संदर्भ
हाल ही में कर्नाटक सरकार ने कर्नाटक राज्य बजट 2026-27 प्रस्तुत करते हुए 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की, जिसमें बच्चों में मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग के प्रतिकूल मनोवैज्ञानिक और विकासात्मक प्रभावों पर चिंता व्यक्त की गई।
अन्य प्रमुख बजट घोषणाएँ
- AI इकोसिस्टम: भारतीय विज्ञान संस्थान में एक AI और प्रौद्योगिकी पार्क की स्थापना और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और कर्नाटक राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स विकास निगम लिमिटेड के सहयोग से बंगलूरू रोबोटिक्स और AI इनोवेशन जोन की स्थापना।
- AI उत्कृष्टता केंद्र: बंगलूरू में इंस्टिट्यूट ऑफ बायोइन्फॉर्मेटिक्स एंड एप्लाइड बायोटेक्नोलॉजी, सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर प्लेटफॉर्म्स और नैसकॉम के सहयोग से दो केंद्र स्थापित किए जाएँगे।
- शहरी अवसंरचना: BOOT मॉडल के तहत बंगलूरू में ₹40,000 करोड़ की लागत से उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम कॉरिडोर (40 किमी.) को मंजूरी।
- शहरी गतिशीलता: बंगलूरू विकास प्राधिकरण द्वारा हेब्बल जंक्शन से मेखरी सर्कल तक टनल रोड और एलिवेटेड कॉरिडोर (₹2,250 करोड़)।
- शहरी बाढ़ प्रबंधन: बंगलूरू में बाढ़ से निपटने के लिए ₹5,000 करोड़ का कर्नाटक जल सुरक्षा और लचीलापन कार्यक्रम (KWSRP)।
- वन्यजीव एवं शासन: बनेरघट्टा जैविक उद्यान में तेंदुआ पुनर्वास केंद्र और आबकारी विभाग में स्थानांतरणों के लिए डिजिटल परामर्श, पारदर्शिता बढ़ाने हेतु।
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भारत में सोशल मीडिया विनियमन
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000: भारत में डिजिटल गतिविधियों, जिनमें सोशल मीडिया भी शामिल है, को नियंत्रित करने वाला प्रमुख कानून।
- सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021: ये नियम विशेष रूप से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को विनियमित करते हैं और उन पर विभिन्न दायित्व लागू करते हैं।
- नियम के अंतर्गत प्रमुख प्रावधान:
- शिकायत अधिकारी की नियुक्ति: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को उपयोगकर्ताओं की शिकायतों के निवारण के लिए एक शिकायत अधिकारी नियुक्त करना होगा।
- हानिकारक सामग्री हटाना: प्लेटफॉर्म को अवैध, हानिकारक या आपत्तिजनक सामग्री को हटाना अनिवार्य है।
- संदेशों के स्रोत का पता लगाना: प्लेटफॉर्म को गोपनीयता संबंधी चिंताओं को दूर करने वाली जानकारी के मूल स्रोत की पहचान करने में सक्षम होना चाहिए।
- उचित सावधानी: प्लेटफॉर्म को उपयोगकर्ता खातों और सामग्री की प्रामाणिकता को सत्यापित करने में उचित सावधानी बरतनी चाहिए।
- पारदर्शिता रिपोर्ट: प्लेटफॉर्म को सरकार को आवधिक पारदर्शिता रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
- संबंधित प्राधिकारी
- इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY): सूचना प्रौद्योगिकी, जिसमें सोशल मीडिया भी शामिल है, से संबंधित नीतियों को बनाने और लागू करने के लिए जिम्मेदार प्रमुख सरकारी निकाय।
- साइबर अपराध जांच प्रकोष्ठ (साइबर प्रकोष्ठ): सोशल मीडिया से संबंधित अपराधों सहित साइबर अपराधों की जाँच करता है।
- कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (CERT-In): साइबर खतरों और कमजोरियों की निगरानी करता है और उन पर प्रतिक्रिया देता है।
- नियमन का उद्देश्य: इन नियमों का उद्देश्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर गलत सूचना, घृणास्पद भाषण और अन्य हानिकारक सामग्री को नियंत्रित करने की आवश्यकता के साथ-साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करना है।
- हालाँकि, इनसे संभावित सेंसरशिप और निगरानी को लेकर भी चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।
सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की वकालत करने के कारण
- साइबर बुलिंग: छोटे बच्चे, विशेषकर लड़कियाँ, साइबर बुलिंग का सबसे आसान शिकार होती हैं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इसे बढ़ावा देने का कार्य करते हैं।
- उदाहरण: चीनी ऐप टिकटॉक अक्सर छोटी लड़कियों को साइबर बुलिंग का शिकार बनाने के लिए खबरों में रहता है।
- अश्लील सामग्री: बच्चे इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अश्लील सामग्री देख सकते हैं, जिससे उनके संवेदनशील मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और वे आसानी से इसके आदी हो सकते हैं।
- उदाहरण: वर्ष 2022 में, भारत में बाल अश्लीलता के एक हजार से अधिक मामले दर्ज किए गए, जिनमें कर्नाटक में सबसे अधिक मामले थे।
- लत और फीडबैक लूप में फँसने का खतरा: सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के ध्यान का लाभ उठाने के लिए बनाया गया है, जिससे खतरा उत्पन्न होता है क्योंकि छोटे बच्चे आसानी से डोपामाइन-चालित फीडबैक लूप का शिकार हो सकते हैं और इसके आदी हो सकते हैं।
- मानसिक अस्थिरता: ऑनलाइन उपस्थिति में वृद्धि बच्चों के संज्ञानात्मक विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही है क्योंकि यह उन्हें अलग-थलग कर देती है, जिससे उनके सामाजिक कौशल प्रभावित होते हैं और उनके भविष्य की मानसिक शांति और स्थिरता पर असर पड़ता है।
- प्रोफेसर जोनाथन हैड्ट की मनोविज्ञान की पुस्तक ‘द एंग्जियस जेनरेशन: ‘हाउ द ग्रेट रीवायरिंग ऑफ चाइल्डहुड इज कॉजिंग एन एपिडेमिक ऑफ मेंटल इलनेस’ युवाओं के खराब मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण के कारणों तथा स्मार्टफोन एवं सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग के बीच सीधा संबंध बताती है।
- हिंसा: सोशल मीडिया पर यौन शोषण, बदमाशी, अपशब्द, सॉफ्ट पॉर्न, घृणास्पद भाषण आदि जैसी हिंसक सामग्री के संपर्क में आने वाले बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति विकसित हो सकती है।
- उदाहरण: मुंबई स्थित एसोसिएशन ऑफ एडोलसेंट एंड चाइल्ड केयर इन इंडिया (AACCI) ने मुंबई और गुरुग्राम के स्कूलों का सर्वेक्षण किया और पाया कि आक्रामकता बढ़ रही है।
- स्वास्थ्य पर प्रभाव: सोशल मीडिया की लत ADHD (अटेंशन डेफिसिट/हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर), आक्रामकता, स्मृति संबंधी समस्याएँ, सिरदर्द, आँखों और पीठ में समस्या, तनाव, संवाद करने में कठिनाई, सुस्ती और यहाँ तक कि अवसाद के रूप में प्रकट हो सकती है।
- सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बच्चों के नींद के पैटर्न पर असर पड़ता है।
- गलत सूचनाओं का शिकार होना: सोशल मीडिया गलत सूचनाओं का गढ़ है।
- बच्चों को दुष्प्रचार के जरिए आसानी से गुमराह किया जा सकता है। यूनिसेफ के एक अध्ययन के अनुसार, केवल 2% बच्चों और युवाओं में ही समाचार की सच्चाई और झूठ को परखने के लिए आवश्यक साक्षरता कौशल है।
सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर प्रतिबंध के विरुद्ध तर्क
- क्रियान्वयन संबंधी चुनौतियाँ: डिजिटल वातावरण में प्रतिबंधों को लागू करना चुनौतीपूर्ण है क्योंकि बच्चे आसानी से इन बाधाओं को पार कर सकते हैं।
- उदाहरण: दक्षिण कोरिया द्वारा सिंड्रेला कानून पारित करने के बाद, जिसमें आधी रात से सुबह 6 बजे तक गेमिंग पर प्रतिबंध लगाया गया था, गेमिंग प्लेटफॉर्म तक पहुँचने के लिए बच्चों द्वारा पहचान की चोरी में वृद्धि हुई।
- साझा डिवाइस का उपयोग: भारत में, डिजिटल साक्षरता का स्तर काफी कम होने के कारण, बच्चे अपने माता-पिता को इंटरनेट चलाने में सहायता करते हैं, इसलिए माता-पिता से बच्चों को सुरक्षित ऑनलाइन उपयोग के बारे में मार्गदर्शन करने की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है।
- उदाहरण: दिल्ली के टियर II और टियर III शहरों और सरकारी स्कूलों में 10,000 बच्चों के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 80% बच्चे अपने माता-पिता को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म चलाने में मदद करते हैं।
- कम डिजिटल साक्षरता: पहचान पत्र-आधारित सत्यापन जैसी आयु सत्यापन तकनीकों का उपयोग कम साक्षर लोगों के लिए कठिन होगा।
- उदाहरण: NSSO (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय) के आँकड़ों के अनुसार, केवल 40% भारतीयों को ही कंप्यूटर पर फाइलें कॉपी या स्थानांतरित करना आता था (2021)।
- उत्तरदायित्व से बचना: पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने से प्रौद्योगिकी कंपनियाँ जिम्मेदारी लेने से हतोत्साहित होंगी और बाल सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखते हुए प्लेटफॉर्म डिजाइन करने की उनकी अनिवार्यता कम हो जाएगी।
- सकारात्मक डिजिटल सहभागिता का खंडन: सोशल मीडिया अपने व्यापक संसाधनों के साथ बच्चों को आलोचनात्मक रूप से सोचने और समान रुचियों वाले लोगों से जुड़ने में मदद कर सकता है, जिससे भविष्य के लिए महत्त्वपूर्ण सामाजीरण और संचार कौशल का विकास होता है।
- उदाहरण: ग्रेटा थनबर्ग जैसी जलवायु कार्यकर्ताओं ने अपने संदेश का प्रचार करने और समान विचारधारा वाले बच्चों का समुदाय बनाने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग किया।
- एक शिक्षण उपकरण: डिजिटल युग और सोशल मीडिया ने बच्चों और युवाओं के लिए संवाद करने, सीखने, सामाजिक होने और खेलने के अभूतपूर्व अवसर उत्पन्न किए हैं, जिससे वे नए विचारों तथा सूचना के अधिक विविध स्रोतों से परिचित हो रहे हैं।
आगे की राह
- आयु सत्यापन बनाम गोपनीयता: ‘गोपनीयता विरोधाभास’ को स्वीकार करें, संवेदनशील पहचान डेटा एकत्र किए बिना हम आयु का सत्यापन कैसे करें? समाधान के रूप में शून्य-ज्ञान प्रमाण (ZKP) का सुझाव देना।
- ‘ऑस्ट्रेलियाई मॉडल’: ऑस्ट्रेलिया का वर्ष 2025 का राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध वह मानक है, जिसका कर्नाटक अनुसरण कर रहा है।
- बहिष्कार की जगह शिक्षा: पूर्ण प्रतिबंध के बजाय, ‘क्रमबद्ध डिजिटल स्वायत्तता’ का प्रस्ताव करना, जहाँ बच्चे के बड़े होने के साथ-साथ सुविधाएँ अनलॉक की जाती हैं (उदाहरण के लिए, 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए कोई एल्गोरिदम नहीं, 13-16 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए सीमित संदेश, 18 वर्ष की आयु में पूर्ण पहुँच)।
- आयु-उपयुक्त डिजाइन अपनाना: यू.के. के वर्ष 2020 के आयु-उपयुक्त डिजाइन मॉडल का अनुसरण करना, जहाँ बच्चों के प्लेटफॉर्म से जुड़ने पर बेहतर डिफॉल्ट सेटिंग्स होती हैं और उन्हें न्यूनतम जोखिम का सामना करना पड़ता है।
- तकनीकी डिजाइनों पर निरंतर प्रतिक्रिया: प्लेटफॉर्म को किसी भी नए जोखिम के सामने आने पर तकनीकी डिजाइन को लगातार उन्नत करते रहना चाहिए। साथ ही बच्चों के व्यवहार में देखे गए परिवर्तनों की निगरानी के लिए एक प्रतिक्रिया तंत्र भी होना चाहिए।
- एक अध्ययन में पाया गया कि मेटा, गूगल, टिकटॉक और स्नैपचैट जैसे प्लेटफॉर्मों ने बच्चों की सुरक्षा और गोपनीयता से संबंधित 128 परिवर्तन किए हैं।
- डिजिटल सुरक्षा साक्षरता: बच्चों को उनके मूल पाठ्यक्रम के हिस्से के रूप में डिजिटल सुरक्षा प्रथाओं के बारे में उसी तरह सिखाया जाना चाहिए, जैसे हम उन्हें भौतिक दुनिया में सुरक्षा प्रथाओं के बारे में सिखाते हैं।
- शेयरेंटिंग पर कानून पर चर्चा: यह एक ऐसी प्रथा है, जिसमें माता-पिता अपने बच्चों के बारे में संवेदनशील सामग्री का बड़ा हिस्सा इंटरनेट प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक करते हैं।
- उदाहरण: असम पुलिस सोशल मीडिया का उपयोग करके माता-पिता को शेयरेंटिंग के विरुद्ध चेतावनी दे रही है।
- माता-पिता आदर्श के रूप में: बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग को प्रतिबंधित करना और स्वयं इसका उपयोग मनोरंजन के लिए करना, बच्चों को और अधिक असंतुष्ट तथा धोखेबाज बना देगा।
- इसलिए, माता-पिता को प्लेटफॉर्म के अपने उपयोग को भी नियंत्रित करना होगा।
- शोध से पता चलता है कि जब माता-पिता अपने बच्चे को ऑनलाइन होने के लाभों को अधिकतम करने में सहायता करते हैं, तो इससे हानि को कम करने में भी सहायता मिलती है।
- साक्ष्य-आधारित नीति: उच्च गुणवत्ता वाले, बाल-केंद्रित शोध को प्रमुख प्लेटफॉर्मों की नीतियों और डिजाइनों का मार्गदर्शन करना चाहिए और उद्योग-व्यापी मानक विकसित करने चाहिए, जो यह परिभाषित करें कि विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों के लिए किस प्रकार की सामग्री उपयुक्त है।
- इसमें उभरते डिजिटल जोखिमों के साथ तालमेल बिठाने वाली तीव्र शोध प्रक्रियाएँ शामिल हैं।
- सुरक्षा-आधारित सिद्धांतों को लागू करना: ऑस्ट्रेलियाई ई-सुरक्षा आयुक्त द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया गया यह सिद्धांत, तकनीकी उत्पादों और प्लेटफॉर्मों के मूल सिद्धांतों में सुरक्षा सुविधाओं को समाहित करना है ताकि उनके फीड से यौन, हिंसक और अन्य आयु-अनुचित सामग्री को हटाया जा सके।
- नाबालिगों को डिफॉल्ट रूप से गोपनीयता प्रदान करना।
- विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर मानकीकृत, आसानी से सुलभ और अच्छी तरह से समझाई गई रिपोर्टिंग प्रक्रियाएँ प्रदान करना।
- बच्चों के साथ बातचीत करने का प्रयास करने वाले दुर्भावनापूर्ण तत्त्वों का पता लगाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करना।