संदर्भ
नए वैज्ञानिक साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि पैतृक जीवनशैली और पर्यावरणीय व्यवहार ‘एपिजेनेटिक’ विरासत प्रणाली के माध्यम से संतानों के स्वास्थ्य को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकते हैं।
अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष
- पैतृक जीवनशैली का प्रभाव: अध्ययन में पाया गया कि पिता का व्यायाम, आहार, तनाव संबंधी व्यवहार और विषाक्त पदार्थों से संपर्क गर्भाधान से पूर्व बच्चे के चयापचय स्वास्थ्य और सहनशक्ति को प्रभावित कर सकते हैं।
- स्पर्म माइक्रोआरएनए की भूमिका: शोधकर्ताओं ने शुक्राणु माइक्रोआरएनए को पर्यावरणीय जानकारी के वाहक के रूप में पहचाना, जो निषेचन के बाद भ्रूणीय ‘जीन एक्सप्रेशन’ को प्रभावित कर सकते हैं।
- ‘एपिजेनेटिक’ वंशानुक्रम: ये निष्कर्ष इस पारंपरिक धारणा को चुनौती देते हैं कि वंशानुक्रम केवल डीएनए पर निर्भर करता है, और अर्जित लक्षणों के एपिजेनेटिक संचरण को प्रदर्शित करते हैं।
- संतान में बेहतर चयापचय: चूहों पर किए गए इस अध्ययन में अधिक फुर्तीले नर चूहों की संतान में बेहतर ऑक्सीजन उपभोग, अधिक सहनशक्ति और स्वस्थ मांसपेशी संरचना पाई गई, जो अन्य समूह की तुलना में बेहतर थी।
- वीजमैन अवरोध (Weismann Barrier) का कमजोर होना: अध्ययन संकेत देता है कि पर्यावरणीय प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से जर्म सेल को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे पूर्णतः पृथक ‘रक्त-वृषण’ अवरोध की पारंपरिक अवधारणा कमजोर होती है।
‘एपिजेनेटिक’ संचरण के बारे में
- परिभाषा: एपिजेनेटिक संचरण का तात्पर्य पीढ़ियों के बीच डीएनए अनुक्रम में परिवर्तन किए बिना जीन एक्सप्रेशन में परिवर्तन के वंशानुक्रम से है।
- संचरण की प्रकृति: एपिजेनेटिक वंशानुक्रम रासायनिक संशोधनों जैसे DNA मिथाइलेशन और हिस्टोन संशोधन के माध्यम से होता है, जो यह नियंत्रित करते हैं कि जीन “सक्रिय” होंगे या “निष्क्रिय”।
- संचरण की प्रक्रिया: ये एपिजेनेटिक परिवर्तन शुक्राणु और अंडाणु जैसी जर्म कोशिकाओं के माध्यम से प्रजनन के दौरान स्थानांतरित होते हैं।
- क्या संचरित हो सकता है: चयापचय, प्रतिरक्षा, तनाव प्रतिक्रिया, व्यवहार और रोग संवेदनशीलता से संबंधित लक्षण एपिजेनेटिक वंशानुक्रम के माध्यम से प्रभावित हो सकते हैं।
- जिम्मेदार पर्यावरणीय कारक: आहार, व्यायाम, तनाव, प्रदूषण, शराब का सेवन और विषाक्त पदार्थों का संपर्क जैसे जीवनशैली कारक माता-पिता के एपिजेनोम को परिवर्तित कर सकते हैं।
- प्रतिवर्तनीयता: आनुवंशिक उत्परिवर्तन के विपरीत, कई एपिजेनेटिक परिवर्तन प्रतिवर्तनीय होते हैं और पर्यावरणीय परिस्थितियों तथा जीवनशैली में परिवर्तन के अनुसार बदल सकते हैं।
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प्रजनन स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रमुख उपलब्धियाँ
- जननी सुरक्षा योजना (JSY): JSY ने संस्थागत प्रसवों को 39% (2005-06) से बढ़ाकर लगभग 89% (2019-21) तक पहुँचाया, जिससे 11 करोड़ से अधिक महिलाओं को नकद सहायता के माध्यम से लाभ प्राप्त हुआ है।
- जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम और सुरक्षित मातृत्व आश्वासन: जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (JSSK) और सुरक्षित मातृत्व आश्वासन (SUMAN) ने 16.6 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को निःशुल्क मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान कीं।
- परिवार नियोजन का विस्तार: अंतरा (Antara) इंजेक्टेबल गर्भनिरोधक सेवाओं ने लगभग 20 मिलियन ‘कपल इयर्स ऑफ प्रोटेक्शन’ (CYP) सृजित किए, जिससे अनियोजित गर्भधारण में कमी आई और प्रजनन विकल्पों में सुधार हुआ।
- बाल एवं किशोर स्वास्थ्य: राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK) और मिशन इंद्रधनुष ने शिशु मृत्यु दर (IMR) को 40 (2013) से घटाकर 25 प्रति 1,000 जीवित जन्म (2023) तक लाने में योगदान दिया है।
प्रजनन स्वास्थ्य क्षेत्र में कमियाँ
- मातृ केंद्रित ढाँचा: भारत की प्रजनन स्वास्थ्य नीतियाँ मुख्यतः मातृ देखभाल पर केंद्रित हैं, जबकि पिताओं को गर्भाधान-पूर्व और प्रजनन स्वास्थ्य हस्तक्षेपों से बाहर रखा जाता है।
- पैतृक जाँच का अभाव: धूम्रपान, शराब सेवन, मोटापा, तनाव या व्यावसायिक विषाक्त संपर्क जैसे पैतृक जीवनशैली जोखिमों के लिए कोई सुव्यवस्थित स्क्रीनिंग तंत्र उपलब्ध नहीं है।
- सीमित पुरुष भागीदारी: ‘प्रजनन, मातृ, नवजात, बाल और किशोर स्वास्थ्य प्लस दृष्टिकोण’ (RMNCH+A) के अंतर्गत पुरुष सहभागिता मुख्यतः किशोर लड़कों के लिए आयरन पूरकता तक सीमित है, न कि समग्र प्रजनन भागीदारी तक।
- पर्यावरणीय स्वास्थ्य की उपेक्षा: सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम उन पर्यावरणीय कारकों को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं करते, जो शुक्राणु गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं, जैसे- प्रदूषण, रसायन और व्यावसायिक जोखिम।
प्रजनन, मातृ, नवजात, बाल और किशोर स्वास्थ्य प्लस दृष्टिकोण (RMNCH+A) के बारे में
- RMNCH+A एक एकीकृत स्वास्थ्य सेवा दृष्टिकोण है, जिसका उद्देश्य जीवन-चक्र आधारित सतत् देखभाल के माध्यम से प्रजनन, मातृ, नवजात, बाल और किशोर स्वास्थ्य परिणामों में सुधार करना है।
- प्रारंभ: इस कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 2013 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के अंतर्गत की गई थी।
- नोडल मंत्रालय: इसका कार्यान्वयन स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा राज्य स्वास्थ्य विभागों और NHM तंत्र के माध्यम से किया जाता है।
- कार्यक्रम का फोकस
- प्रजनन स्वास्थ्य और परिवार नियोजन
- सुरक्षित मातृत्व और संस्थागत प्रसव
- नवजात और बाल स्वास्थ्य देखभाल
- किशोर पोषण और परामर्श।
- RMNCH+A का लक्ष्य
- मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) को कम करना।
- नवजात मृत्यु दर (NMR) को कम करना।
- पाँच वर्ष से कम आयु मृत्यु दर (U5MR) को कम करना।
- मुख्य हस्तक्षेपों में शामिल हैं:
- सुरक्षित मातृत्व आश्वासन (SUMAN)
- लक्ष्य (LaQshaya) कार्यक्रम
- राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK)
- साप्ताहिक आयरन और फॉलिक एसिड पूरकता (WIFS)
- गृह-आधारित नवजात देखभाल (HBNC) कार्यक्रम।
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आगे की राह
- पैतृक स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं का एकीकरण: RMNCH+A और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन कार्यक्रमों में पैतृक गर्भाधान-पूर्व परामर्श, पोषण और जीवनशैली स्क्रीनिंग को प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं में एकीकृत किया जाना चाहिए।
- निवारक सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय: जागरूकता अभियान के माध्यम से पुरुषों में स्वस्थ जीवनशैली प्रथाओं जैसे- व्यायाम, मानसिक स्वास्थ्य और नशा उन्मूलन को बढ़ावा देना।
- अनुसंधान और नीतिगत विस्तार: भारत को ‘एपिजेनेटिक’ वंशानुक्रम पर मानव अध्ययन को सुदृढ़ करना चाहिए और साक्ष्य-आधारित पैतृक स्वास्थ्य दिशा-निर्देशों को प्रजनन नीति ढाँचों में शामिल करना चाहिए।
निष्कर्ष
प्रजनन स्वास्थ्य सेवा को मातृ-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर समग्र द्वि-अभिभावक ढाँचे की ओर विकसित होना चाहिए, जिससे भविष्य की पीढ़ियों का स्वास्थ्य बेहतर सुनिश्चित किया जा सके।