भूल जाने का अधिकार

2 Jun 2026

संदर्भ

हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि भूल जाने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-21 के अंतर्गत निजता के अधिकार का एक अंग है। इसके साथ ही, न्यायालय ने संसद द्वारा इस पर कोई कानून न बनाए जाने की स्थिति में, इंटरनेट से न्यायिक दस्तावेजों को हटाने/डि-इंडेक्सिंग (De-indexing) और व्यक्तिगत विवरणों को छिपाने के लिए एक न्यायिक ढाँचा भी जारी किया।

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भूल जाने का अधिकार के बारे में

  • अवधारणा और परिभाषा: RTBF व्यक्तियों  को यह अधिकार देता है कि वे अपने व्यक्तिगत डेटा को डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटाने, डि-इंडेक्स करने या उसकी पहुँच को सीमित करने की माँग कर सकें, जब ऐसी जानकारी पुरानी, अप्रासंगिक, असंगत या उनकी निजता और प्रतिष्ठा के लिए हानिकारक हो जाए।
    • यह ‘सूचनात्मक आत्म-निर्णय’ के मूल सिद्धांत को दर्शाता है, जिसके तहत व्यक्ति को अपने डिजिटल फुटप्रिंट पर अधिक नियंत्रण मिलता है।
  • ओपन जस्टिस’ बनाम व्यक्तिगत गरिमा: ‘ओपन जस्टिस’ (Open Justice) का अर्थ है कि न्यायिक प्रक्रियाएँ सार्वजनिक और पारदर्शी होनी चाहिए।
    • हालाँकि, न्यायपालिका ने साफ किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि किसी आम व्यक्ति का नाम गूगल जैसे सर्च इंजन पर हमेशा के लिए एक कमर्शियल सर्च-टर्म (खोज-शब्द) के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
  • भारतीय आदेशों का वैश्विक प्रभाव: दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि उसके डि-इंडेक्सिंग आदेश वैश्विक स्तर पर लागू होंगे, जिसका अर्थ है कि इंटरनेट सर्च इंजन मध्यस्थों को इन सर्च लिंक को केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अपने सभी वैश्विक डोमेन से हटाना होगा।

निर्णय के प्रमुख निष्कर्ष

  • याचिकाओं का आधार: न्यायालय ने 30 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई की, जिन्हें एक विविध समूह द्वारा दायर किया गया था, जिनमें आपराधिक आरोपों से बरी व्यक्ति, वैवाहिक विवादों के पक्षकार तथा जिनके मामले रद्द या समझौते से निपटाए जा चुके थे, शामिल थे।
    • उनकी एक साझा शिकायत थी कि नाम के आधार पर सर्च (खोज) किए जाने की सुविधा उनके सम्मान, गरिमा और जीवन की संभावनाओं को लगातार नुकसान पहुँचाती है।
  • बरी हुए व्यक्तियों के अधिकार: न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था दी कि जिन व्यक्तियों को बरी कर दिया गया है, जिन्हें आरोप-मुक्त कर दिया गया है, या जिनके विरुद्ध चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया गया है, वे इस बात के पूर्णतः हकदार हैं कि यह अंतिम विधिक निर्णय उनकी डिजिटल पहचान में परिलक्षित हो।
  • सर्च इंजन पर सीमा: निर्णय में कहा गया कि सर्च इंजन किसी व्यक्ति को नाम-आधारित खोज के माध्यम से अनिश्चित काल तक पुराने कानूनी मामलों से जोड़कर नहीं रख सकते, विशेषकर जब मामला बरी होने या निजी विवाद से संबंधित हो चुका हो।
  • ओपन जस्टिस’ की सीमाएँ: न्यायालय ने कहा कि जहाँ ‘ओपन जस्टिस’ (Open Justice) न्यायालयों में पारदर्शिता सुनिश्चित करती है, वहीं यह किसी व्यक्ति के अतीत के कानूनी मामलों को इंटरनेट पर अंतहीन और अनियंत्रित रूप से प्रसारित किए जाने को सही नहीं ठहरा सकती है।

RTBF का वैश्विक विकास

  • यूरोपीय संघ ढाँचा: यह आधुनिक अवधारणा वर्ष 2014 के यूरोपीय संघ के न्यायालय (Court of Justice of the EU) के गूगल स्पेन’ मामले से उभरकर सामने आई, जिसने सर्च इंजनों को उन व्यक्तिगत डेटा के लिंक हटाने के लिए मजबूर किया जो ‘अपर्याप्त या अब प्रासंगिक नहीं’ थे।
    • इसे अब ‘जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन’ (General Data Protection Regulation – GDPR) के अनुच्छेद-17 के तहत औपचारिक रूप से ‘डेटा मिटाने के अधिकार’ के रूप में संहिताबद्ध किया गया है, हालाँकि इसमें सार्वजनिक हित और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे अपवाद भी शामिल हैं।
  • अन्य अधिकार क्षेत्रों में विकास
    • संयुक्त राज्य अमेरिका: कैलिफोर्निया ऑनलाइन इरेजर लॉ (2015) ने नाबालिगों को सुरक्षा प्रदान की, जबकि डिलीट (DELETE) एक्ट (2023) ने वयस्कों को व्यावसायिक डेटा ब्रोकरों के पास मौजूद उनके व्यक्तिगत डेटा को हटाने की अनुमति दी।
    • कनाडा (Canada): फेडरल कोर्ट ऑफ अपील (2023) ने निर्णय दिया कि सर्च इंजन फेडरल प्राइवेसी लॉ (PIPEDA) के दायरे में आते हैं। इसके बाद, वर्ष 2025 में प्राइवेसी कमिश्नर ने नुकसान के आधार पर कुछ विशिष्ट मामलों में डी-इंडेक्सिंग (खोज परिणामों से लिंक हटाने) के सीमित अधिकार को सही ठहराया।
    • अन्य देश: यूनाइटेड किंगडम, अर्जेंटीना और जापान जैसे देशों ने भी अपने-अपने प्रवर्तन मॉडल के आधार पर इसी प्रकार के संरक्षण विकसित किए हैं।

भारत में RTBF की व्याख्या और स्थिति

  • संवैधानिक आधार: RTBF, अनुच्छेद-21 के तहत निजता के अधिकार से उत्पन्न होता है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) मामले में मान्यता दी थी।
    • यह एक व्युत्पन्न अधिकार है, अर्थात् यह पूर्ण नहीं है और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता [अनुच्छेद-19(1)(a)], पारदर्शिता तथा कानूनी/अभिलेखीय आवश्यकताओं के साथ संतुलित करना आवश्यक है।
  • विधायी और नियामक स्थिति: डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 मिटाने के अधिकार’ (Right to Erasure) को मान्यता देता है, जिससे व्यक्तियों को यह अनुरोध करने की अनुमति मिलती है कि जब डेटा का उद्देश्य पूरा हो जाए, तो उसे हटा दिया जाए।
    • हालाँकि, सार्वजनिक न्यायालय रिकॉर्ड, मीडिया अभिलेखागार और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डेटा पर इसके प्रत्यक्ष अनुप्रयोग को लेकर अभी भी विधायी अस्पष्टता बनी हुई है।
    • सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश) नियम, 2021 इस दिशा में पूरक भूमिका निभाते हैं, जो मध्यस्थों को निर्धारित समय-सीमा के भीतर निजता का उल्लंघन करने वाली सामग्री हटाने का आदेश देते हैं।

भारत में न्यायिक दृष्टिकोण का विकास

  • प्रारंभिक आधार: आर. राजगोपाल (1994) वाद में पहली बार “अकेला छोड़े जाने का अधिकार’ को मान्यता दी गई, लेकिन साथ ही यह भी कहा गया कि न्यायालय के निर्णयों जैसे सार्वजनिक रिकॉर्ड प्रकाशन के लिए खुले रहेंगे।
  • पुट्टस्वामी निर्णय के बाद का चरण (विरोधाभासी दृष्टिकोण)
    • धर्मराज दवे बनाम गुजरात राज्य (2017): गुजरात उच्च न्यायालय ने बरी किए जाने के रिकॉर्ड को हटाने से इनकार किया और न्यायिक पारदर्शिता को प्राथमिकता दी।
    • ओडिशा उच्च न्यायालय (2020): साइबर अपराधों जैसे रिवेंज पोर्न में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानूनी ढाँचे की आवश्यकता पर जोर दिया।
    • सर्वोच्च न्यायालय (2022) एवं दिल्ली उच्च न्यायालय (2021): गोपनीयता के पक्ष में रुख अपनाते हुए संवेदनशील वैवाहिक विवादों और आजीविका संरक्षण मामलों में सर्च इंजन से नाम हटाने भूल जाने का अधिकार का निर्देश दिया।
    • केरल उच्च न्यायालय (2023): चल रहे मामलों में ‘भूल जाने का अधिकार’ को अस्वीकार किया और ‘ओपन जस्टिस’ के सिद्धांत की रक्षा की।
    • हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय (2024): बलात्कार मामले में बरी होने के बाद नामों को हटाने (Redaction) का आदेश दिया, ताकि सामाजिक कलंक को कम किया जा सके।
  • मई 2026 का समेकन (नया मानक): दिल्ली उच्च न्यायालय ने इन भिन्नताओं को सुलझाते हुए डि-इंडेक्सिंग के लिए एक स्पष्ट दो-स्तरीय वर्गीकरण स्थापित किया।
    • डि-इंडेक्सिंग के लिए कौन आवेदन कर सकता है: जिन व्यक्तियों को पूर्ण रूप से बरी कर दिया गया हो, जिनके मामले रद्द या समझौते के माध्यम से निपटा दिए गए हों, निजी/वैवाहिक विवादों के पक्षकार तथा जिनके नाम किसी बड़े न्यायिक निर्णय में केवल संयोगवश उल्लेखित हुए हों।
    • कौन नहीं पूछ सकता (सख्त अपवाद): दोषी ठहराए गए व्यक्तियों को, महिलाओं या बच्चों के विरुद्ध गंभीर अपराधों में शामिल व्यक्तियों को, तथा लोक-विश्वास के उल्लंघन (जैसे- भ्रष्टाचार में शामिल लोक सेवक, राजनेता या अन्य न्यासीय दायित्व निभाने वाले व्यक्ति) में शामिल व्यक्तियों को यह राहत नहीं दी जाएगी।
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