52वाँ G7 शिखर सम्मेलन

19 Jun 2026

संदर्भ

फ्राँस की अध्यक्षता में 52वाँ G-7 शिखर सम्मेलन एवियन-लेस-बेन्स (फ्राँस) में आयोजित किया गया।

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संबंधित तथ्य 

  • 52वें G-7 शिखर सम्मेलन (2026) की थीम नई साझेदारियों का निर्माण और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता का पुनर्निर्माण’ (Forging New Partnerships and Rebuilding International Solidarity) है।
  • G-7 की घूर्णनशील अध्यक्षता वर्ष 2027 में संयुक्त राज्य अमेरिका को हस्तांतरित की जाएगी। भारत ने फ्राँस के एवियाँ-लेस-बेन्स में आयोजित G-7 शिखर सम्मेलन के दौरान एक उच्च-स्तरीय कार्य सत्र में भाग लिया।

G7 आउटरीच सत्र 

  • आउटरीच सत्र G7 शिखर सम्मेलन के अंतर्गत आयोजित विशेष बैठकें होती हैं, जिनका आयोजन मेजबान देश द्वारा किया जाता है, जिसमें आमंत्रित साझेदार देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भी भाग लेने का अवसर मिलता है।
  • इन सत्रों का उद्देश्य वैश्विक चुनौतियों पर व्यापक चर्चा करना और G7 की इस आलोचना का समाधान करना है कि यह केवल विकसित देशों का एक सीमित समूह है, क्योंकि इनमें ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व को भी शामिल किया जाता है।
  • भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों को आमंत्रित किया जाता है, ताकि वे जलवायु परिवर्तन, विकास, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक शासन जैसे मुद्दों पर अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सकें।

52वें G7 शिखर सम्मेलन के प्रमुख परिणाम 

  • भू-राजनीतिक संघर्ष एवं सुरक्षा: G7 नेताओं ने यूक्रेन की रक्षा के लिए अपने अटूट समर्थन की पुनः पुष्टि की और देश की सैन्य क्षमताओं तथा ऊर्जा लचीलापन को मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई।
    • शिखर सम्मेलन में मध्य पूर्व में बढ़ते तनावों पर भी चर्चा हुई, जिसमें प्रारंभिक अमेरिका–ईरान समझौतों का समर्थन किया गया और लेबनान में युद्धविराम की अपील की गई।
  • वैश्विक AI ढाँचे: नेताओं ने AI के सुरक्षित और तीव्र कार्यान्वयन को संभव बनाने हेतु तकनीकी और नैतिक ढाँचे स्थापित करने पर सहमति बनाई, जिसमें वैश्विक स्तर पर सुरक्षित और सुलभ डिजिटल उपकरणों को प्राथमिकता दी गई।
  • आपूर्ति शृंखला लचीलापन: आर्थिक कमजोरियों का मुकाबला करने और एकल आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम करने के लिए सदस्यों ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ विनिर्माण और बुनियादी ढाँचे की साझेदारी बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की, जिससे भारत, वियतनाम और मैक्सिको जैसे देशों को बढ़ावा मिलेगा।
  • जलवायु एवं पर्यावरण: शिखर सम्मेलन ने ‘G7 2030 नेचर कॉम्पैक्ट’ (G7 2030 Nature Compact) की समीक्षा की और भूमि क्षरण, मरुस्थलीकरण तथा सूखे को औपचारिक रूप से प्रणालीगत सुरक्षा खतरों के रूप में वर्गीकृत किया।
  • ग्लोबल साउथ’ आउटरीच: भारत और अन्य आमंत्रित साझेदार देशों ने इस मंच का उपयोग विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को आगे रखने के लिए किया और पारंपरिक विकास वित्त मॉडल में सुधार की माँग की ताकि इसे समानता तथा पारस्परिक विश्वास पर केंद्रित किया जा सके।

G7 आउटरीच सत्र में भारत के प्रमुख संदेश

  • वैश्विक विश्वास और सहयोग का निर्माण: भारत ने यह रेखांकित किया कि देशों के बीच विश्वास की कमी एक प्रमुख चुनौती है और वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए पारस्परिक विश्वास को पुनः स्थापित करना आवश्यक है।
    • इसने जोर दिया कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए पारदर्शिता, संवाद और साझा जिम्मेदारी आवश्यक है।
  • वैश्विक विकास दृष्टिकोण में परिवर्तन: भारत ने दाता–प्राप्तकर्ता (Donor–Recipient) ढाँचे से हटकर समान भागीदारी की वकालत की, जो सम्मान, सहयोग और पारस्परिक लाभ पर आधारित हों।
    • इसने कहा कि विकास मॉडल ऐसे होने चाहिए, जहाँ देश सहायता देने और लेने के बजाय साझेदार के रूप में मिलकर कार्य करें।
  • ग्लोबल साउथ’ का अधिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना: भारत ने जोर दिया कि विकासशील देशों को केवल वित्तीय सहायता नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णय-निर्माण में अधिक मजबूत प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
    • इसने अधिक समावेशी वैश्विक शासन संरचनाओं की माँग की, जो उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के हितों को प्रतिबिंबित करें।
  • भारत–अफ्रीका विकास साझेदारी को मजबूत करना: भारत ने अफ्रीकी देशों के साथ अपने सहयोग को दक्षिण-दक्षिण सहयोग और क्षमता निर्माण पहलों के माध्यम से प्रदर्शित किया।
    • इसने अफ्रीका में स्थानीय रूप से प्रासंगिक और उच्च प्रभाव वाले परियोजनाओं पर भारत के फोकस को रेखांकित किया, जो सतत् विकास को समर्थन देते हैं।

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G7 शिखर सम्मेलन के बारे में

  • G7 कनाडा, फ्राँस, जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका का एक अनौपचारिक समूह है, जिसमें यूरोपीय संघ भी भाग लेता है।
  • G7 के उद्देश्य
    • वैश्विक आर्थिक स्थिरता और सतत् विकास को बढ़ावा देना।
    • वित्तीय संकटों और व्यापार विवादों पर समन्वित प्रतिक्रिया देना।
    • जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य महामारी और खाद्य सुरक्षा जैसे वैश्विक मुद्दों का समाधान करना।
    • लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बनाए रखना।
    • रणनीतिक गठबंधनों और नीतिगत सहमति के माध्यम से उभरती शक्तियों के प्रभाव को संतुलित करना।
  • G7 कैसे कार्य करता है?
    • अध्यक्षता प्रत्येक वर्ष सदस्य देशों के बीच घूमती है और वही देश शिखर सम्मेलन का आयोजन करता है तथा प्राथमिकताएँ तय करता है।
    • नेताओं की बैठक प्रत्येक वर्ष शिखर सम्मेलन में होती है, जबकि मंत्री और अधिकारी वर्ष भर नियमित रूप से मिलते रहते हैं।
    • अन्य देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को कभी-कभी अतिथि के रूप में चर्चाओं में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है।
    • G7 सहमति के आधार पर कार्य करता है और इसके पास कोई बाध्यकारी कानूनी अधिकार नहीं है, लेकिन इसका प्रभाव काफी महत्त्वपूर्ण है।

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भारत–G7 सहभागिता का विकास 

  • ऐतिहासिक समयरेखा: भारत की साझेदारी वर्ष 2003 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में शुरू हुई। इसके बाद वर्ष 2005 से वर्ष 2009 के बीच प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को पाँच बार आमंत्रित किया गया और वर्ष 2019 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की भागीदारी नियमित वार्षिक स्तर पर स्थापित हो गई।
  • आर्थिक शक्ति में परिवर्तन: जैसे-जैसे वैश्विक GDP में G7 का हिस्सा घटकर लगभग 40% रह गया और भारत व चीन जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएँ आगे बढ़ीं, वैसे-वैसे यह समूह भारत पर एक स्थिर लोकतांत्रिक आधार और तकनीकी साझेदार के रूप में अधिक निर्भर होने लगा।
  • ग्लोबल साउथ का प्रतिनिधित्व: वर्तमान नेतृत्व के तहत भारत ने स्वयं को विकासशील देशों के प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में स्थापित किया है, विशेषकर उन बहुपक्षीय मंचों पर जो मुख्यतः पश्चिमी विकसित देशों द्वारा संचालित हैं।

G7 की सीमाएँ 

  • सीमित वैश्विक प्रतिनिधित्व 
    • G7 मुख्य रूप से उन्नत अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है और इसमें ग्लोबल साउथ के प्रमुख उभरते हुए देश शामिल नहीं हैं।
    • इससे यह समूह विकासशील देशों की समस्याओं, जैसे गरीबी, ऋण और विकास आवश्यकताओं को प्रभावी रूप से संबोधित करने में सीमित हो जाता है।
      • उदाहरण के लिए: भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश, उनकी बढ़ती आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्ता के बावजूद, स्थायी सदस्य नहीं हैं।
  • कानूनी अधिकार की कमी 
    • G7 एक अनौपचारिक मंच है और इसके निर्णय सदस्य देशों या अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते है।
    • इन निर्णयों का कार्यान्वयन पूरी तरह से व्यक्तिगत देशों की इच्छा पर निर्भर करता है।
      • उदाहरण के लिए: जलवायु परिवर्तन और वैश्विक आर्थिक सुधारों पर G7 की चर्चाओं को लागू करने के लिए अलग-अलग देशों को अपने स्तर पर नीतिगत कार्रवाई करनी होती है।
  • पश्चिम-केंद्रित दृष्टिकोण
    • G7 का एजेंडा अक्सर विकसित पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के हितों और प्राथमिकताओं के अनुसार तय होता है।
    • विकासशील देश यह तर्क देते हैं कि जलवायु वित्त, खाद्य सुरक्षा और विकास सहायता जैसे मुद्दों पर अधिक व्यापक तथा समान प्रतिनिधित्व आवश्यक है।
      • उदाहरण के लिए: ग्लोबल साउथ के देश लंबे समय से विकसित देशों से अधिक न्यायसंगत जलवायु वित्त की माँग करते रहे हैं।
  • वैश्विक संघर्षों को सुलझाने में सीमित प्रभावशीलता 
    • हालाँकि G7 वैश्विक राजनीति को प्रभावित करता है, लेकिन प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को सीधे हल करने की इसकी क्षमता सीमित है, क्योंकि इसके पास कोई प्रवर्तन तंत्र नहीं है।
      • उदाहरण के लिए: रूस–यूक्रेन संघर्ष के बाद रूस पर G7 द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद युद्ध जारी रहा, जो यह दर्शाता है कि केवल आर्थिक दबाव के माध्यम से संघर्षों को समाप्त करना सीमित रूप से ही प्रभावी है।
  • आर्थिक प्रभाव में गिरावट 
    • G7 देशों का वैश्विक GDP में हिस्सा उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के उदय के कारण कम हो गया है।
    • वैश्विक आर्थिक निर्णय अब केवल G7 तक सीमित न रहकर G20 जैसे व्यापक समूहों की भागीदारी की आवश्यकता रखते हैं।
    • चीन, भारत और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के उदय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में G7 के अलावा अन्य मंचों का महत्त्व भी तेजी से बढ़ रहा है।
  • सदस्यों के बीच आंतरिक मतभेद 
    • G7 देशों के बीच व्यापार, विदेश नीति और आर्थिक प्राथमिकताओं को लेकर मतभेद मौजूद हैं, जो सामूहिक कार्रवाई को कमजोर कर सकते हैं।
    • चीन के प्रति नीति, व्यापार प्रतिबंधों और जलवायु रणनीतियों को लेकर सदस्यों के अलग-अलग दृष्टिकोण समूह की एकता को प्रभावित करते हैं।

भारत के लिए चुनौतियाँ

  • रणनीतिक स्वायत्तता का संतुलन: भारत को पश्चिमी देशों के साथ बढ़ते सहयोग और रूस के साथ अपने लंबे समय से चले आ रहे रणनीतिक संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखना होता है।
    • भारत को अपनी रक्षा आवश्यकताओं, ऊर्जा सुरक्षा और स्वतंत्र विदेश नीति दृष्टिकोण को सुरक्षित रखते हुए वैश्विक भू-राजनीतिक दबावों का सामना करना पड़ता है।
      • उदाहरण के लिए: रूस–यूक्रेन संघर्ष पर पश्चिमी आलोचना के बावजूद, भारत रूस से रक्षा सहयोग और कच्चे तेल का आयात जारी रखता है, साथ ही G7 और क्वाड (Quad) जैसे मंचों के साथ भी सक्रिय रूप से जुड़ा रहता है।
  • बढ़ता व्यापार संरक्षणवाद 
    • प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ते आर्थिक राष्ट्रवाद और संरक्षणवादी नीतियाँ भारत के निर्यात, निवेश तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भागीदारी को प्रभावित कर सकती हैं।
    • भारत को घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने के साथ-साथ वैश्विक बाजारों के साथ एकीकरण भी सुनिश्चित करना होगा।
      • उदाहरण के लिए: अमेरिका का मुद्रास्फीति न्यूनीकरण अधिनियम  (IRA) घरेलू उद्योगों को सब्सिडी के माध्यम से बढ़ावा देता है, जिससे वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्द्धा कर रही भारतीय कंपनियों के लिए चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
  • भू-राजनीतिक अस्थिरता: यूक्रेन और पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष भारत के आर्थिक और रणनीतिक हितों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं, क्योंकि ये ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार मार्गों और वैश्विक स्थिरता को प्रभावित करते हैं।
    • भारत को सस्ती ऊर्जा प्राप्त करने और निर्बाध आपूर्ति शृंखलाओं को बनाए रखने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
      • उदाहरण के लिए: होर्मुज जलडमरूमध्य के आस-पास तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि हो सकती है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित होती है।
  • प्रौद्योगिकी शासन और AI चुनौतियाँ 
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता का तेजी से बढ़ता उपयोग डेटा सुरक्षा, डिजिटल संप्रभुता, साइबर सुरक्षा और तकनीक के नैतिक उपयोग से जुड़ी चुनौतियाँ उत्पन्न करता है।
    • भारत को नवाचार को बढ़ावा देने के साथ-साथ जिम्मेदार और सुरक्षित AI विकास सुनिश्चित करना होगा।
      • उदाहरण के लिए: अमेरिका और चीन के बीच उन्नत AI तकनीकों की प्रतिस्पर्द्धा डेटा, एल्गोरिद्म और डिजिटल अवसंरचना पर नियंत्रण को लेकर चिंताएँ बढ़ाती है।
  • जलवायु परिवर्तन और हरित संक्रमण की चुनौतियाँ 
    • भारत को आर्थिक विकास और जलवायु प्रतिबद्धताओं के मध्य संतुलन बनाना पड़ता है, साथ ही सस्ती ऊर्जा तक पहुँच भी सुनिश्चित करनी होती है।
    • विकसित देश अक्सर तीव्र उत्सर्जन कटौती की माँग करते हैं, जबकि भारत जलवायु न्याय तथा वित्तीय सहायता की आवश्यकता पर जोर देता है।
      • उदाहरण के लिए: वैश्विक जलवायु मंचों पर भारत ने समान लेकिन विभेदित जिम्मेदारियाँ’ (Common but Differentiated Responsibilities–CBDR) के सिद्धांत के तहत विकसित देशों से स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन के लिए अधिक समर्थन की माँग की है।

भारत G7 के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है?

  • तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था: भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जिसमें विशाल उपभोक्ता बाजार और कुशल कार्यबल मौजूद है।
    • उदाहरण: G7 देश भारत के साथ व्यापार, निवेश और आपूर्ति शृंखला सहयोग को बढ़ाने में रुचि रखते हैं।
  • ग्लोबल साउथ का प्रतिनिधित्व: भारत जलवायु परिवर्तन, विकास वित्त और वैश्विक सुधारों पर विकासशील देशों की चिंताओं का प्रतिनिधित्व करता है।
    • भारत ने अपने G20 अध्यक्षता वर्ष 2023 के दौरान ग्लोबल साउथ के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।
  • इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक महत्त्व: भारत एक स्वतंत्र, खुला और सुरक्षित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
    • क्वाड के माध्यम से सहयोग समुद्री सुरक्षा साझेदारियों को मजबूत करता है।
  • आपूर्ति शृंखला विविधीकरण: भारत G7 अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक वैकल्पिक विनिर्माण और आपूर्ति शृंखला साझेदार प्रदान करता है।
    • उदाहरण: PLI योजनाएँ वैश्विक कंपनियों को भारत में निवेश के लिए आकर्षित करती हैं।
  • प्रौद्योगिकी और डिजिटल नेतृत्व: भारत का डिजिटल अवसंरचना अनुभव AI, नवाचार और प्रौद्योगिकी शासन में सहयोग को बढ़ावा देता है।
    • उदाहरण: भारत का UPI और डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर वैश्विक मॉडल बन चुके हैं।
  • ऊर्जा और जलवायु साझेदारी: भारत की नवीकरणीय ऊर्जा वृद्धि वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के लिए महत्त्वपूर्ण है।
    • उदाहरण: भारत का अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन नवीकरणीय ऊर्जा सहयोग को बढ़ावा देता है।
  • भू-राजनीतिक संतुलन भूमिका:भारत की रणनीतिक स्वायत्तता इसे पश्चिमी देशों और रूस दोनों के साथ संवाद करने में सक्षम बनाती है।
    • उदाहरण: रूस–यूक्रेन संघर्ष पर भारत का संतुलित रुख उसकी स्वतंत्र विदेश नीति को दर्शाता है।

आधार  G7 G20
गठन  वर्ष 1975 वर्ष 1999
सदस्य  7 उन्नत अर्थव्यवस्थाएँ + यूरोपीय संघ (EU) 19 देश + यूरोपीय संघ (EU) + अफ्रीकी संघ
प्रकृति  अनौपचारिक रणनीतिक मंच वैश्विक आर्थिक समन्वय मंच
प्रतिनिधित्व  सीमित अधिक समावेशी
मुख्य फोकस  राजनीतिक, सुरक्षा और आर्थिक मुद्दे वैश्विक अर्थव्यवस्था, वित्त और विकास
भारत की स्थिति  आउटरीच साझेदार स्थायी सदस्य।

आगे की राह 

  • बहुपक्षीय कूटनीति का विस्तार: भारत को G7 के साथ सक्रिय रूप से जुड़ते हुए G20, ब्रिक्स (BRICS) और क्वाड (Quad) जैसे मंचों को भी मजबूत करना चाहिए, ताकि रणनीतिक संतुलन बनाए रखा जा सके।
    • यह भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा करने और वैश्विक मामलों में अपने हितों को आगे बढ़ाने में सहायता करेगा।
  • ग्लोबल साउथ’ की प्राथमिकताओं का नेतृत्व: भारत को विकासशील देशों के मुद्दों जैसे जलवायु न्याय, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक असमानता को लगातार उठाना चाहिए।
    • यह एक अधिक समावेशी वैश्विक शासन प्रणाली को बढ़ावा दे सकता है, जिसमें विकासशील देशों का बेहतर प्रतिनिधित्व हो।
  • आर्थिक साझेदारियों को गहरा करना: भारत को डिजिटल अर्थव्यवस्था, महत्त्वपूर्ण खनिज, नवीकरणीय ऊर्जा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में G7 देशों के साथ सहयोग बढ़ाना चाहिए।
    • यह उन्नत तकनीक तक पहुँच, निवेश आकर्षण और आपूर्ति शृंखला लचीलापन को मजबूत करेगा।
  • सतत विकास सहयोग को बढ़ावा: भारत को स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन, जलवायु कार्रवाई और सतत कृषि के क्षेत्रों में G7 देशों के साथ सहयोग करना चाहिए।
    • यह भारत के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों का समर्थन करेगा और एक उत्तरदायी जलवायु साझेदार के रूप में इसकी भूमिका को मजबूत करेगा।
  • रणनीतिक और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना: भारत को आतंकवाद-रोधी, साइबर सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में G7 देशों के साथ सहयोग बढ़ाना चाहिए।
    • यह विशेषकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की सुरक्षा क्षमताओं को बढ़ाएगा।
  • तकनीकी आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना: भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा जैसे उभरते क्षेत्रों में साझेदारी के साथ-साथ डेटा संप्रभुता की रक्षा करनी चाहिए।
    • यह बाहरी तकनीक पर निर्भरता कम करेगा और घरेलू नवाचार को बढ़ावा देगा।

निष्कर्ष

G7 के साथ भारत की निरंतर भागीदारी अब केवल प्रतीकात्मक नहीं रह गई है। यह भारत के एक महत्त्वपूर्ण वैश्विक शक्ति के रूप में विकास को दर्शाती है, जो महाद्वीपीय व्यापार मार्गों को नया आकार देने, ग्लोबल साउथ को औद्योगिक देशों से जोड़ने और यूरोप व एशिया में जटिल भू-राजनीतिक गतिशीलताओं के बीच संतुलन बनाने में सक्षम है।

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