संदर्भ
हाल ही में एक विश्लेषण में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अधिक उपयोग किए जा रहे “ऑपरेशन लंगड़ा” की जाँच की गई, जिससे अपराध नियंत्रण, विधिक प्रक्रिया तथा विधि के शासन को लेकर महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठे।
ऑपरेशन लंगड़ा क्या है?
- परिभाषा: ऑपरेशन लंगड़ा उत्तर प्रदेश में अपनाई जाने वाली एक पुलिसिंग प्रथा को संदर्भित करता है, जिसमें आरोपियों को पुलिस मुठभेड़ के दौरान कथित रूप से पैर में गोली मारकर उन्हें गिरफ्तार किया जाता है।
- ‘हाफ-एनकाउंटर’ (Half-encounter): इसे प्रायः “हाफ-एनकाउंटर” कहा जाता है, क्योंकि इसमें आरोपी की मृत्यु नहीं होती, बल्कि उसे घायल कर अक्षम (incapacitate) कर दिया जाता है।
- सामान्य प्रक्रिया: यह प्रथा आमतौर पर एक निश्चित पैटर्न का अनुसरण करती है, संदिग्ध की पहचान/रोकथाम, भागने या हमला करने का कथित प्रयास, पुलिस की जवाबी कार्रवाई, पैर में गोली लगना, गिरफ्तारी तथा हथियार की बरामदगी।
- उत्पत्ति और उद्देश्य: यह राज्य की ‘शून्य-सहनशीलता’ अपराध नीति के तहत उभरी है और इसे आदतन अपराधियों को अक्षम बनाने के एक तरीके के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
यह चर्चा का विषय क्यों है?
- अपराध नियंत्रण का साधन: समर्थक इसे आदतन अपराधियों को शीघ्र अक्षम करने का एक प्रभावी तरीका मानते हैं, विशेषकर कम दोषसिद्धि दर और न्यायिक प्रक्रिया में देरी की स्थिति में।
- ‘नॉन-लीथल एनकाउंटर’ मॉडल: पारंपरिक एनकाउंटर संबंधी हत्याओं के विपरीत, इसमें आरोपी सामान्यतः जीवित रहता है और केवल पैर में चोट लगती है, जिससे यह प्रथा कानूनी रूप से अधिक स्वीकार्य प्रतीत होती है।
- ‘एनकाउंटर’ का संस्थानीकरण: इस प्रकार की घटनाओं की बड़ी संख्या और आधिकारिक समर्थन के कारण, जो पहले एक असाधारण उपाय था, वह अब नियमित पुलिसिंग प्रथा में परिवर्तित होता दिखाई दे रहा है।
ऑपरेशन लंगड़ा से संबंधित चिंताएँ
- विधिक प्रक्रिया का उल्लंघन: दोष सिद्ध होने से पूर्व ही दंड जैसा प्रभाव उत्पन्न हो जाता है, जिससे आपराधिक न्याय प्रणाली कमजोर होती है।
- मानवाधिकार संबंधी चिंताएँ: आरोपियों को जानबूझकर घायल करना अनुच्छेद-21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के अंतर्गत गंभीर प्रश्न उठाता है।
- न्यायेतर दंड: आलोचकों के अनुसार यह कानून प्रवर्तन और दंड देने की सीमा को अस्पष्ट करता है, जबकि दंड देने का अधिकार केवल न्यायालयों के पास है।
- जवाबदेही की कमी: बार-बार समान प्रकार की ‘एनकाउंटर’ संबंधी कारण और स्वतंत्र जाँच की सीमितता से पारदर्शिता कमजोर हो सकती है।
- विकृत प्रोत्साहन: पुरस्कार, मान्यता और मुठभेड़ों के आँकड़े ऐसी कार्रवाइयों के अत्यधिक उपयोग को बढ़ावा दे सकते हैं।
न्यायिक स्थिति
- पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) बनाम महाराष्ट्र राज्य: सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में मुठभेड़ मामलों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश निर्धारित किए तथा स्वतंत्र जाँच को अनिवार्य किया, ताकि जवाबदेही और विधि के शासन को सुनिश्चित किया जा सके।
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय: वर्ष 2026 में न्यायालय ने टिप्पणी की कि “हाफ-एनकाउंटर” अब नियमित प्रथा बनती जा रही है और पुनः स्पष्ट किया कि दंड देने की शक्ति केवल न्यायपालिका के पास ही निहित है।
आगे की राह
- विधिक प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाना: प्रत्येक मुठभेड़ में सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए, जिसमें हर मुठभेड़ की स्वतंत्र जाँच अनिवार्य हो।
- आपराधिक न्याय व्यवस्था में सुधार: जाँच की गुणवत्ता, फॉरेंसिक क्षमता तथा मुकदमों की गति को बढ़ाया जाए, ताकि गैर-कानूनी उपायों पर निर्भरता कम हो सके।
- जवाबदेही एवं पारदर्शिता: बॉडी कैमरों का अनिवार्य उपयोग, मुठभेड़ों का ऑडिट, न्यायिक निगरानी तथा मुठभेड़ मामलों की सार्वजनिक रिपोर्टिंग सुनिश्चित की जाए।
- समुदाय-केंद्रित पुलिसिंग पर जोर: सूचना-आधारित पुलिसिंग, अपराध रोकथाम तथा सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा दिया जाए, बजाय इसके कि दंडात्मक मुठभेड़ आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाए।