संदर्भ
भारत में विधिक प्रकाशन प्रणाली (Legal Publishing System) के विखंडित है तथा बड़े पैमाने पर पीडीएफ (PDF) प्रारूप पर अत्यधिक निर्भरता के कारण प्रचलित कानूनों और उनके संशोधनों तक सुगम पहुँच, प्रामाणिक खोज और उनके अद्यतन स्वरूप को निर्धारित करना जटिल बना हुआ है। विधिक प्रकाशन प्रणाली (Legal Publishing System) के बारे में:
- यह वह ढाँचा एवं प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से सरकारें अधिनियम, विधेयक, नियम, विनियम, अधिसूचनाएँ, परिपत्र (Circulars) तथा अधीनस्थ विधायन का प्रारूपण, प्रकाशन, अद्यतन, समेकन तथा प्रसार करती हैं।
- यह प्रणाली विधिक दस्तावेजों का आधिकारिक प्रामाणिक स्वरूप सुनिश्चित करती है, जिससे वे नागरिकों एवं अन्य हितधारकों के लिए सुलभ रहते हैं तथा समय-समय पर अद्यतन (Updated) होते रहते हैं।
भारत की विधिक प्रकाशन प्रणाली से जुड़ी प्रमुख समस्याएँ:
- विखंडित विधिक जानकारी: अधिनियम, संशोधन, नियम, विनियम, भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के मानक, सड़क मानक, परिपत्र तथा नगर निकायों की उपविधियाँ (Municipal Bylaws) अनेक वेबसाइटों पर विखंडित रूप में उपलब्ध हैं।
- वर्तमान में प्रभावी कानून उपलब्ध कराने वाला कोई एक आधिकारिक मंच उपलब्ध नहीं है।
- सीमित सार्वजनिक पहुँच: विधेयकों को संसद अथवा राज्य विधानमंडलों में प्रस्तुत किए जाने से पूर्व प्रायः सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध नहीं कराया जाता है।
- किसी विशेष समय पर लागू कानून तथा उसके संशोधनों की पहचान करना नागरिकों के लिए कठिन होता है।
- पीडीएफ-आधारित प्रकाशन पर निर्भरता: सरकारी राजपत्र मुख्यतः पीडीएफ (PDF) प्रारूप में प्रकाशित किए जाते हैं।
- पीडीएफ दस्तावेज की दृश्य संरचना को सुरक्षित रखते हैं, किंतु वे विधिक पाठ की पदानुक्रमीय संरचना (अध्याय, भाग, धाराएँ, उपधाराएँ) को प्रभावी रूप से प्रस्तुत नहीं कर पाते।
- अनेक क्षेत्रीय भाषा के राजपत्र स्वामित्वाधीन फॉन्ट (Proprietary Fonts) का उपयोग करते हैं, जिससे उन्हें डिजिटल रूप में खोज पाना अथवा पुनः उपयोग करना कठिन हो जाता है।
- विधिक परिवर्तनों का अनुश्रवण करने में कठिनाई: यह निर्धारित करना जटिल होता है कि किसी संशोधन को अधिसूचित किया गया है या नहीं तथा वह वास्तव में लागू (In Force) है अथवा नहीं।
- उदाहरण: दंड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2005 के कुछ प्रावधान आज भी लागू नहीं हो सके हैं, क्योंकि उन्हें प्रभावी बनाने हेतु आवश्यक सरकारी अधिसूचनाएँ कभी जारी ही नहीं की गईं।
वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ
- अकोमा न्तोसो मानक (Akoma Ntoso Standard): यह मुख्य रूप से विधिक दस्तावेजों के मानकीकरण के लिए विकसित एक मुक्त XML आधारित मार्कअप भाषा है।
- यह कानूनों की संरचना, अर्थगत विशेषताओं तथा संस्करण इतिहास को संरक्षित करती है।
- इसके माध्यम से उपयोगकर्ता विधायी संशोधनों का अनुश्रवण करने, किसी भी पूर्व या वर्तमान तिथि पर प्रभावी कानून की स्थिति को देख सकते हैं तथा अधीनस्थ विधायन को मूल अधिनियमों से जोड़ने में सक्षम बनाती है।
- अनेक अफ्रीकी देश अकोमा न्तोसो (Akoma Ntoso) का उपयोग इंडिगो (Indigo) मुक्त-स्रोत विधिक प्रकाशन मंच के साथ करते हैं।
- संयुक्त राज्य अमेरिका: संयुक्त राज्य विधायी मार्कअप (USLM) का उपयोग करता है, जो अकोमा न्तोसो (Akoma Ntoso) का एक रूपांतर है।
- कानूनों का प्रकाशन संरचित मार्कअप प्रारूप में किया जाता है, जबकि पीडीएफ (PDF) और HTML संस्करण स्वतः निर्मित हो जाते हैं।
- विधिक आँकड़े सामूहिक डाउनलोड हेतु उपलब्ध कराए जाते हैं, जिससे उनका व्यापक सार्वजनिक उपयोग संभव होता है।
- यूनाइटेड किंगडम: क्राउन लेजिस्लेशन मार्कअप लैंग्वेज (CLML) के माध्यम से विधायन प्रकाशित करता है।
- अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति तथा सरल कार्यान्वयन को देखते हुए, यह अकोमा न्तोसो (Akoma Ntoso) की ओर संक्रमण की योजना बना रहा है।
आगे की राह
- मुक्त विधिक प्रकाशन मानकों को अपनाना: पीडीएफ (PDF) आधारित प्रकाशन से हटकर मुक्त मानकों के आधार पर संरचित एवं मशीन-पठनीय विधिक दस्तावेजों का प्रकाशन किया जाए।
- सुगम पहुँच सुनिश्चित करना: कानूनों एवं संशोधनों की सरल खोज, पुनर्प्राप्ति, अनुश्रवण तथा विभिन्न संस्करणों तक पहुँच की व्यवस्था की जाए।
- पारदर्शिता को सुदृढ़ करना: विधेयकों, कानूनों, संशोधनों तथा अधिसूचनाओं का समयबद्ध प्रकाशन सार्वजनिक डोमेन में सुनिश्चित किया जाए।
- विधि के शासन को सुदृढ़ करना: नागरिकों, अधिवक्ताओं, न्यायाधीशों तथा प्रशासकों को सटीक, प्रामाणिक एवं अद्यतन विधिक जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
- लोकतांत्रिक सहभागिता को बढ़ावा देना: कानूनों तक बेहतर पहुँच सुनिश्चित कर विधायी प्रक्रिया में नागरिकों की सूचित एवं सार्थक भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए।