संदर्भ
हाल ही में चीन ने वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों के मध्य हीलियम के निर्यात पर अस्थायी प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे हीलियम की उपलब्धता को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं।
संबंधित तथ्य
- ईरान संघर्ष में बढोतरी होने के बाद वैश्विक हीलियम उत्पादन का लगभग एक-तिहाई (मुख्यतः कतर से) हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता के कारण जोखिमग्रस्त हो गया है।
- चीन का निर्यात प्रतिबंध उसके घरेलू अर्द्धचालक (Semiconductor) विनिर्माण तथा चिकित्सा क्षेत्र के लिए हीलियम की उपलब्धता सुरक्षित रखने में सहायक हो सकता है।
हीलियम (Helium) के बारे में
- हीलियम (He), हाइड्रोजन के बाद विश्व का दूसरा सबसे हल्का तथा दूसरा सर्वाधिक प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला तत्त्व है।
- प्रमुख विशेषताएँ
- अक्रिय गैस (Noble Gas): यह एक अक्रिय गैस है तथा रासायनिक रूप से अक्रिय होती है, इसलिए अन्य तत्त्वों के साथ बहुत कम अभिक्रिया करती है।
- रंगहीन एवं गंधहीन: प्राकृतिक अवस्था में यह रंगहीन तथा गंधहीन गैस है।
- जब इसमें विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है (जैसे गैस-निर्वहन नलिका में), तब यह गुलाबी-नारंगी अथवा चमकीली नारंगी-लाल आभा के साथ प्रकाशित होती है।

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- न्यूनतम क्वथनांक: इसका क्वथनांक (-269°C) सभी तत्त्वों में सबसे कम है तथा यह केवल अत्यंत निम्न तापमान पर ही द्रव अवस्था में रहती है।
- अत्यंत कम घनत्व: इसका घनत्व बहुत कम होने के कारण यह गुब्बारों एवं वायुपोतों (Airships) के लिए आदर्श उत्थापक गैस है।
- सूक्ष्म रिसाव का पता लगाने में उपयोगी: इसका परमाणु आकार अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण यह सूक्ष्म से महीन छिद्रों से भी निकल सकती है, जिससे इसका उपयोग रिसाव (Leak) का पता लगाने में किया जाता है।
- अज्वलनशील: हाइड्रोजन के विपरीत हीलियम अज्वलनशील है, जिससे यह औद्योगिक एवं अंतरिक्ष अनुप्रयोगों के लिए अधिक सुरक्षित मानी जाती है।
- उच्च शुद्धता: वाणिज्यिक उपयोग के लिए उपलब्ध हीलियम सामान्यतः 99.997% या उससे अधिक शुद्ध होती है।
हीलियम का उत्पादन
- प्राकृतिक निर्माण: पृथ्वी की भूपर्पटी में उपस्थित यूरेनियम एवं थोरियम के रेडियोधर्मी क्षय से हीलियम का प्राकृतिक रूप से निर्माण होता है।
- उत्सर्जित अल्फा कण इलेक्ट्रॉनों को ग्रहण कर हीलियम परमाणु बनाते हैं, जो समय के साथ प्राकृतिक गैस क्षेत्रों में धीरे-धीरे संचित हो जाते हैं।
- निष्कर्षण एवं शोधन: जब प्राकृतिक गैस में हीलियम की सांद्रता आयतन के आधार पर लगभग 0.3% से अधिक होती है, तब प्राकृतिक गैस के प्रसंस्करण के दौरान इसका निष्कर्षण किया जाता है।
- इसका पृथक्करण क्रायोजेनिक आसवन (बहुत कम तापमान पर गैसों को ठंडा करके अलग-अलग करने की विधि-Cryogenic Distillation) द्वारा किया जाता है, जो इसके अत्यंत निम्न क्वथनांक का उपयोग करता है।
- वाणिज्यिक उपयोग हेतु उपलब्ध हीलियम की शुद्धता सामान्यतः 99.997% या उससे अधिक होती है।
अनुप्रयोग
- स्वास्थ्य क्षेत्र: MRI स्कैनर तथा अन्य उन्नत चिकित्सा उपकरणों में प्रयुक्त अतिचालक चुंबकों को शीतल बनाए रखने के लिए हीलियम का उपयोग किया जाता है।
- इलेक्ट्रॉनिक्स एवं उभरती प्रौद्योगिकियाँ: इसका उपयोग अर्द्धचालक निर्माण, सिलिकॉन वेफर निर्माण, ऑप्टिकल फाइबर उत्पादन तथा क्वांटम कंप्यूटिंग में किया जाता है।
- अंतरिक्ष एवं रक्षा: इसरो, नासा तथा स्पेसएक्स जैसी अंतरिक्ष एजेंसियाँ रॉकेट ईंधन टैंकों में स्थिर दाब बनाए रखने तथा प्रक्षेपण अभियानों में हीलियम का उपयोग करती हैं।
- औद्योगिक एवं वैज्ञानिक उपयोग: हीलियम का व्यापक उपयोग रिसाव (Leak) का पता लगाने, नियंत्रित औद्योगिक वातावरण, प्रयोगशाला अनुसंधान, गुब्बारों तथा वायुपोतों (Airships) में किया जाता है।
- विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग: अमेरिकी भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, हीलियम की कुल माँग में 22% प्रयोगशाला उपयोग, 17% नियंत्रित औद्योगिक वातावरण एवं अर्द्धचालक उद्योग, 17% लिफ्टिंग गैस, 15% MRI स्कैनर, 9% अंतरिक्ष क्षेत्र तथा 5% रिसाव का पता लगाने में उपयोग होता है।
वैश्विक उत्पादन एवं व्यापार
- प्रमुख उत्पादक: संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व का सबसे बड़ा हीलियम उत्पादक है, जो वैश्विक आपूर्ति का लगभग 43% (लगभग 81 मिलियन घन मीटर प्रतिवर्ष) प्रदान करता है।
- कतर दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जिसकी वैश्विक हिस्सेदारी लगभग 33% (लगभग 63 मिलियन घन मीटर) है।
- प्रमुख उपभोक्ता: संयुक्त राज्य अमेरिका एवं चीन विश्व के सबसे बड़े हीलियम उपभोक्ता हैं।
- वैश्विक उत्पादन में केवल लगभग 1.6% योगदान देने के बावजूद चीन अपनी 80% से अधिक हीलियम आवश्यकताओं का आयात करता है, जिसका प्रमुख उपयोग अर्द्धचालक एवं स्वास्थ्य क्षेत्र में होता है।
- भारत की स्थिति: भारत हीलियम के लिए 100% आयात-निर्भर है तथा इसकी वार्षिक माँग लगभग 3.4 मिलियन घन मीटर है।
- भारत के 50% से अधिक हीलियम आयात कतर से होते हैं, जिससे यह देश भू-राजनीतिक आपूर्ति व्यवधानों के प्रति संवेदनशील है।
- पश्चिम बंगाल एवं झारखंड के प्राकृतिक गैस क्षेत्रों में हीलियम के अल्प मात्रा में भंडार पाए गए हैं, किंतु वर्तमान में उनका वाणिज्यिक निष्कर्षण आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है।
हीलियम आपूर्ति शृंखला इतनी महँगी क्यों है?
- पूँजी गहन शोधन एवं द्रवीकरण: मध्यम एवं बड़े स्तर के हीलियम शोधन एवं द्रवीकरण संयंत्रों की स्थापना पर 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक लागत आती है, जबकि छोटे संयंत्रों के लिए भी लगभग 10 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश आवश्यक होता है।
- विशिष्ट अवसंरचना की आवश्यकता: हीलियम के प्रसंस्करण हेतु अत्यंत निम्न तापमान पर कार्य करने में सक्षम संक्षारण-प्रतिरोधी मिश्रधातुओं से निर्मित विशेष उपकरणों एवं अवसंरचना की आवश्यकता होती है।
- महँगा भंडारण: हीलियम के रिसाव को न्यूनतम करने वाली भूमिगत लवण गुफाओं (Salt Caverns) के निर्माण पर 200 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक व्यय हो सकता है।
- संपीडित गैस भंडारण की लागत 10 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक हो सकती है, जबकि क्रायोजेनिक द्रव के थोक भंडारण हेतु क्षमता के अनुसार 0.5 से 20 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक की लागत आती है।
- विशेषीकृत परिवहन: हीलियम का परिवहन निर्वात-आवरणयुक्त स्टेनलेस स्टील पात्रों में किया जाता है, जिनका निर्माण विश्व की केवल कुछ ही कंपनियाँ करती हैं।
- इन खेपों को पात्र की निर्धारित धारण अवधि (Holding Time) समाप्त होने से पहले गंतव्य तक पहुँचाना आवश्यक होता है, अन्यथा द्रव हीलियम वाष्पन के माध्यम से वायुमंडल में उत्सर्जित होने लगता है।
निष्कर्ष
हीलियम एक रणनीतिक एवं अनवीकरणीय संसाधन है, जिसकी सुरक्षित एवं निर्बाध आपूर्ति स्वास्थ्य सेवाओं, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, अर्द्धचालक उद्योग तथा भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए निरंतर अधिक महत्त्वपूर्ण होती जा रही है।