संदर्भ
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा जनित अस्तित्वहीन न्यायिक पूर्वनिर्णय तैयार करना तथा उन पर निर्भरता न्यायिक प्रक्रिया के लिए अत्यंत गंभीर खतरा है।
संबंधित तथ्य
- सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा तैयार किए गए काल्पनिक न्यायिक पूर्वनिर्णयों का उल्लेख किया गया था।
- साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय विधिज्ञ परिषद (BCI) को विधिक व्यवसाय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उत्तरदायित्वपूर्ण उपयोग के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश दिया।
‘AI हेलुसिनेशन’ क्या हैं?
- AI हेलुसिनेशन: यह वह स्थिति है, जब जनरेटिव कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) मॉडल गलत, काल्पनिक या तथ्यात्मक रूप से असत्य जानकारी तैयार करते हैं, लेकिन उसे पूरे विश्वास के साथ सही जानकारी के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
- विधिक संदर्भ: न्यायिक कार्यवाही के दौरान AI काल्पनिक न्यायिक पूर्वनिर्णय, गलत विधिक उद्धरण, निर्णयों के गलत उद्धरण अथवा अस्तित्वहीन वैधानिक प्रावधान तैयार कर सकता है, जिससे स्वतंत्र सत्यापन के अभाव में न्यायालय गुमराह हो सकते हैं।
- बढ़ती वैश्विक चिंता: संयुक्त राज्य अमेरिका सहित अनेक देशों के न्यायालयों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ अधिवक्ताओं ने चैटजीपीटी (ChatGPT) द्वारा तैयार किए गए काल्पनिक न्यायिक पूर्वनिर्णयों का उपयोग किया। इसके परिणामस्वरूप न्यायालयों ने दंडात्मक कार्रवाई की तथा मानवीय सत्यापन के महत्त्व पर पुनः बल दिया।

न्यायपालिका में AI के लाभ
- न्यायिक दक्षता में सुधार: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) विधिक अनुसंधान, दस्तावेजों की समीक्षा, अनुवाद, मामलों का सार तैयार करने तथा वाद सूची तैयार करने में लगने वाले समय को कम कर सकती है, जिससे लंबित मामलों के बोझ को कम करने में सहायता मिलती है।
- न्याय तक पहुँच को सुदृढ़ बनाना: AI-आधारित विधिक सहायक विधिक जानकारी को सरल बना सकते हैं, बहुभाषी पहुँच में सुधार कर सकते हैं तथा नागरिकों के लिए वाद-व्यय को कम कर सकते हैं।
- प्रशासनिक आधुनिकीकरण: स्वचालित डिजिटल प्रणालियों के माध्यम से रजिस्ट्री कार्यों, सुनवाई निर्धारण, अभिलेख प्रबंधन तथा न्यायालय प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
- डिजिटल न्यायालयों को समर्थन: AI, ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना, वर्चुअल न्यायालय तथा सुवास (सर्वोच्च न्यायालय का विधिक अनुवाद सॉफ्टवेयर) जैसी पहलों को सुदृढ़ बनाकर डिजिटल न्याय वितरण को अधिक प्रभावी बनाती है।
न्यायपालिका में AI से संबंधित प्रमुख चिंताएँ
- AI हेलुसिनेशन: काल्पनिक न्यायिक पूर्वनिर्णय, गलत विधिक उद्धरण तथा त्रुटिपूर्ण विधिक विश्लेषण न्यायिक निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं तथा न्याय की निष्पक्षता से समझौता कर सकते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के AI विनियम (प्रारूप), 2026
- सहायक भूमिका, निर्णयकर्ता नहीं: AI का उपयोग विधिक अनुसंधान, अनुवाद, सार तैयार करने, वाद प्रबंधन तथा प्रशासनिक कार्यों के लिए किया जा सकता है, लेकिन यह न्यायिक निर्णय का स्थान नहीं ले सकता है।
- AI द्वारा न्यायिक निर्णय नहीं: AI प्रणालियाँ दोषसिद्धि, दंड निर्धारण, जमानत प्रदान या अस्वीकार करने, साक्षियों की विश्वसनीयता का आकलन अथवा न्यायिक विवेक से जुड़े किसी भी निर्णय का निर्धारण नहीं कर सकती हैं।
- अनिवार्य प्रकटीकरण: यदि अधिवक्ताओं ने याचिकाओं, लिखित प्रस्तुतियों अथवा विधिक दस्तावेजों की तैयारी में AI उपकरणों का महत्त्वपूर्ण रूप से उपयोग किया है, तो इसकी जानकारी देना अनिवार्य होगा।
- मानवीय उत्तरदायित्व: AI की सहायता से प्रारूपण या अनुसंधान किए जाने पर भी प्रत्येक न्यायिक आदेश के लिए न्यायाधीश पूर्णतः उत्तरदायी रहेंगे।
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- एल्गोरिद्मिक पक्षपात: पक्षपातपूर्ण आँकड़ों पर प्रशिक्षित AI मॉडल समाज, अर्थव्यवस्था या विधि व्यवस्था में पहले से मौजूद भेदभाव को और बढ़ा सकते हैं, जिससे निष्पक्षता एवं विधि के समक्ष समानता प्रभावित हो सकती है।
- AI प्रणालियों में पारदर्शिता का अभाव: अनेक उन्नत AI मॉडल ऐसे तरीके से कार्य करते हैं कि यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि वे किसी निष्कर्ष तक कैसे पहुँचे।
- गोपनीयता एवं निजता: AI के माध्यम से संवेदनशील न्यायिक अभिलेखों का प्रसंस्करण डेटा सुरक्षा, गोपनीयता एवं सूचनात्मक निजता से संबंधित चिंताएँ उत्पन्न करता है।
- प्रौद्योगिकी पर अत्यधिक निर्भरता: AI पर अत्यधिक निर्भरता से अधिवक्ताओं एवं न्यायाधीशों की विश्लेषण क्षमता, विधिक अनुसंधान कौशल तथा स्वतंत्र न्यायिक विवेक प्रभावित हो सकता है।
- उत्तरदायित्व का अभाव: जब AI द्वारा तैयार की गई त्रुटिपूर्ण जानकारी न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करती है, तब उसके लिए उत्तरदायित्व निर्धारित करना कठिन हो जाता है।
न्यायपालिका एवं AI से संबंधित हालिया घटनाक्रम
- सर्वोच्च न्यायालय के AI विनियम (प्रारूप), 2026: सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में AI विनियमों का प्रारूप जारी किया, जिसमें मानव पर्यवेक्षण आधारित व्यवस्था का प्रस्ताव किया गया है। इसके अनुसार AI का उपयोग केवल सहायक तकनीक के रूप में किया जा सकेगा।
- न्यायमूर्ति बी.आर. गवई की टिप्पणी (2026): भारत के नामित मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि AI न्यायिक कार्यों में सहायक हो सकता है, लेकिन वह मानवीय विवेक, संवैधानिक मूल्यों तथा न्यायिक विवेक का स्थान कभी नहीं ले सकता है।
- वैश्विक अनुभव: संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा तथा ऑस्ट्रेलिया के न्यायालयों ने अनेक मामलों में AI द्वारा तैयार किए गए गलत विधिक उद्धरणों के सामने आने के बाद अधिवक्ताओं को स्वतंत्र सत्यापन के बिना AI-आधारित विधिक अनुसंधान पर भरोसा न करने की सलाह दी है।
आगे की राह
- समग्र AI शासन व्यवस्था विकसित करना: न्यायिक प्रणाली में AI के उपयोग के लिए स्पष्ट विधिक एवं नैतिक मानक निर्धारित किए जाएँ।
- अनिवार्य सत्यापन व्यवस्था: AI द्वारा तैयार किए गए विधिक अनुसंधान को किसी भी न्यायिक मंच के समक्ष प्रस्तुत करने से पहले बहु-स्तरीय सत्यापन अनिवार्य किया जाए।
- क्षमता निर्माण: न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं एवं न्यायालय अधिकारियों को AI की क्षमताओं, सीमाओं तथा नैतिक जोखिमों के संबंध में नियमित प्रशिक्षण दिया जाए।
- व्याख्या योग्य AI के प्रयोग को बढ़ावा देना: ऐसे AI तंत्र अपनाए जाएँ, जिनकी कार्यप्रणाली का परीक्षण एवं स्वतंत्र सत्यापन किया जा सके।
- डेटा आधारित शासन को सुदृढ़ बनाना: प्रामाणिक भारतीय विधिक डेटाबेस पर आधारित सुरक्षित AI प्रणालियाँ विकसित की जाएँ तथा डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 का पूर्ण पालन सुनिश्चित किया जाए।
- अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाना: ‘काउंसिल ऑफ यूरोप फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन AI’, यूरोपीय संघ का AI अधिनियम तथा संयुक्त राष्ट्र की ग्लोबल डिजिटल कॉम्पैक्ट जैसी उभरती वैश्विक व्यवस्थाओं से सीख लेते हुए उन्हें भारत के संवैधानिक ढाँचे के अनुरूप अपनाया जाए।
निष्कर्ष
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) में न्यायिक दक्षता, विधिक अनुसंधान तथा न्याय तक पहुँच को बेहतर बनाने की अपार क्षमता है। किंतु न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता अंततः मानवीय विवेक, संवैधानिक नैतिकता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता तथा विधि के शासन पर आधारित है। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय ने पुनः स्पष्ट किया है कि AI न्यायालयों की सहायता कर सकता है, लेकिन न्याय प्रदान करने की जिम्मेदारी कभी भी मशीनों को नहीं सौंपी जा सकती है।