संदर्भ
हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने नई दिल्ली में “भारत इनोवेट्स (Bharat Innovates)” पर दो रणनीतिक दस्तावेजों को आधिकारिक रूप से जारी किया।
संबंधित तथ्य
- यह पहल भारत के उभरते हुए डीप-टेक स्टार्ट-अप पारितंत्र (Deep-Tech Startup Ecosystem) को प्रदर्शित करती है, जो सीधे उच्च शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थानों से विकसित हो रहा है। साथ ही, यह फ्राँस के नीस में आयोजित होने वाले भारत इनोवेट्स 2026 शिखर सम्मेलन (Bharat Innovates 2026 Summit) से पूर्व एक आधार के रूप में कार्य करती है।
भारत इनोवेट्स पर रणनीतिक दस्तावेजों के बारे में
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी किए गए ये दो व्यापक हैंडबुक (Handbooks) संरचनात्मक एवं निवेश मार्गदर्शिका के रूप में कार्य करते हैं:
- भारत इनोवेट्स स्टार्ट-अप संकलन: इसमें देशभर से प्राप्त 3,000 आवेदनों में से चयनित 120 उत्कृष्ट डीप-टेक स्टार्ट-अप्स की प्रोफाइल दी गई है। यह क्षेत्र-वार बाजार विश्लेषण, वैश्विक अवसरों का मानचित्रण तथा उभरते प्रौद्योगिकी रुझानों की जानकारी प्रदान करता है।
- अनुसंधान एवं नवाचार परियोजना प्रदर्शन: इसमें भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IITs) तथा भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) जैसे प्रमुख संस्थानों की लगभग 50 उन्नत शोध परियोजनाओं को प्रदर्शित किया गया है।
- सामूहिक आधार (Cohort Baseline): इस समूह में सम्मिलित स्टार्ट-अप्स एक विशाल बौद्धिक समूह (Intellectual Pool) का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनके पास 1,500 से अधिक पेटेंट हैं तथा सामूहिक रूप से 1.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का निवेश प्राप्त किया गया है।
भारत के नवाचार एवं स्टार्ट-अप पारितंत्र
भारत का उद्यमशील परिदृश्य अब मूलभूत सेवाओं से आगे बढ़कर जटिल इंजीनियरिंग एवं डीप-टेक नवाचार की ओर स्थानांतरित हो रहा है।
- वैश्विक स्थिति: भारत आज विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्ट-अप पारितंत्र है, परंतु यह अब एक निर्णायक परिवर्तन से गुजर रहा है, जहाँ यह डीप-टेक एवं अनुसंधान-आधारित केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है।
- संस्थागत आधार: स्टार्ट-अप अब केवल वाणिज्यिक बिजनेस पार्क्स तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सक्रिय रूप से विश्वविद्यालय इनक्यूबेटर्स, प्रयोगशालाओं और शैक्षणिक अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र से उभर रहे हैं।
- कॉरपोरेट स्तर: उच्च-स्तरीय अनुसंधान-आधारित कंपनियाँ जैसे आइडियाफोर्ज (एक ड्रोन तकनीक) और एथर एनर्जी (Ather Energy–इलेक्ट्रिक मोबिलिटी) इस बात के स्पष्ट उदाहरण हैं कि विश्वविद्यालय-आधारित नवाचार सफलतापूर्वक सार्वजनिक बाजारों तक पहुँच सकते हैं।
इस पहल की आवश्यकता
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के विजन को पूर्ण करना: राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ज्ञान के उपभोग से ज्ञान के सृजन की ओर परिवर्तन का निर्देश देती है, जिसमें तकनीक के आयात से आगे बढ़कर बौद्धिक संपदा के निर्यात पर बल दिया गया है।
- शैक्षणिक अनुसंधान का व्यावसायीकरण: ऐतिहासिक रूप से भारत में मूल्यवान वैज्ञानिक अनुसंधान प्रायः प्रयोगशालाओं एवं शोध-पत्रों तक ही सीमित रह गया। इसलिए इन विचारों को व्यावसायिक उत्पादों एवं स्टार्ट-अप्स में बदलने हेतु स्पष्ट एवं प्रभावी मार्ग विकसित करने की आवश्यकता है।
- वैश्विक पूँजी तक पहुँच: डीप-टेक स्टार्ट-अप्स को बड़े पैमाने पर पूँजी की आवश्यकता होती है। यह कार्यक्रम उन्हें उन वैश्विक निवेश फर्मों से जोड़ने के संरचित अवसर प्रदान करता है, जो सामूहिक रूप से 3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की परिसंपत्तियों का प्रबंधन करती हैं।
इस पहल का महत्त्व
- ब्रिज मॉडल संरचना: यह पहल औपचारिक इन्क्यूबेटर इनोवेशन ब्रिजेज तथा इंडस्ट्री इनोवेशन ब्रिजेज स्थापित करती है, जिससे भूमिगत स्तर के नवप्रवर्तकों को वैश्विक कॉरपोरेशनों एवं वेंचर फंड्स से व्यवस्थित रूप से जोड़ा जा सके।
- रणनीतिक द्विपक्षीय संबंध: यह पहल भारत–फ्राँस नवाचार वर्ष के अंतर्गत कार्य करती है, जिससे विज्ञान-कूटनीति को मजबूती मिलती है। इसके परिणामस्वरूप 28 तकनीक-आधारित समझौता ज्ञापन (MoUs) तैयार किए गए हैं।
- आर्थिक मूल्य सृजन: 1,500 से अधिक पेटेंट्स को सीधे 100 से अधिक वैश्विक निवेशकों के समक्ष प्रस्तुत कर यह पहल देश की बौद्धिक क्षमता को प्रत्यक्ष आर्थिक राजस्व में परिवर्तित करने में सहायता करती है, जिससे नवाचार-आधारित विकसित भारत को गति मिलती है।
जिन चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है
- दूरदर्शी पूँजी और वाणिज्यीकरण अंतराल: डीप-टेक नवाचारों को प्रायः व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनने में लंबा समय लगता है।
- दीर्घकालिक जोखिम पूँजी की सीमित उपलब्धता, अपर्याप्त प्रतिरूप वित्तपोषण, कमजोर परीक्षण अवसंरचना तथा प्रयोगशाला सफलता एवं बाजार स्वीकृति के मध्य विद्यमान ‘वाणिज्यीकरण खाई’ (Valley of Death) ये सभी मिलकर संभावनाशील प्रौद्योगिकियों के विस्तार एवं व्यापक अनुप्रयोग को गंभीर रूप से अवरुद्ध करते हैं।
- कमजोर नवाचार एवं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पारिस्थितिकी तंत्र: कई विश्वविद्यालयों में ‘टेक्नोलॉजी ट्रांसफर ऑफिस’ (TTOs) सुविधा का अभाव है तथा उद्यमशील पारिस्थितिकी कमजोर है, जिसके कारण पेटेंट का व्यावसायीकरण सीमित रहता है। इसके साथ ही उद्योग–शैक्षणिक संस्थान संबंध कमजोर हैं और अकादमिक प्रकाशनों को नवाचार-आधारित उद्यमशीलता से अधिक प्राथमिकता दी जाती है।
- नियामक एवं बाजार पहुँच बाधाएँ: जोखिम-भरे सार्वजनिक खरीद तंत्र, मानकीकरण एवं प्रमाणन ढाँचों की विखंडित स्थिति तथा रक्षा, जैव-प्रौद्योगिकी, ड्रोन और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में लंबी स्वीकृति प्रक्रियाएँ डीप-टेक स्टार्ट-अप्स के बाजार में प्रवेश को विलंबित करती हैं।
- शासन एवं समन्वय चुनौतियाँ: सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, अनुसंधान संस्थानों, नवाचार मिशनों, उद्योग और वित्तीय संस्थानों के बीच प्रभावी समन्वय एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती बना हुआ है।
- प्रतिभा प्रतिधारण एवं गतिशीलता की बाधाएँ: उच्च कुशल शोधकर्ताओं का विदेश पलायन (ब्रेन ड्रेन), उद्योग–अकादमिक गतिशीलता की कमी तथा अपेक्षाकृत कमजोर प्रोत्साहन तंत्र भारत की डीप-टेक नवाचार क्षमता को सीमित करते हैं।
पूर्ववर्ती पहलें
सरकार ने इस ढाँचे को कई लंबे समय से चल रहे कार्यक्रमों के आधार पर निर्मित किया है:
- स्टार्ट-अप इंडिया पहल (2016): कर अवकाश, सरल अनुपालन प्रक्रियाएँ तथा प्रारंभिक चरण के उद्यमों के लिए आधारभूत वित्तपोषण प्रदान करने हेतु प्रारंभ की गई।
- अटल नवाचार मिशन (Atal Innovation Mission): नीति आयोग द्वारा संचालित इस कार्यक्रम ने स्कूलों में हजारों अटल टिंकरिंग लैब्स तथा विश्वविद्यालयों में संस्थागत इनक्यूबेशन केंद्र स्थापित कर आधारभूत नवाचार को प्रोत्साहित किया।
- राष्ट्रीय नवाचार को विकसित एवं उपयोग करने की पहल (NIDHI): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा संचालित यह कार्यक्रम विचारों और नवाचारों को सफल स्टार्ट-अप्स में बदलने हेतु विकसित किया गया है।
आगे की राह
- ‘फाउंडर-फ्रेंडली’ बौद्धिक संपदा व्यवस्था: उच्च शिक्षा संस्थानों को ऐसी IPR नीतियाँ अपनानी चाहिए, जो शोधकर्ताओं, शिक्षकों और छात्रों को उनके नवाचारों में पर्याप्त इक्विटी एवं व्यावसायिक अधिकार प्रदान करें, जिससे अकादमिक स्पिन-ऑफ को बढ़ावा मिले।
- सोवरेन मैचिंग फंड्स के माध्यम से पेशेंट कैपिटल का विस्तार: सरकार को सह-निवेश एवं मैचिंग फंड तंत्र स्थापित करना चाहिए, जिसमें सार्वजनिक पूँजी निजी वेंचर निवेश के साथ मिलकर जोखिम को कम करे और डीप-टेक स्टार्ट-अप्स के लिए घरेलू एवं वैश्विक वित्तपोषण आकर्षित करे।
- अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) का उपयोग: ANRF को उद्योग–अकादमिक सहयोग आधारित अनुसंधान का केंद्रीय मंच बनाना चाहिए, जो ट्रांसलेशनल रिसर्च को बढ़ावा देकर व्यावसायिक तकनीकों की स्थायी पाइपलाइन तैयार करे।
- प्रौद्योगिकी स्थानांतरण एवं व्यावसायीकरण ढाँचे को सुदृढ़ करना: विश्वविद्यालयों में मजबूत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर ऑफिस (TTOs), इनक्यूबेशन केंद्र और नवाचार समर्थन प्रणालियाँ स्थापित करनी चाहिए ताकि पेटेंट, लाइसेंसिंग और स्टार्ट-अप निर्माण को सुगम बनाया जा सके।
- डीप-टेक स्टार्ट-अप्स के लिए प्रारंभिक बाजार पहुँच: सार्वजनिक खरीद नीतियों में पायलट प्रोजेक्ट्स, नवाचार चुनौतियाँ और स्वदेशी तकनीकों की सरकारी खरीद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिससे स्टार्ट-अप्स “वैली ऑफ डेथ” को पार कर सकें।
- विश्वस्तरीय परीक्षण एवं नियामक तंत्र का विकास: मानकीकरण, प्रमाणन और नियामक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित कर तथा सिंगल-विंडो क्लीयरेंस एवं परीक्षण सुविधाएँ स्थापित कर नवाचारों के बाजार प्रवेश को तेज किया जा सकता है।
- प्रतिभा प्रतिधारण एवं उद्योग–अकादमिक गतिशीलता को सुदृढ़ करना: बेहतर अनुसंधान प्रोत्साहन, विश्वस्तरीय अनुसंधान अवसंरचना और मजबूत उद्योग–अकादमिक सहयोग उच्च-स्तरीय प्रतिभा को बनाए रखने में सहायक होंगे और एक वैश्विक प्रतिस्पर्द्धी डीप-टेक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करेंगे।