संदर्भ
भारतीय CCTV नेटवर्क के समझौता होने और डिजिटल सेवाओं में व्यवधान से जुड़े हालिया घटनाक्रमों ने विदेश-नियंत्रित डिजिटल अवसंरचना पर भारत की निर्भरता तथा डिजिटल और प्रौद्योगिकीय संप्रभुता की आवश्यकता को लेकर चिंताओं को बढ़ा दिया है।
संबंधित तथ्य
डिजिटल निर्भरता को उजागर करने वाली हालिया चिंताएँ
- CCTV नेटवर्क की संवेदनशीलता: भारतीय CCTV नेटवर्क के लीक होने की रिपोर्टों ने विदेशी मूल के निगरानी सॉफ्टवेयर पर निर्भरता से जुड़े जोखिमों को उजागर किया।
- ईजीक्लाउड (EseeCloud) जैसे प्लेटफॉर्म के उपयोग ने रणनीतिक परिसंपत्तियों से संबंधित संवेदनशील जानकारी तक पहुँच को लेकर चिंताएँ बढ़ाईं।
- नायरा एनर्जी डिजिटल व्यवधान (2025)
- नायरा एनर्जी को कॉरपोरेट ई-मेल, सहयोग उपकरण और क्लाउड डेटा तक पहुँच में व्यवधान का सामना करना पड़ा।
- इस घटना ने विदेशी प्रौद्योगिकी प्रदाताओं और वैश्विक नियामक निर्णयों पर निर्भरता से उत्पन्न संवेदनशीलता को उजागर किया।
डिजिटल संप्रभुता के बारे में
- डिजिटल संप्रभुता का तात्पर्य किसी देश की उस क्षमता से है, जिसके माध्यम से वह अपनी महत्त्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना, डेटा और प्रौद्योगिकियों को नियंत्रित, सुरक्षित तथा स्वतंत्र रूप से संचालित कर सके, बिना बाहरी पक्षों पर अत्यधिक निर्भरता के।
- इसमें शामिल हैं—डेटा नियंत्रण, स्वदेशी प्रौद्योगिकी क्षमता, साइबर सुरक्षा, सुरक्षित डिजिटल अवसंरचना और रणनीतिक स्वायत्तता।

विदेशी निर्भरता जोखिम क्यों उत्पन्न करती है?
- रणनीतिक संवेदनशीलता: क्लाउड अवसंरचना, प्रमाणीकरण प्रणालियाँ और रक्षा सॉफ्टवेयर जैसे महत्त्वपूर्ण तंत्रों के लिए विदेशी स्वामित्व वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भरता रणनीतिक जोखिम उत्पन्न करती है।
- उदाहरण के लिए, नायरा एनर्जी डिजिटल व्यवधान (2025) ने दिखाया कि आवश्यक डिजिटल उपकरणों तक पहुँच विदेशी प्रौद्योगिकी प्रदाताओं के निर्णयों से प्रभावित हो सकती है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा: आधुनिक युद्ध तेजी से सॉफ्टवेयर-आधारित होता जा रहा है, जहाँ कोड, एल्गोरिदम और डिजिटल प्रणालियों पर नियंत्रण सैन्य क्षमता को प्रभावित करता है। विदेशी रक्षा प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता हथियार प्रणालियों, उपग्रहों, संचार नेटवर्क और खुफिया प्लेटफॉर्म के लिए जोखिम उत्पन्न कर सकती है।
- उदाहरण के लिए, कारगिल युद्ध (1999) के दौरान उन्नत GPS समर्थन तक पहुँच में सीमाएँ ने स्वदेशी क्षमताओं की आवश्यकता को उजागर किया।
- बाहरी नियंत्रण का जोखिम: महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों का संचालन करने वाली विदेशी कंपनियाँ अपने मूल देश के कानूनों और नीतियों का पालन करने के लिए बाध्य हो सकती हैं, जिससे प्रौद्योगिकी प्रतिबंध या निषेध का जोखिम उत्पन्न होता है।
- उदाहरण के लिए, माइक्रोसॉफ्ट द्वारा EU प्रतिबंधों का अनुपालन, जिसने नायरा एनर्जी को प्रभावित किया, यह दर्शाता है कि बाहरी नियामक निर्णय भारतीय संस्थाओं को प्रभावित कर सकते हैं।
- आर्थिक व्यवधान: विदेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भरता व्यापार संचालन, वाणिज्य और औद्योगिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है यदि उनकी पहुँच सीमित हो जाए।
- उदाहरण के लिए, क्लाउड सेवाओं, एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर या संचार उपकरणों तक पहुँच से वंचित होना कंपनियों और संस्थानों के दैनिक कार्यों को बाधित कर सकता है।
- सरकारी सेवाओं में व्यवधान: सरकारी विभाग प्रशासन और सार्वजनिक सेवा वितरण के लिए तेजी से डिजिटल अवसंरचना पर निर्भर होते जा रहे हैं। विदेशी प्लेटफॉर्म पर अत्यधिक निर्भरता ई-गवर्नेंस प्रणालियों, आधिकारिक संचार और महत्त्वपूर्ण सेवाओं के लिए जोखिम उत्पन्न कर सकती है, विशेषकर भू-राजनीतिक संघर्षों के दौरान।
- डेटा संप्रभुता संबंधी चिंताएँ: भले ही डेटा भारत में संगृहीत हो, विदेशी कंपनियाँ अपने मूल देश के कानूनों के अधीन रह सकती हैं, जिससे बाहरी पहुँच की संभावना बनी रहती है।
- उदाहरण के लिए, विदेशी क्लाउड प्रदाताओं पर निर्भरता सरकारी, रक्षा और वाणिज्यिक डेटा पर नियंत्रण को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करती है।
- साइबर सुरक्षा जोखिम: विदेशी मूल की प्रौद्योगिकियाँ साइबर हमलों, निगरानी और डेटा उल्लंघनों के जोखिम को बढ़ा सकती हैं।
- उदाहरण के लिए, भारतीय CCTV नेटवर्क के समझौता होने की रिपोर्टों ने आयातित डिजिटल प्रणालियों से जुड़े जोखिमों को उजागर किया।
- प्रौद्योगिकीय स्वायत्तता का ह्रास: विदेशी प्रौद्योगिकियों पर अत्यधिक निर्भरता भारत की डिजिटल संप्रभुता और रणनीतिक स्वतंत्रता को कमजोर कर सकती है।
- नाविक (NavIC) के विकास (GPS से जुड़े अनुभवों के बाद) तथा UPI और RuPay जैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्म इस बात को दर्शाते हैं कि घरेलू विकल्पों का निर्माण कितना महत्त्वपूर्ण है।
डिजिटल संप्रभुता की ओर वैश्विक रुझान
- फ्राँस अपने सरकारी विभागों को सॉवरेन (संप्रभु) संचार प्लेटफॉर्म की ओर स्थानांतरित करने की योजना बना रहा है।
- यूरोपीय संघ (EU) स्वतंत्र क्लाउड और IT अवसंरचना विकसित कर अमेरिकी प्रौद्योगिकी पर निर्भरता कम कर रहा है।
- नीदरलैंड्स, डेनमार्क और तुर्किये जैसे देश घरेलू (स्वदेशी) विकल्पों की खोज कर रहे हैं।
डिजिटल एवं प्रौद्योगिकीय संप्रभुता को सुदृढ़ करने हेतु भारत द्वारा उठाए गए कदम
- स्वदेशी प्रौद्योगिकियों का विकास: भारत सैटेलाइट नेविगेशन, सेमीकंडक्टर तथा स्वदेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म में घरेलू क्षमताएँ विकसित कर रहा है, ताकि विदेशी निर्भरता कम की जा सके।
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का निर्माण: UPI और RuPay की सफलता यह दर्शाती है कि भारत वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी स्वदेशी डिजिटल प्रणालियाँ विकसित करने में सक्षम है।
- रक्षा आत्मनिर्भरता: भारत स्वदेशी रक्षा उत्पादन और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा दे रहा है ताकि विदेशी रक्षा प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता कम हो सके।
- उदाहरण: एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) विकास ढाँचा।
- अंतरराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी साझेदारी: भारत विश्वसनीय भागीदारों के साथ सहयोग कर महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों का विकास कर रहा है, साथ ही रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रख रहा है।
- उदाहरण: रूस के साथ ब्रह्मोस मिसाइल कार्यक्रम तथा अमेरिका के साथ सेमीकंडक्टर सहयोग।
- अनुसंधान एवं विकास (R&D) निवेश बढ़ाने की आवश्यकता: भारत का R&D व्यय लगभग 0.74% GDP है, जो वैश्विक औसत (2.07%) की तुलना में कम है, जिससे नवाचार क्षमता और प्रौद्योगिकीय आत्मनिर्भरता प्रभावित होती है।
डिजिटल एवं प्रौद्योगिकीय संप्रभुता प्राप्त करने में भारत की चुनौतियाँ
- कम R&D निवेश: भारत का अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय वैश्विक प्रौद्योगिकी अग्रणी देशों की तुलना में कम है, जिससे स्वदेशी नवाचार और उन्नत प्रौद्योगिकियों के विकास की क्षमता सीमित होती है।
- इसका प्रभाव AI, सेमीकंडक्टर, रक्षा प्रौद्योगिकी और उन्नत कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों की प्रगति पर पड़ता है।
- विदेशी प्रौद्योगिकी पर निर्भरता: भारत अभी भी सेमीकंडक्टर, क्लाउड कंप्यूटिंग, ऑपरेटिंग सिस्टम, AI अवसंरचना और उन्नत रक्षा प्रणालियों जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में विदेशी प्रौद्योगिकियों पर अत्यधिक निर्भर है।
- यह निर्भरता प्रौद्योगिकी तक पहुँच, डेटा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता के संदर्भ में संवेदनशीलता उत्पन्न करती है।
- सीमित सेमीकंडक्टर और हार्डवेयर क्षमता: भारत की सॉफ्टवेयर सेवाओं में मजबूत क्षमता है, लेकिन उन्नत चिप्स और इलेक्ट्रॉनिक घटकों के लिए आयात पर निर्भरता बनी हुई है।
- घरेलू सेमीकंडक्टर विनिर्माण क्षमता की कमी डिजिटल अवसंरचना, इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करती है।
- कमजोर निजी क्षेत्र रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र: रक्षा नवाचार पर पारंपरिक रूप से सार्वजनिक क्षेत्र संगठनों का प्रभुत्व रहा है, जिससे निजी क्षेत्र की भागीदारी सीमित रही है।
- इससे उन्नत रक्षा प्लेटफॉर्म, स्वदेशी प्रणालियों और सैन्य प्रौद्योगिकियों के विकास में धीमापन आया है।
- नवाचार और उद्योग–शिक्षा संस्थान अंतराल: विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच सीमित सहयोग के कारण वैज्ञानिक अनुसंधान का वाणिज्यिक प्रौद्योगिकियों और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धी उत्पादों में रूपांतरण बाधित होता है।
- साइबर सुरक्षा और डिजिटल अवसंरचना में अंतराल: बढ़ती डिजिटलीकरण के साथ साइबर हमलों, डेटा उल्लंघनों और महत्त्वपूर्ण अवसंरचना पर हमलों का जोखिम बढ़ा है, जिसके लिए मजबूत स्वदेशी साइबर सुरक्षा क्षमताओं की आवश्यकता है।
- प्रतिभा उपयोग की चुनौतियाँ: भारत के पास तकनीकी पेशेवरों का बड़ा आधार है, फिर भी उन्नत अनुसंधान, विशेष कौशल और उच्च स्तरीय प्रतिभा के संरक्षण में अंतर बना हुआ है, जो रणनीतिक प्रौद्योगिकी विकास को प्रभावित करता है।
- वैश्विक प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्द्धा: भारत को AI, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर और डिजिटल प्लेटफॉर्म में अग्रणी देशों से कड़ी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ता है, जिससे रणनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने हेतु तीव्र निवेश और नवाचार आवश्यक हो जाता है।
आगे की राह
- स्वदेशी R&D को सुदृढ़ करना: भारत को अपने अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय को वैश्विक स्तर तक बढ़ाने और विश्वविद्यालयों, उद्योगों तथा सरकारी संस्थानों के मध्य सहयोग को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
- इससे AI, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा और रक्षा प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा मिलेगा।
- सॉवरेन डिजिटल अवसंरचना का निर्माण: भारत को क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, AI प्रणालियाँ, डेटा भंडारण और प्रमाणीकरण प्लेटफॉर्म जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में स्वदेशी क्षमताएँ विकसित करनी चाहिए।
- विश्वसनीय घरेलू विकल्प विकसित करने से विदेशी प्रौद्योगिकी प्रदाताओं पर निर्भरता कम होगी।
- पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप को बढ़ावा देना: रक्षा और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में नवाचार और प्रतिस्पर्द्धा के लिए निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी आवश्यक है।
- सरकार को इसे अनुसंधान वित्तपोषण, सुनिश्चित खरीद, अनुकूल नीतियों और प्रौद्योगिकी साझेदारी के माध्यम से समर्थन देना चाहिए।
- विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को प्रोत्साहन: पूर्ण प्रौद्योगिकीय आत्मनिर्भरता वैश्विक अर्थव्यवस्था में व्यावहारिक नहीं हो सकती।
- भारत को विश्वसनीय देशों के साथ सेमीकंडक्टर विकास, रक्षा प्रौद्योगिकी सहयोग और लचीली आपूर्ति शृंखलाओं के लिए साझेदारी विकसित करनी चाहिए, साथ ही रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए।
- मजबूत डेटा शासन ढाँचा विकसित करना: भारत को नागरिकों और राष्ट्रीय डेटा की सुरक्षा के लिए सुदृढ़ डेटा संरक्षण और शासन तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है।
- विदेशी पहुँच, भंडारण और महत्त्वपूर्ण जानकारी के नियंत्रण के संबंध में स्पष्ट नियम स्थापित किए जाने चाहिए।
- स्वदेशी सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र का विकास: भारत को चिप डिजाइन, विनिर्माण और पैकेजिंग में घरेलू क्षमताओं को सुदृढ़ करना चाहिए ताकि आयातित सेमीकंडक्टर पर निर्भरता कम हो और डिजिटल एवं रक्षा उद्योगों को समर्थन मिल सके।
- साइबर सुरक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करना: साइबर रक्षा प्रणालियों, स्वदेशी सुरक्षा समाधान और महत्त्वपूर्ण अवसंरचना संरक्षण को मजबूत करना आवश्यक है, ताकि साइबर हमलों को रोका जा सके और राष्ट्रीय हितों की रक्षा हो सके।
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना मॉडल को बढ़ावा देना: भारत UPI और RuPay जैसे प्लेटफॉर्म की सफलता को क्लाउड सेवाओं, डिजिटल पहचान, ई-कॉमर्स और शासन प्लेटफॉर्म जैसे अन्य क्षेत्रों में विस्तारित कर सकता है, जिससे सुरक्षित तथा स्केलेबल डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होगा।
निष्कर्ष
डिजिटल संप्रभुता का अर्थ वैश्विक प्रौद्योगिकी से अलगाव नहीं है, बल्कि रणनीतिक नियंत्रण, लचीलापन और विकल्प सुनिश्चित करना है। भारत के लिए एक बढ़ती प्रतिस्पर्द्धी वैश्विक व्यवस्था में प्रौद्योगिकीय संप्रभुता प्राप्त करना राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा हेतु अत्यंत आवश्यक है।