तांतरणों पर अत्यधिक निर्भरता है तथा राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों का कमजोर क्रियान्वयन होता है, जिससे वित्तीय स्वायत्तता सीमित रहती है।
  • सेवा प्रदायगी में कमी एवं क्षमता बाधाएँ: शहर सरकारों को परिवहन, जल आपूर्ति एवं स्वच्छता जैसी आवश्यक सेवाएँ प्रदान करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जिसका कारण कर्मचारियों की कमी, बार-बार प्रशासनिक स्थानांतरण तथा तकनीकी क्षमता का अभाव है।

भारत के संविधान की बारहवीं अनुसूची

निम्नलिखित 18 कार्यात्मक विषय नगरपालिकाओं के अधिकार क्षेत्र में रखे गए हैं

  1. नगर नियोजन;
  2. भूमि उपयोग का विनियमन एवं भवन निर्माण;
  3. आर्थिक एवं सामाजिक विकास की योजना बनाना;
  4. सड़कें एवं पुल;
  5. घरेलू, औद्योगिक एवं वाणिज्यिक प्रयोजनों हेतु जल आपूर्ति;
  6. लोक स्वास्थ्य, स्वच्छता, सफाई एवं ठोस अपशिष्ट प्रबंधन;
  7. अग्निशमन सेवाएँ;
  8. शहरी वानिकी, पर्यावरण संरक्षण एवं पारिस्थितिकी पहलुओं का संवर्द्धन;
  9. समाज के कमजोर वर्गों के हितों का संरक्षण, जिसमें दिव्यांग एवं मानसिक रूप से कमजोर व्यक्ति शामिल हैं;
  10. झुग्गी सुधार एवं उन्नयन;
  11. शहरी गरीबी उन्मूलन;
  12. शहरी सुविधाओं का प्रावधान, जैसे- पार्क, उद्यान एवं खेल मैदान;
  13. सांस्कृतिक, शैक्षिक एवं सौंदर्यात्मक पहलुओं का संवर्द्धन;
  14. शवदाह एवं दाह संस्कार स्थल, तथा विद्युत शवदाह गृह;
  15. पशु तालाब एवं पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम;
  16. महत्त्वपूर्ण सांख्यिकी, जिसमें जन्म एवं मृत्यु का पंजीकरण;
  17. सार्वजनिक सुविधाएँ, जैसे- सड़क प्रकाश, पार्किंग स्थल, बस स्टॉप एवं सार्वजनिक शौचालय; तथा
  18. कसाईखानों एवं चमड़ा उद्योगों का विनियमन।

नीति आयोग की प्रमुख सिफारिशें

  • शहरी नेतृत्व को सुदृढ़ करना: प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित महापौर के साथ निश्चित कार्यकाल तथा महापौर-परिषद प्रणाली लागू करने का सुझाव, जिससे शहर स्तर पर स्थिर, उत्तरदायी एवं प्रभावी नेतृत्व सुनिश्चित हो सके।
  • समेकित सेवा प्रदायगी: जल आपूर्ति, स्वच्छता एवं सार्वजनिक परिवहन जैसी प्रमुख शहरी सेवाओं को नगरीय प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में एकीकृत करने का प्रस्ताव, जिससे समन्वय एवं दक्षता बढ़ाई जा सके।
  • नगरपालिका वित्त को सुदृढ़ करना: स्वयं के स्रोत से राजस्व में वृद्धि, मजबूत राज्य वित्त आयोगों के आधार पर समयबद्ध वित्तीय हस्तांतरण तथा नगरपालिका बॉण्ड एवं अन्य बाजार-आधारित वित्तपोषण तंत्रों तक पहुँच सुनिश्चित कर वित्तीय क्षमता को मजबूत करना।
  • संस्थागत पुनर्संरचना: एजेंसियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित भूमिकाओं के साथ नगरीय प्रशासन के अधीन लाने का सुझाव, जिससे विखंडन कम हो तथा शासन परिणामों में सुधार हो।
  • विधिक एवं नीतिगत सुधार: राज्यों द्वारा नगरपालिका कानूनों में संशोधन तथा आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा आदर्श नगरपालिका कानून को अद्यतन करने का आह्वान, जिससे शासन सुधारों को समर्थन एवं उनके क्रियान्वयन को प्रोत्साहन मिल सके।

निष्कर्ष 

मिलियन-प्लस शहरों में शासन, वित्त एवं उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करना उन्हें प्रभावी विकास इंजन बनाने तथा भारत में सतत् शहरी विकास प्राप्त करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

नीति आयोग की ‘मिलियन-प्लस’ शहरों के लिए रूपरेखा

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